Friday, May 29

भारी कीमत चुकाने के लिए सरकार रहे तैयार।

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कोरोना जैसी बीमारी को हमें अगर रोकना है तो लाकडाउन का सख्ती से पालन करना होगा

सोनिया शर्मा।
दिल्ली। लाकडाउन के औचित्य को लेकर कोई सवाल नहीं किया जा सकता है। कोरोना जैसी महामारी से निपटने के लिए यही एकमात्र उपाय है। अमेरिका इटली ब्रिटेन जैसे देशों ने गफलत पाली तो इन साधन सम्पन्न देशों ने भी महामारी की बहुत भारी कीमत चुका रहे हैं। भारत में भी कुछ दिनों तक लापरवाही हुई लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फिर सख्त कदम उठाए और एक दिन का जनता कर्फ्यू लगाकर देख लिया कि देश की जनता उनके साथ कदम मिलाकर चलने के लिए तैयार है। उस समय बहुत से लोगों ने यह नहीं सोचा था कि यह जनता कर्फ्यू लम्बी अवधि का लाकडाउन बन जाएगा। लाकडाउन को भी कई लोगों ने हल्के में लिया और सरकार को अपना काम सख्त करना पड़ा। इसके बाद लोगों को परदे से अपने परिवार तक पहुंचने की चिंता सवार हुई।

