Tuesday, November 12

तीन फैसलों से इन्दिरा ने बदल दिया भारत

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सदियों तक भारत की गलियों में ‘इंदु से इंदिरा’ की अमर गाथा गूंजती रहेगी

पुण्य तिथि (31 अक्टूबर) पर विशेष

राहुल शर्मा।
भारत की आइरन लेडी कही जाने वाली श्रीमती इन्दिरा गांधी ने अपने तीन फैसलों से भारत की तस्वीर बदल दी थी। उनके ये तीन फैसले बैंकों का राष्ट्रीयकरण, राजा-महाराजाओं के प्रिवीपर्स की समाप्ति और पाकिस्तान के दो टुकड़े करवाकर बांग्लादेश का निर्माण करवाना माना जाता है। भारत की पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी चट्टानी इरादों की नेता थीं और उन्हांेने इसदेश की एकता के लिए अपनी कुर्बानी भी दे दी। पंजाब को अराजकता की आग से बचाने के लिए श्रीमती इंदिरा गांधी ने आपरेशन ब्लू स्टार के तहत भिंडरावाले जैसे अलगाववादी नेताओं को ठिकाने लगा दिया, तो धर्मान्ध सिखों ने, जो इन्दिरा गांधी की सुरक्षा के लिए तैनात थे, उन्हांेने ही 31 अक्टूबर को गोलियों से उसी जिस्म को छलनी कर दिया, जिसकी रक्षा का दायित्व उन पर था। इस प्रकार इलहाबाद के आनंद भवन मंे 19 नवम्बर 1917 को जन्मी इन्दू का 31 अक्टूबर 1984 को इस तरह से अंत हुआ जिसे यह देश कभी भुला नहीं सकता। कांग्रेस पार्टी को भी इन्दिरा गांधी की बहुत याद आ रही होगी क्योंकि राजनीति मंे औंधे मुंह गिरने के बाद सीना तानकर खड़ा होने का जज्बा किसी कांग्रेसी में नहीं दिख रहा है।
श्रीमती इंदिरा गांधी को इतिहास खासतौर से इस बात के लिए भी याद करेगा कि उन्होंने इस देश के गरीब नागरिकों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने के लिए उन्हें बैंकों से सीधे ऋण दिलवाया। वर्ष 1981 से 1984 के बीच भारत में गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या 8 करोड़ थी जिनको सीधे बैंकों की आर्थिक सहायता प्रदान की गयी जिससे उनकी आर्थिक स्थिति सुधरे। 20 सूत्री कार्यक्रम बनाया गया प्रदेश, जिला और प्रखंड स्तर पर सीधे समूचे देश को इन सूत्रों में बांध दिया जिससे निर्धन ग्रामीणों की छोटी-छोटी समस्याएं काफी हद तक हल हुई और गरीब, नागरिकों ने राहत की सांस ली। यदि श्रीमती गांधी को क्रूर काल ने असमय हमसे न छीना होता तो ये समस्याएं अब तक खत्म हो गयी होतीं। उन्होंने कृषि सुधार के लिए क्रांतिकारी कदम उठाये। सीलिंग का कानून लायीं और बड़े जमींदारों से जमीन लेकर भूमिहीन नागरिकों के बीच बांटी। भूमिहीन नागरिकों के लिए आवास बनाकर दिये। इसी तरह से अपने प्रधानमंत्रित्वकाल में उन्होंने राजा-रजवाड़ों के प्रीवीपर्स और उनकी विशेष सुविधाएं समाप्त कर वर्ग भेद को मिटाने का प्रयास किया, जिससे समाज में समानता स्थापित हो सके। उन्होंने जो किया उसे इतिहास हमेशा याद रखेगा। भारतीय बैंकिंग प्रणाली, जो पूंजीपतियों के हाथ में थी और उन्हें ही उससे पैसा मिलता था, इंदिरा जी ने क्रांतिकारी परिवर्तन करके बैंकों को भारत के गांव-गांव में गरीबों के दरवाजे तक पहुंचा दिया। उदाहरण के लिए जिस वक्त इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया उस समय बैंक की शाखाओं की संख्या पूरे देश में लगभग सात हजार थी जो आज बढ़कर करोड़ों में पहुंच गयी है।
इंदिरा जी की सबसे बड़ी चिंता देश की एकता और अखण्डता की थी। वह हर समय देश में एकता की जड़ों को मजबूत करने के बारे में ही सोचती रहती थीं। उन्होंने धर्म को राजनीति से अलग रखने का निरंतर प्रयास किया और यह चाहा कि इस देश में सभी धर्मों, सम्प्रदायों और जातियों के लोग मिलजुल कर एक साथ रहें और इसमें उन्हें काफी सफलता भी मिली, जिसका बहुत बड़ा उदाहरण वर्ष 1971 में भारत-पाक युद्ध और बांग्लादेश का उदय है।
इंदिरा जी का सवालों को हल करने का अपना तरीका था। जब कोई राष्ट्रीय समस्या होती थी तो समय-समय पर विरोधी दलों से भी वह विचार-विमर्श करती थीं। यही उनकी विशेषता थी कि वह मतभेदों के बावजूद विरोधियों के दृष्टिकोण को महत्व देती थीं। वह सबकी बात बड़े ध्यान से सुनती थीं और किसी मामले में बहुत सोच-समझकर अपनी राय बनाती थीं।
