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अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक बातचीत के जरिए तनाव कम होने की उम्मीद नही

जिनेवा। अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक बातचीत के जरिए तनाव कम होने की उम्मीदें अभी जगी ही थीं कि वाशिंगटन के एक नए सैन्य कदम ने क्षेत्र में युद्ध की आशंकाओं को फिर से हवा दे दी है। एक ओर जहां दोनों देश परमाणु मुद्दे और आर्थिक प्रतिबंधों पर मेज पर बैठकर चर्चा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अमेरिका ने पिछले 24 घंटों के भीतर ईरान की सीमाओं के करीब 50 से अधिक अत्याधुनिक फाइटर जेट तैनात कर दिए हैं। सैन्य विशेषज्ञों और स्वतंत्र फ्लाइट-ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, इन विमानों में दुनिया के सबसे घातक लड़ाकू विमान माने जाने वाले एफ-22 रैप्टर, एफ -35 लाइटनिंग और एफ -16 शामिल हैं। इन लड़ाकू विमानों के साथ एरियल रिफ्यूलिंग टैंकरों की मौजूदगी इस बात का संकेत दे रही है कि अमेरिकी वायुसेना किसी बड़े और लंबी दूरी के ऑपरेशन की तैयारी में है।

सैन्य बेड़ों की इस आक्रामक आवाजाही की पुष्टि अमेरिकी रक्षा अधिकारियों ने भी की है। उनके अनुसार, अमेरिका इस क्षेत्र में अपनी हवाई और समुद्री मारक क्षमता को और अधिक मजबूत करने में जुटा है। केवल आसमान ही नहीं, बल्कि समुद्र में भी घेराबंदी सख्त कर दी गई है। यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप, जो पहले कैरिबियन क्षेत्र में था, अब अटलांटिक को पार कर तेजी से ईरान की ओर बढ़ रहा है। इस विशाल युद्धपोत के साथ तीन गाइडेड-मिसाइल डिस्ट्रॉयरकृयूएसएस महान, यूएसएस बैनब्रिज और यूएसएस विंस्टन चर्चिल भी तैनात किए गए हैं। चूंकि यूएसएस अब्राहम लिंकन और अन्य लड़ाकू बेड़े पहले से ही खाड़ी क्षेत्र में मौजूद हैं, इसलिए इस नई तैनाती ने ईरान पर संभावित हमले या कड़ी सैन्य घेराबंदी की चिंताओं को गहरा कर दिया है।

हैरानी की बात यह है कि यह सैन्य लामबंदी उस समय हो रही है जब जिनेवा में दोनों देशों के बीच अप्रत्यक्ष बातचीत का दूसरा दौर सकारात्मक रहा है। मंगलवार को हुई इस बैठक में ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने परमाणु कार्यक्रम और अपने ऊपर लगे प्रतिबंधों को हटाने की शर्तों पर अपना रुख स्पष्ट किया। बातचीत के बाद ईरानी विदेश मंत्रालय ने संकेत दिए कि कुछ बुनियादी मुद्दों पर दोनों पक्ष सैद्धांतिक रूप से सहमत हुए हैं और तीसरे दौर की बैठक के लिए भी सहमति बनी है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने यहां तक कहा कि पिछली बैठकों की तुलना में अच्छी प्रगति हुई है और समझौते का रास्ता खुलता दिख रहा है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि जब किसी समझौते के मसौदे को अंतिम रूप देने और उसे लिखने की बारी आती है, तो मतभेद उभरने लगते हैं जिन्हें सुलझाने में वक्त लगेगा।

जिनेवा की इस उच्च स्तरीय बैठक में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और उनके सलाहकार जेरेड कुशनर की मौजूदगी ने संकेत दिया था कि व्हाइट हाउस इस विवाद का कूटनीतिक समाधान चाहता है। लेकिन जमीन पर अमेरिका की सैन्य सक्रियता एक अलग ही कहानी बयां कर रही है। विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका एक तरफ बातचीत की मेज पर ईरान को रियायतें देने के लिए कह रहा है, तो दूसरी तरफ भारी सैन्य दबाव बनाकर उसे मजबूर करने की रणनीति अपना रहा है। फिलहाल, मिडिल ईस्ट में तैनात 50 से ज्यादा नए फाइटर जेट और बढ़ते नौसैनिक बेड़े ने शांति की कोशिशों के बीच अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है। अब दुनिया की नजरें तीसरे दौर की बातचीत पर टिकी हैं कि क्या कूटनीति सैन्य टकराव को टालने में सफल हो पाएगी।

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