Saturday, July 11

बाल्यावस्था

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बालक हनुमान बचपन में बहुत ही नटखट स्वभाव वाले थे। वैसे भी वानर जाति से तो थे ही। फिर बचपना और तिस पर देवताओ की कृपा से उनके वरदानो का प्रभाव। इन सब बातों ने मिलकर उन्हें उपद्रवी बना दिया। फिर वे रुद्र के अंश तो थे ही। सो, वे अपने आस-पास के वातावरण में खलबली ही अधिक मचाए रखते थे। ऋषि-मुनियो को परेशान करना तो उनका खेल-मात्रा ही था। जन्म से वे निर्भीक और वीर भी थे। इसीलिए उन्हें कोई बल से वश में करने का साहस ही नही कर सकता था। कुछ बड़े हुए तो विद्या प्राप्त करने का अवसर आ गया। परन्तु उनकी चंचल बुद्धि जस-की-तस ही बनी रही। इन सभी बातों को ध्यान में रखकर उनके माता पिता खासे चिन्तित रहने लगे थे। उन्होंने हनुमान को राह पर लाने के लिए अनेकानेक उपाय भी किए। किन्तु, सब व्यर्थ। क्योंकि उनकी स्थिर बुद्धि थी ही नही। उनका मनमस्तिष्क तो खुराफात में ही अधिक लगा रहता था। हार-थक कर उन्होंने ऋषि-मुनियो से निवेदन किया, ‘कृपया आप ही इस नटखट को कुछ समझाइए। हमारी तो नाक में दम कर रखा है इसने।’, तब मुनियों ने विचार किया और सोचा कि हनुमान को अपनी क्षमताओं पर बड़ा ही घमंड़ हो गया है। तभी तो यह किसी को कुछ भी नही समझता। छोटे बड़े का ध्यान भी इसे नही रहता। किससे कैसा व्यवहार करना चाहिए, इसका भी ध्यान यह नही रखता है।

हमें इसके घमंड़ को समाप्त करने के उपाय ढूँढ़ने चाहिएं। उन्हें हनुमान पर लागू करना चाहिए। इसके लिए ऋषि-मुनियो ने युक्ति निकाली कि इसे इसके बल को भुलाने का प्रयत्न करना ही उत्तम और सहज और सरल उपाय रहेगा। सो, एक बार एक छोटे से उपद्रवी व्यवहार पर ऋषि-मुख से यह शाप अनायास ही फूट पड़ा। ‘हे हनुमान, तुम किसी को कुछ नही समझते। अतः जिस बल पर तुम ऐसा करते हो। हमारा शाप है कि तुम उसी बल को भूल जाओ। हाँ, जब भी तुम्हें कोई तुम्हारे सुकृत्यों की याद दिलाए। तब ही तुम्हें अपने बल का स्मरण हो। और तब ही तुम अपना बल प्रयोग, सार्थक और परोपकारी कार्यो में लगा पाओ।’ जैसे ही हनुमान ने यह शाप सुना तब तुरन्त ही वे अपने बल को बिसरा बैठे। ऐसा होते ही वे शान्त भाव में आ गए। उनमें स्थिरता भी आ गई। वे धीर-गंभीर दिखाई देने लगे।

हनुमान जी के जन्म के इस प्रसंग को और भी विस्तार से कुुछ यूँ भी समझ और जान सकते हैं। शचीपति देवराज इन्द्र की रूप और गुण से सम्पन्न अप्सराओं में पुंजिकस्थला नाम की एक रूपवती गुणवती अप्सरा भी थी। वह चंचला भी बहुत थी। एक बार उसने एक पहुँचे हुए ऋषि का उपहास कर दिया। परिणामतः ऋषि क्रोध में तमतमा कर शाप दे बैठे। ‘वानरी की तरह चंचल स्वभाव वाली। जा तू वानरी ही हो जा।’

