Sunday, June 16

विदेश जाने वाले छात्रों की तादाद लगातार बढ़ रही

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सोनिया शर्मा (संवाददाता) 

भारतीय छात्रों के विदेश जाकर पढ़ने की तादाद तेजी से बढ़ रही है। हर साल लाखों विद्यार्थी विदेशी संस्थानों में प्रवेश ले रहे। विदेशी संस्थानों में दाखिले की होड़ के पीछे कई वजहें हैं। उनमें एक तो यह कि भारत में अभी तक पर्याप्त संख्या में विश्वस्तरीय संस्थान नहीं खड़े हो पाए हैं। दूसरा, कि भारतीय संस्थानों में पढ़ाई के बाद रोजगार के अवसर बहुत सीमित हैं। विदेशों में रोजगार की संभावनाएं अधिक हैं हालांकि भारतीय छात्रों की इसी ललक का लाभ उठाते हुए कई ऐसी एजेंसियों ने अपने पांव पसार लिए हैं, जो रोजगार का झांसा देकर फर्जी और कम गुणवत्ता वाले विश्वविद्यालयों में दाखिले का कारोबार चलाती रहती हैं। ऐसे में अगर आप विदेश पढ़ने जा रहे हैं तो पूरी छानबीन के बाद ही प्रवेश लें।

ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, कनाडा, न्यूजीलैंड, ब्रिटेन जैसे देश भारतीय छात्रों की पहली पसंद हैं। दूसरे क्रम में चीन और जर्मनी जैसे देश अपनी बढ़त बनाए हुए हैं। इस सूची में अमेरिका सबसे ऊपर है, जहां के विश्वविद्यालय और शैक्षिक संस्थान भारतीय छात्रों से भरे रहते हैं। 2010 से 2017 के बीच यूएस जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में बयालीस फीसदी की बढ़त आंकी गई। इसी तरह अन्य देशों में भी भारतीय छात्रों की लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। वर्ष 2013-14 के दौरान लगभग चौंतीस हजार भारतीय छात्रों को ऑस्ट्रेलियाई वीजा जारी किए गए। अन्य यूरोपीय देशों में भी भारतीय छात्रों के पलायन की दर कमोबेश यही रही। गौरतलब है कि 2009 में ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हुई नस्ली हिंसा की घटनाओं ने पलायन के सिलसिले को थोड़ा कमजोर जरूर किया, लेकिन छात्रों की आवाजाही यथावत बनी रही।

पलायन के कारण 
छात्रों के देश छोड़ कर बाहर जाने के कई कारण हैं, जिनमें देश में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कमी, व्यावहारिक प्रयोग के संसाधनों की कमी, आधारभूत संरचना और डिग्री के बाद भी रोजगार की अनुपलब्धता आदि प्रमुख हैं।

वहीं भूमंडलीकरण ने भारतीय छात्रों के लिए विदेशी शिक्षा की राह आसान कर दी है। यूनेस्को के आंकड़ों के मुताबिक 2013 तक विदेशों में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों की संख्या करीब एक लाख बयालीस हजार थी। इसमें वर्ष 1999 से 2006 के बीच भारी इजाफा दर्ज किया गया। एसोचैम के मुताबिक देश की लगभग पंद्रह अरब मुद्रा परोक्ष रूप से हर साल विभिन्न माध्यमों से विदेशी खातों में जा रही है। इतने बड़े पैमाने पर पलायन स्वाभाविक रूप से भारतीय कॉलेजों की क्षमता और गुणवत्ता पर सवाल खड़े करता है। विश्व की बड़ी शैक्षिक आधारभूत संरचना वाला देश, जहां छह सौ विश्वविद्यालय और चौंतीस हजार कॉलेज हैं और जहां हर साल लगभग सत्रह करोड़ विद्यार्थियों को प्रवेश दिया जाता है। करीब पांच करोड़ छात्र स्नातक की डिग्री लेकर हर साल बाहर निकलते हैं। वहां इतने व्यापक स्तर पर छात्रों का पलायन देश की शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

एक अनुमान के अनुसार आने वाले दशक में लगभग सौ करोड़ भारतीय छात्रों के पलायन की संभावना है। शैक्षिक संस्थानों की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहां सत्तर प्रतिशत से ज्यादा कॉलेज गुणवत्ता के मानकों पर खरे नहीं उतरते। ऐसे में अगर हालान ठीक नहीं होते तो प्रतिभा पलायन रोकना आसान नहीं होगा।

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