Friday, October 18

‘आरे’ पर स्वार्थ की राजनीति

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मुंबई में मेट्रो के लिए आरे कालोनी में हरे पेड़ काटने को लेकर विपक्ष ही नहीं महाराष्ट्र सरकार की सहयोगी शिवसेना ने भी विरोध किया है। केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने देवेन्द्र फडणवीस सरकार का बचाव करते हुए विरोध प्रदर्शन पर प्रतिक्रिया जताते हुए दिल्ली का उदाहरण दिया है। उन्होंने कहा कि दिल्ली मेट्रो के लिए भी पेड़ काटे गये थे। उस समय भी विरोध हुआ था लेकिन बाद में एक के बदले पांच पेड़ लगाये भी गये। आरे कालोनी का मामला कई दृष्टि से संवेदनशील बनाया गया है। महाराष्ट्र में विधान सभा चुनाव इसी महीने 21 तारीख को होने हैं। यहां पर आदिवासी लोग रह रहे हैं और पेड़ काटने का मामला उनके लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना उनका ठिकाना छीनने का है। उनको वह स्थान छोड़ना पड़ेगा।

विकास के कार्य होने पर इस तरह की स्थितियां आती हैं। बड़ी-बड़ी सड़के और नहरे आदि बनाते समय भी जमीन का अधिग्रहण किया जाता है। शहरीकरण की बढ़ती समस्या ने भी आसपास की हरियाली को नष्ट किया है लेकिन उसकी भरपायी भी जरूरी होती है। सुप्रीम कोर्ट ने आरे में पेड़ कटान रोक दी और सभी प्रदर्शन कारियों को रिहाकर दिया गया है। पर्यावरण को विकास में बाधक नहीं बनने देना है इसलिए बाम्बे हाईकोर्ट ने मेट्रो के निर्माण के लिए आरे में पेड़ों की कटाई का विरोध करने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया था। संविधान के अनुसार महाराष्ट्र सरकार अपना दायित्व निभा रही है, जबकि उसका विरोध स्वार्थ की राजनीति के चलते हो रहा है। महाराष्ट्र में चुनाव हो रहे है और अगली सरकार का यह कर्तव्य होगा कि आरे में पर्यावरण को जितनी क्षति पहुंची है उसकी भरपाई शीध्र हो तथा वहां रहने वाले आदिवासियों को शीघ्र ही आवास उपलब्ध कराया जाए।

महाराष्ट्र में कांग्रेस और एनसीपी ने 15 साल तक सरकार चलायी अब पांच साल से भाजपा की सरकार है। पिछले पांच साल से विपक्ष में कांग्रेस और एनसीपी के नेताओं सुप्रिया सुले और मिलिंद देवड़ा ने आरे में पेड़ काटने को राजनीतिक मुद्दा बनाने का भरपूर प्रयास किया जनाक्रोश के बावजूद इस मुद्दे को धार देने में विपक्ष नाकाम रहा इसके विपरीत सरकार की सहयोगी शिवसेना काफी आगे निकल गयी है। कांग्रेस नेता मिलिंद देवड़ा कहते हैं कि आरे में पेड़ काटने से लगता है कि कोई मेरे फेफड़े में चाकू गोद रहा हो। इसी तरह सुप्रिया सुले कहती हैं कि सरकार किसी अन्य विकल्प पर विचार करे। इन दोनों नेताओं से सीधे-सीधे यह पूछा जाना चाहिए कि क्या मेट्रो का निर्माण नहीं होना चाहिए? मुंबई की जीवनी कही जाने वाली लोकल ट्रेन क्या अपर्याप्त नहीं साबित हो रही है? सन् 2014 में मुंबई मेट्रो का पहला प्रोजेक्ट शुरू हुआ था। इस पहले फेज में बर्सोवा से घाटकोपर तक मेट्रो का निर्माण हुआ और जनता ने इस सुविधा का स्वागत भी किया था। इसके बाद ही मेट्रो के विस्तार की बात निकली थी। मेट्रो के विस्तार के लिए जरूरत थी पार्किंग शेड की। इसके लिए 23136 करोड़ रूपये की लागत से फ्लोर स्पेसइंडेक्स निर्माण को जगह की जरूरत पड़ी।