यह शाप सुनते ही पुंजिकस्थला थर्र-थर्र काँपने लगी। वह रोती गिडगिडाती ऋषि के चरणों में पड़कर क्षमा-याचना मांगने लगी। अन्ततः ऋषि पसीज गए, बोले-‘देख, मेरा वचन झूठा तो हो नहीं सकता। वानरी का जनम तो तुम्हें लेना ही पड़ेगा। लेकिन तुम अपनी इच्छानुसार रूप धर सकती हो।जब चाहोगी तुम नारी रूप में भी स्वयं को ला सकती हो। स्त्राी का रूप धारण कर सकती हो।’ आगे जाकर वह अप्सरा गौतम ऋषि के यहाँ पुत्राी के रूप में जन्मी। वह धरती पर बडी ही रूपवती थी। उसके समान और कोई स्त्राी उस समय सुन्दर थी ही नही। तीनों लोको में विख्यात उस सुन्दरी कुंजर पुत्राी का नाम था।अंजना।

समय आने पर अंजना का विवाह वीरवर वनरराज केसरी से हुआ। कपिराज केसरी कांचन गिरि अर्थात सुमेरू पर्वत पर निवास करते थे। अंजना अपने पति केसरी के संग उसी पर्वत पर रहती थी। सुखमय जीवन व्यतीत करती थीं। केसरी अपनी रूपवती लावण्यमयी पत्नी अंजना से बहुत ही प्रेम करते थे। अंजना भी अपने पति में तन-मन से सदैव अनुरक्त रहती थी। समय बीतता गया। किन्तु अंजना को गर्भ न ठहरा। तब उन्होंने कठोर तप करने का दृढ़ निश्चय किया। उनकी घोर तपस्या को देख मतंग ऋषि उनके पास गए। उनसे कठोर तप करने का कारण पूछा। तब अंजना ने मुनि को सारी बात बतला दी और कहा कि मैं पुत्रा-प्राप्ति के लिए यह तप कर रही हूँ। कृपया, आप ही मुझे यशस्वी पुत्रा प्राप्ति का कोई उपाय सुझाइए।

अंजना की पीड़ा सुनकर तपोधन मतंग मुनि कहने लगे। तुम वृषभाचल पर्वत पर जाओ। वहाँ जाकर भगवान वेंकटेश्वर के भुक्ति-मुक्ति दायक चरणों की वन्दना करो। वेंकटेश्वर भगवान के नाम पर ही वृषभाचल पर्वत को वेंकटाचल पर्वत के नाम से पुकारा जाता है। उनके दर्शन करके कुछ ही दूरी पर स्थित आकाश गंगा नाम के तीर्थ में स्नान कर उसके पवित्रा जल को पीना। फिर उसके किनारे पर तीर्थ की ओर मुख करके वायु देवता की प्रसन्नता के लिए बहुत ही संयमी हो कर तप करना।

मतंग मुनि के कहे अनुसार अंजना तप करने लगी। उन्होंने अपने शारीरिक कष्टो की तनिक भी चिन्ता न की।

भगवान सूर्य मेष राशि पर थे। चित्रा नक्षत्रा युक्त पूर्णिमा की तिथि थी। अंजना के श्रद्धापूर्वक कठोर तप से वायु देवता प्रसन्न हो गए। सो, वे प्रकट हो गए। तब वे अंजना से कहने लगे। देवी! मैं तुम्हारे तप से अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम मनचाहा वर माँग लो। मैं प्रसन्न होकर वह वर तुम्हें अवश्य दूँगा। ये सुना तो देवी अंजना अति प्रसन्न हुई। फिर उन्होंने अपना मनोरथ वायु देवता के समक्ष कुछ यूं प्रकट कर दिया, बोली। हे महाभाग, मुझे पुत्रा प्रदान करो। ये सुनकर संतुष्ट हुए वायु देवता बोले। सुमुखि! मैं ही तुम्हारा पुत्रा होकर तुम्हें तीनों लोको में ख्याति प्रदान कराऊँगा। यह सुना तो देवी अंजना की प्रसन्नता की सीमा न रही।

अपनी प्राणप्रिया की वर-प्राप्ति की बात सुनकर वानरराज केसरी भी अत्यन्त प्रसन्न हुए।

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