सरकार ने हालांकि कहा था कि जो लोग बाहर हैं उनको वहाँ पर ही सहायता मिलेगी लेकिन लोग घबरा गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने और मुख्यमंत्रियों ने भी आश्वासन दिया है कि चाहे वो वर्क फ्रॉम होम कर रहे हैं अथवा घर पर बैठे हैं उनका पैसा नहीं कटेगा। इसके बाद भी लोगों को यकीन नहीं आ रहा है कि जब कोई काम नहीं हो रहा है तो पैसे कहां से आएंगे। इसलिए वे अपने घर लौट रहे हैं। यह कार्य बहुत हड़बड़ी में हो रहा है। इतनी हड़बड़ी में कि लोग अपनी जिंदगी की भी परवाह नहीं कर रहे हैं। जयपुर से एक युवक पैदल ही चल पड़ा। उसे मुरैना जाना था। लम्बी दूरी की यात्रा थी और लाकडाउन के चलते यातायात के साधन सीमित। रणवीर नामक यह युवक निश्चिंत रूप से हिम्मतवाला था लेकिन इतना लंबा सफर पैदल तय कर पाना बहुत ही जोखिम भरा था। रणवीर आगरा पहुंचने तक जीवन के सफर से थक गया। ऐसे कितने ही रणवीर अपने जीवन से हाथ धो रहे हैं जबकि इसी जीवन को बचाने के लिए श्री मोदी और उनकी सरकार ने लाकडाउन लागू किया है। इस लिए हड़बड़ी में कोई कदम न उठाएं। प्रधानमंत्री मोदी ने जनता को हो रही परेशानी के लिए इसीलिये माफी भी मांगी है। मन की बात में मोदी ने एक तरफ जहां कोरोना को पराजित करने की द्रढ इच्छा शक्ति दिखाई वहीं लोगों को हो रहे कष्ट के लिए क्षमा भी मांगी है ।
इसके सापेक्ष अमेरिका और इग्लैंड में लापरवाही बरतने के गंभीर नतीजे देखने को मिल रहे हैं। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जान्सन ने लाकडाउन का मजाक उड़ाया था। वहां इन पंक्तियों के लिखे जाने तक साढ़े सात सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी थी और साढ़े 14 हजार से ? अधिक संक्रमित पाए गए थे। ब्रिटेन के युवराज प्रिंस चार्ल्स व स्वास्थ्य मंत्री भी कोरोना से बच नहीं पाए।
भारत में इसका प्रभाव सबसे ज्यादा महाराष्ट्र में है। इसके बाद नम्बर उत्तर प्रदेश का है। भीड़ भाड वाला शहर दिल्ली भी है लेकिन वहां केजरीवाल की सरकार ने स्थिति को संभाल लिया है। भाजपा शासित गुजरात हरियाणा और कर्नाटक में प्रभावी कार्रवाई नहीं हो सकी है। लाकडाउन के बाद कई राज्यों में पलायन सबसे बड़ी समस्या बन गई है। केंद्र से लेकर राज्य सरकारें तक कह रही हैं कि आवश्यक वस्तुओं की कमी नहीं होने दी जाएगी। देश में खाद्यान्न का पर्याप्त भण्डार भी है। दिक्कत कुछ समय के लिए हो सकती है। उसे बर्दाश्त करने में ही भलाई है।
कई लोग यह बात नहीं समझ पा रहे हैं। महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात, आन्ध्रप्रदेश समेत कई राज्यों से लोग पैदल ही अपने गांव वापस जा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि सरकार कुछ कर नहीं रही है। राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार ने लाकडाउन के समय पलायन कर जा रहे अथवा राज्य में आ रहे लोगों के लिए पर्याप्त बसों का इंतजाम किया है। बताते हैं कि इन बसों को बाकायदा सेनटाइज किया जाता है। दूसरे राज्यों को जाने वाले लोगों को उनके राज्य की सीमा तक छोड़ते हैं। राज्य के लोगों की सीमा पर ही स्कैनिंग की जाती है। इसके बाद उन्हें प्रदेश की राजधानी जयपुर लाया जाता है। इसी प्रकार आन्ध्रप्रदेश में भी राज्य में आने वालों अथवा राज्य के बाहर आन्ध्रप्रदेश जाने वालों को भी सुविधा पहुंचायी जा रही है।
इस तरह थोड़ी सहनशीलता और धैर्य का प्रदर्शन करते हुए लग जहां हैं वहीं रहें तो लाकडाउन की शत प्रतिशत सफलता मिल सकती है। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो पा रहा है। महाराष्ट्र से खबर मिली है कि मुंबई पुणे समेत कई शहरों से मजदूर कामगार कैसा भी साधन लेकर अपने घर लौट रहे हैं। कोई साधन नहीं मिलता तो पैदल ही चल देते हैं। कुछ लोग सौ से लेकर दो सौ किलोमीटर की दूरी तय कर रहे हैं। वे अकेले भी नहीं बल्कि साथ में महिलाएं और बच्चे भी हैं। इस प्रकार उनकी यात्रा बहुत जोखिम भरी है। ऐसा ही जोखिम रणवीर ने जयपुर में उठाया लेकिन वह अपने घर मुरैना न पहुंच सका। रास्ते में आगरा में उसने दम तोड़ दिया। इसी प्रकार का जोखिम दिल्ली में बिस्किट सेल्समैन विनोद तिवारी ने उठाया। परिवार से लगाव सभी को होता है। वह कैंसर से पीड़ित था। उसने सोचा कि बीमारी और बेरोजगारी का दंश बच्चों को न झेलना पड़े इसलिए बच्चों व पत्नी के साथ मोपेड से गांव के लिए निकल पड़े। उनका घर। उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थ नगर जिला के वराहडा गांव में था। इतना लंबा सफर और यात्रा का ऐसा साधन। विनोद जब हाथरस के सिकंदराऊ के समीप पहुंचे तो उनके शरीर ने साथ छोड़ दिया। इस तरह की हड़बड़ी की कोई जरूरत नहीं है। लाकडाउन से सभी को किसी न किसी प्रकार की परेशानी हो रही है लेकिन कोरोना जैसी बीमारी को हमें अगर रोकना है तो लाकडाउन का सख्ती से पालन करना होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत 29 मार्च को देशवासियों से मन की बात करते हुए कष्ट के लिए लोगों से छमा मांगी लेकिन लाकडाउन में किसी प्रकार की लापरवाही न बरतने की अपील भी की है। जरूरत पड़ने पर सख्ती बरतने का निर्देश भी दिए हैं। इसलिए हड़बड़ी में परेशानी और भी बढ़ सकती है जैसा कि राजस्थान और गुजरात की सीमा से सटे पालघर जिले के तलासरी में दस लोगों को गिरतार किया गया जो टैंकर में छिपकर राजस्थान जा रहे थे। महिलाओं समेत दस लोग थे। सभी को अब चिकित्सा निगरानी में रहना होगा। इसलिए हड़बड़ी न करें और कोरोना को इस समय थोड़ा कष्ट सहन करके भी पराजित करें।

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