मेट्रो परियोजना से जुड़ी कम्पनी को फिल्म सिटी गोरेगांव वाले इलाके की आरे कालोनी इसके लिए सबसे मुफीद लगी। इसे ही आरे के जंगल भी कहते हैं। यहां पर हरियाली भी है और उस हरियाली में आदिवासी भी रहते हैं। इनकी अच्छी खासी तादाद है जो राजनीति के लिए महत्वपूर्ण वोटर हैं। फिल्मी नगरी का भी स्वार्थ है तो राजनेता तो ऐसे अवसर तलाशते ही रहते हैं। मामला हाईकोर्ट में गया था लेकिन कोर्ट ने विकास के मुद्दे को प्राथमिकता दी और सरकार के आश्वासन पर भरोसा जताया। सरकार कहती है कि जितने पेड़ काटे जाएंगे, उससे कहीं ज्यादा पेड़ लगाए भी जाएंगे।

बहरहाल, सच्चाई को राजनीति के चश्में से देखा जा रहा है। बड़ी मशीनों का उपयोग करके २४ घंटे से भी कम समय में लगभग एक हजार पेड़ काटे जा चुके हैं। यह कार्य ऐसे समय पर हो रहा है जब महाराष्ट्र में मतदान सिर पर आ गया है। भाजपा और शिवसेना गठबंधन में भी इसके चलते तनाव दिखने लगा है। मीडिया के वहां जाने पर भी रोक लगा दी गयी तो जितने मुंह उतनी बातें होने लगी हैं। उत्तराखंड में जिस तरह चिपको आंदोलन चल रहा था, उसी तरह आरे को बचाओ आंदोलन चलने लगा। फिल्मी दुनिया की बड़ी हस्तियां भी पेड़ काटने का विरोध करने लगी। सरकार को कोर्ट के आदेश का सम्बल मिला तो प्रदर्शन करने वालों को खदेड़ दिया गया लेकिन चुनावी मैदान से आग उगली जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले का समाधान कर दिया है।

शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे कहते हैं सरकार बनने पर उन लोगों को देखेंगे जो पेड़ों का खून कर रहे हैं। बर्ली से शिवसेना उम्मीदवार आदित्य ठाकरे ने भी पेड़ों की कटाई का विरोध कर रहे लोगों का समर्थन किया है। फिल्मी सितारे भी पेड़ काटने का विरोध कर रहे हैं। इस से पूर्व पर्यावरण संरक्षण संगठन वनशक्ति और आरे बचाओ ग्रुप के बैनरतले जनता की गुहार पर नेशनल ग्रीन ट्रिव्यूनल (एनजीटी) की पुणे बेंच ने दिसम्बर 2016 में निर्माण न कराने का आदेश दिया था। वन विभाग ने आरे कालोनी को जंगल मानने से ही इंकार किया। इसके बाद एनजीटी ने उस इलाके में केन्द्र सरकार के अधिकार वाली जमीन को छोड़कर राज्य सरकार की भूमि पर निर्माण को ग्रीन सिग्नल दे दिया।

ध्यान रहे कि देश की आजादी के चौथे वर्ष अर्थात 1951 में ही तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने पौध रोपड़ कर डेयरी उद्योग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आरे फिल्म कालोनी की आधारशिला रखी थी। नेहरू जी के पौध रोपड़ के बाद इस क्षेत्र में इतने पेड़-पौधे लगाये गये कि 3166 एकड़ क्षेत्रफल में कुछ ही समय में जंगल का रूप ले लिया था। हालांकि देवेन्द्र फडणवीस की सरकार भी इस जंगल की रक्षा करना चाहती थी और मेट्रो के लिए पार्किंग शेड बनाने के लिए मेट्रो कम्पनी को कोई अन्य जगह तलाशने को कहा था। मेट्रो कम्पनी को कोई अन्य लोकेशन नहीं मिली। मुंबई जैसे शहर में, जहां फुटपाथ पर सोने के लिए चंदा देना पड़ता है, वहां मेट्रो को शेड बनाने के लिए जगह कहां से मिलती। नतीजा यह हुआ कि मेट्रो ने आरे कालोनी को ही शेड बनाने के लिए चिह्रित किया था।

 इस प्रकार आरे कालोनी को लेकर उसकी पर्यावरण रक्षा की चिंता कम है बल्कि राजनीति ज्यादा हो रही है। सरकार को राज्य और शहरों के विकास की चिंता भी करनी पड़ती है। इसलिए देवेन्द्र फडणवीस की सरकार मेट्रो को प्राथमिकता दे रही है। इससे मुंबई के कितने ही लोगों को रोजगार भी मिलेगा। 

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