Friday, October 18

श्राद्ध क्यों करेंः स्वामी राजेश्वरानंद महाराज जी

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मित्रों! इस बहस में पड़ने की क्या जरूरत है कि पूर्वजों को खाना पहुंचता हैं या नहीं? अपने पूर्वजों की स्मृतियों को ताजा करने व उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के दिन के रूप में पितृपक्ष। भागम-भाग भरे जीवन में व्यक्ति अपने पूर्वजों को भूलता जा रहा है उनकी पुण्य स्मृति में व्यक्ति कुछ शुभकार्य कर ले इतना ही समझो। इच्छाओं या भयवश श्राद्ध करने की जरूरत नहीं है श्राद्ध का संबंध श्रद्धा से है। श्रद्धा यानी प्रेमपूर्वक पूर्वजों की स्मृति में कुछ ऐसा कर्म करें जिसमें परहित समाहित हो।

 श्राद्ध पक्ष में नई चीजें नहीं खरीदनी चाहिए? 
यह मानसिकता बिल्कुल निराधार हैं। लोग भ्रांतियों में जीना चाहते हैं। पुराने समय में लोगों का जीवन गांव में व्यतीत होता था। रहन-सहन साधारण होता था, पितृपक्ष को बहुत विधिवत पूजन के रूप में करने के कारण कस्बों-नजदीक शहरों में जाकर सामान खरीदने का समय नहीं मिल पाता था। आज श्राद्धकर्म में ज्यादा विधि विधान भी नहीं रहा, गांव वाला जीवन भी नहीं है पर बात वहीं अटकी हुई है। कुछ भी नई चीज खरीदने में कोई दोष नहीं है बल्कि पित्तरों को प्रसन्नता प्राप्त होगी। इन बातों में पड़ने से अच्छा है कि पूर्वजों की पुण्य स्मृति में कुछ खरीदकर बांटो।

 दोनों तरफ गलत 
मित्रों! श्राद्ध चल रहे हैं लोग पण्डित जी को बोलते हैं मेरे पिताजी बैगन का भुर्ता बहुत खुश होकर खाते थे आप भी भुर्ता ही खाइये। पंडित जी को भुर्ता पसन्द नहीं वह खाना चाहते हैं आलू पनीर पर हम तो भुर्ता खिलाएंगे। जब पिताजी भुर्ता मांगते थे तब हमारे पास समय नहीं था या हमें भुर्ता पसन्द नहीं था तो हमने बनाया नहीं। आज पण्डित जी खाना नहीं चाहते हम जबर्दस्ती खिला रहे हैं। वाह! दोनों तरफ ही जबर्दस्ती का पुण्य। अरे। जिसको भी भोजन करवाना है उसे उसकी इच्छानुसार करवाएं, बुजुर्गों को मन मर्जी का खाना परोसिए ताकि बाद में जबर्दस्ती किसी को न खिलाना पड़े।

 

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