Friday, October 18

बच्चों के अंक कम आये तो बढ़ायें हौंसला

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Sonia Sharma (Special Correspondents)

प्र तिस्पर्धा के इस दौर में हर कोई आगे निकलना चाहता है और ऐसे में बच्चों पर परिक्षाओं में ज्यादा से ज्यादा अंक लाने का दबाव रहता है। दसवीं में अधिक अंक से जहां मनचाहा विषय मिलता है वहीं 12 वें बेहतर अंकों से ही अच्छे कॉलेजों में दाखिला मिलता है। वहीं कम अंक आने पर कई प्रकार की परेशानियां होती हैं। ऐसे में बच्चों पर अधिक अंक लाने के लिए भारी मनोवैज्ञानिक दबाव रहता है।

 इन हालातों में अगर बच्चों का रिजल्ट अच्छा रहा है तो ठीक है पर अगर किसी कारणवश बच्चों के नंबर कम आए हैं या फिर वह असफल हुए हैं तो भी निराश न हों और ऐसे में अभिभावकों की भी विशेष जिम्मेदारी रहती है। उन वैसे स्टूडेंट्स तनाव की स्थिति में जा सकते हैं। इन सबको देखते हुए अभिभावकों को अपने बच्चों की खास देखभाल करने के साथ ही उन्हें प्रोत्साहित करने की जरूरत होती है। 

बच्चे से बात करेंकम नंबर आने पर बच्चे जितना अपने रिजल्ट से खुद दुखी नहीं होते, उससे कहीं ज्यादा इस बात को लेकर परेशान रहते हैं कि वे अपने अभिभावकों की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे क्योंकि माता-पिता पर उनके भविष्य को लेकर जो दबाव रहता है उससे बच्चों को भी तनाव हो जाता है। मनोचिकित्सकों के अनुसार का कहना है कि अभिभावक अपनी महत्वाकांक्षाएं बच्चों पर न लादें और बच्चों से बात करें। बात करने से बच्चों का तनाव कम होता है और फिर उनमें एक नई उर्जा आती है कि यह परिणाम उनकी जिंदगी का फैसला नहीं कर सकता। उसे समझाऐं कि आगे बढ़ने के लिए भविष्य में ऐसे कई अवसर मिलेंगे बस अपनी गलतियों को ठीक कर मेहनत करें।

बच्चों को न डांटें: मनोवैज्ञानिकों के अनुसार उम्मीद के अनुसार रिजल्ट न आने के बाद बच्चों के अंदर एक डर बैठ जाता है। धीरे-धीरे वह खुद हीन भावना का शिकार हो जाते हैं। 90 प्रतिशत मामलों में बच्चों की समस्या बात करने से दूर हो जाती है। अभिभावकों के प्यार भरे दो शब्द बच्चे को अवसाद से निकाल सकते हैं। बच्चे का परिणाम अगर खराब भी हुआ है तो भी उसे बहुत ज्यादा न डांटें और किसी भी तरह की टिप्पणी से बचें। इसकी जगह उसे बेहतर करने प्रेरित करें।

तुलना कभी न करें: अपने बच्चे के रिजल्ट की तुलना अपने दोस्तों या रिश्तेदारों के उन बच्चों से बिलकुल न करें जिन्होंने आपके बच्चे से बेहतर प्रदर्शन किया है। हर बच्चा अपने आप में यूनीक होता है और हर बच्चे की प्रतिभा और दिमाग दूसरे बच्चे से अलग होता है। सबसे अहम बात दूसरों के सामने बच्चे के रिजल्ट की आलोचना बिलकुल न करें। इससे बच्चे के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती है और वह हीन भावना कर शिकार हो जाता है।

ताना न दें: अगर आपके बच्चे का परिणाम आपकी या बच्चे की उम्मीदों के मुताबिक नहीं है तब भी बच्चे को बेवजह का उपदेश न दें कि मैंने तो तुम्हें पहले ही कहा था, तुम्हें और मेहनत करनी चाहिए थी। इस तरह की बातों से बचें। इस तरह की बातों से बच्चे की निराशा और तनाव में बढ़ोतरी होती है। इस वक्त बच्चे की पिछली गलतियों का जिक्र कर उसे असफल ठहराने की बजाए, बच्चा भविष्य में बेहतर कैसे कर सकता है, यह सोचने की जरूरत है।

बच्चों का ध्यान रखें: परिणाम आने के बाद अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों पर नजर रखें। तनाव दूर करने के लिए वह बच्चे के साथ गेम्स या मूवी भी देख सकते हैं। रिजल्ट जारी होने के बाद बच्चे के व्यवहार में होने वाले परिवर्तन पर गौर करें। बच्चे से आराम से बात करें। अभिभावकों की उपेक्षा का बच्चों पर बुरा असर पड़ सकता है और वह गलत कदम उठा सकते हैं। लिहाजा जहां तक संभव हो बच्चे को प्रोत्साहित करने की कोशिश करें।

अवसाद के लक्षणों को समझें: अगर आप सबकुछ कर चुके हैं लेकिन फिर भी लगता है कि आपका बच्चा समाज के साथ जुड़ नहीं पा रहा है, जो चीजें उसे पसंद थीं अब नहीं हैं या वह अपने दोस्तों से भी नहीं मिल रहा है। तो इस बात को गंभीरता से ले क्योंकि यह अवसाद है और ऐसे में किसी मनोचिकित्सक से काउंसलिंग करायें और घर का माहौल बेहतर रखें।

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