यह सभी जानते हैं कि इंदिरा जी कितनी धार्मिक व्यवहार वाली महिला थीं। वह आनन्दमयी माता जी को जितना मानती थीं, शायद बहुत कम लोग मानते हैं। वह जितना धार्मिक स्थलों में जाती थीं, पूजा करती थीं, वह भी लोगों के लिए एक मिसाल है। पूरे भारत में जितने मंदिर थे उनमें वह कई बार गयीं। धार्मिक आस्थाओं में तो इंदिरा जी की एक भारतीय नारी के रूप में पहचान थी। लेकिन वह उतनी ही धर्मनिरपेक्ष भी थीं। एक तरफ निजी जिंदगी में अति धार्मिक रहना और दूसरी ओर लोक व्यवहार में, राजनीतिक व्यवहार में सामाजिक व्यवहार में उतना ही धर्मनिरपेक्ष रहना यह मर्यादा इंदिरा जी में जिन्दगी भर निभाई।
श्रीमती गांधी के व्यक्तित्व में साम्प्रदायिकता के लिए कोई जगह नहीं थी। साम्प्रदायिकता से उन्हें तकलीफ तो होती थी मगर साम्प्रदायिकता के मसले पर वह किसी के समक्ष नहीं झुकीं बल्कि अपनी शक्ति से उन्होंने उसका विरोध किया तथा साम्प्रदायिकता समाप्त करने के लिए सदैव प्रयासरत रहीं।
इंदिरा जी ने अपने जीवन की अंतिम सांस तक धर्मनिरपेक्षता और आदमी पर आदमी के विश्वास का जो इतिहास पेश किया है, उसके लिये स्वयं इतिहास तरसता रहेगा लेकिन इतने बड़े विश्वास पर भी विश्वासघात को तरस नहीं आया। राजनीतिक
रूप से वे अपने को कितना भी असुरक्षित महसूस करती हों, पर एक व्यक्ति के रूप में उनका व्यक्तित्व महान था।
इंदिरा जी ने भुवनेश्वर की एक सभा में कहा था कि ‘देश की सेवा करते हुए मेरी जान भी चली जाय तो मुझे गर्व होगा।’ लगता है क्रूर काल यह सुन रहा था। कौन जानता था कि यही वाक्य उनका आखिरी और अमर संदेश बन जायेगा। यह ठीक है कि इंदिरा जी इतिहास के पृष्ठों पर अंकित हो गयीं परंतु जाते-जाते देश के सामने एक विकट सवाल छोड़ गयीं कि इस दुनिया में जीने का कौन सा रास्ता होगा? हिंसा का या अहिंसा का? धर्मनिरपेक्षता का या धर्मांधता का? जब भी हम साम्प्रदायिकता, धर्मांधता और प्रतिशोध में अंधे होकर रास्ता भूल जायेंगे तब हमें श्रीमती इंदिरा गांधी की याद आयेगी क्योंकि अब वे इतिहास ही नहीं, भारतीय जनता और सम्पूर्ण मानवता के अंतःकरण और विवेक का हिस्सा बन चुकी है। उन्होंने हर भारतीय को भारतवासी होने पर गर्व करना सिखाया, आत्मनिर्भर होने की प्रेरणा दी, विश्व राजनीति में भारत को सम्मान दिलाया, गरीब और पिछड़े तबकों के लिए कल्याणकारी कार्यक्रम बनाये, उन्हें लागू किया, देश को खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर किया, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत को एक शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया, भारतीय सेना का खोया हुआ आत्मविश्वास लौटाया, उनके नेतृत्व में भारत ने विकास की दिशा में अंतरिक्ष की दूरियां तय कीं।
सबसे बड़ी खूबी इंदिरा जी में यही थी कि अपने व्यक्तिगत जीवन को सामाजिक जीवन से अलग ही रखती थीं और यही कारण था कि एक राजनीतिक के रूप में वह हमेशा शीर्ष पर रहीं। बचपन में मां की मृत्यु फिर पति का असमय इस दुनिया से चले जाना, सिर से पिता का वरदहस्त उठना और अंत में छोटे बेटे का बिछोह, किसी को भी तोड़कर रख सकता था लेकिन इंदिरा जी की दृढ़ इच्छाशक्ति, परिस्थितियों से समझौता तथा अदम्य साहस का ही परिणाम था कि वे पूरे विश्व में एक प्रखर नेता के रूप में अपनी पहचान बना चुकी थीं।
आज इंदिरा जी हमारे बीच नहीं हैं परंतु उनकी आत्मा भारत की आत्मा में रच-बस गयी है। सदियों तक भारत की गलियों में ‘इंदु से इंदिरा’ की अमर गाथा गूंजती रहेगी क्योंकि इंदिरा जी एक व्यक्ति का नाम नहीं यह हमारे देश की जमीर का नाम है। उनके सिद्धांत, उनके बताये रास्ते तथा आदर्श इस देश को हमेशा आगे की ओर बढ़ने में मदद करेंगे।

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