Tuesday, November 12

श्रीराम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद

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लेखक- यतीन्द्र नाथ गौड़, ई-332, ईस्ट बाबरपुर, शाहदरा, दिल्ली-110032।

इतिहास गवाह है कि भारत में श्रीराम त्रेता युग में पैदा हुए और पैदा होते ही भारत से लेकर श्रीलंका तक उनका डंका बजता रहा और अब भी बज रहा है और आगे भी यूं ही बजता ही रहेगा जबकि बाबर तो भारत में पैदा ही नहीं हुए। उनका जन्म कलियुग में हुआ। बाबर तो बाहर ही से हिन्दुस्तान में आया था और आकर यहां जोर-जर्बदस्ती से हुकूमत की।

बाबर की सेना के सेनापति मिर बाॅकी ने अयोध्या में श्रीराम चबूतरे पर बने प्राचीन श्रीराम मंदिर के पुजारियों/पंडितों से हुकूमत की हेंकड़ी दिखाकर इसी मंदिर के परिसर एक भाग पर कब्जा करके मस्जिद का निर्माण सन् 1527 में कराया और फिर मस्जिद का नाम अपने बादशाह के नाम पर बाबरी मस्जिद रख दिया। याद रहे जब इस विवादास्पद जमीन को उस समय भी छीना गया था तब भी वहां श्रीराम मंदिर के पुजारियों, पंडितों तथा वहां की आम जनता ने भी इसका काफी विरोध किया था किंतु जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत सही सिद्ध हुई और एक बादशाह की ताकत के सामने सबको जहर की घूंटभर कर चुप रह जाना पड़ा। यहां यह बात भी दीगर है कि एक मान्यता के अनुसार जिस स्थान पर किसी भी धर्म की पूजा होती हो, वहां इबादत की ही नहीं जा सकती। इस बात को इक तरफा रखते हुए तत्कालीन बादशाह की ताकत ही रंग लायी और इस प्रकार मस्जिद जबरन बनायी गई।

यहां यह भी समझने योग्य एक तथ्य है कि उसके बाद भी यहां के मुस्लिम बादशाहों ने अनेकों मंदिरों को तोड़-ताड़कर रातों-रात और आनन-फानन में मस्जिदों और अन्य इमारतों का निर्माण कराकर हिन्दू संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट करने और मुस्लिम संस्कृति को स्थापित करने का काम बड़े स्तर पर जबरन किया। इसका जीता-जागता उदाहरण आज भी दिल्ली में कुतुब मीनार के पास पड़े खंडहर में देखा जा सकता है। इस खंडहर में अंदर जहां बीचों-बीच लोहे की लाट गड़ी है उसके बाहर बाॅयी तरफ ही काले पत्थर पर खुदा है कि तत्कालीन 24 जैन मंदिरों को तोड़कर यह इमारत बनायी गई। उस समय की बनी इस इमारत में भी उन मंदिरों के मलबों का इस्तेमाल किया गया। इसका प्रमाण है कि इस खंडहर में प्रवेश करते ही बांये हाथ की तरफ बनी तिदरीध्बरांडे में पत्थर के एक खंभे को उलटा चिन दिया गया।

इतना ही नहीं मुगल काल में ही ज्यादातर गांवों, कस्बों और शहरों के नाम भी मुगल कालीन नामचीन लोगों के नाम पर ही रख दिये गये। बात लंबी हो जायेगी और कहीं-की- कहीं चली जायेगी। अतः सारांश में अयोध्या के राम मंदिर और बाबरी मस्जिद के जमीन विवाद मामले को लेकर दोनों पक्षों में इतनी खींचतान के बाद भी सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला अभी तक भी जग-जाहिर नहीं कर पाया है। जबकि एक बार सरकारी निर्णय के अनुसार कानूनी सभी विवादों का निर्णय 6 माह के अंदर-अंदर किये जाने के आदेश हुए थे। ऐसे में नम्र निवेदन है कि अड़ियल रवैये को छोड़कर वर्तमान में पढ़े-लिखे समझदार दोनों ही पक्ष त्याग करने में ही सुख है, शांति है और चैन भी है के आधार पर पूरी-की-पूरी अयोध्या ही श्रीराम की जन्म स्थली है ऐसा मानकर इस विवाद को हँसी-खुशी और भाईचारे के वातावरण में ही सुलझा लें तो ही बेहतरी है। कारण यह तो युगों का फाॅसला है त्रेता और कलियुग की बात है। तत्कालीन बादशाह की ताकत और आज के न्याय की बात है। सो इस बात को अब सुप्रीम कोर्ट भी ज्यादा न खींचे इसी में सभी की भलाई है। फिर कोर्ट तो न्याय की तराजू होता है जो सभी को मान्य होना चाहिए।

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