Tuesday, November 24

गरीब की जिंदगी….

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ताज गोठी

चलो एक सर्द रात सड़क किनारे
एक गरीब की जिंदगी में झांकें
कैसे कटती है उसकी निशा
उसके ऐशगाह के लम्हों को ताकें।।

शबनम की बूंदें जहां
कहर बरपा रही हैं
चैन से सोने वालों, सोचो
पानी की नमी बिस्तर पर आ रही है।।

बरसों से अलमारी में जिस्म ढूंढ़ते
वो निराश पड़े हैं, बांटो इनको
गुरबत के मारे उसके बन्दे
बड़ी आस मे खड़े हैं।।

उफ, कैसे आ जाती है नींद
हमें खबर तक नहीं
जो सारी रात जिस्म समेटे पड़े हैं
खुदा को उनकी फिक्र तक नहीं।।

रोज गिला करते हैं खुदा से
अभी फलां चीज कम है
बाहर निकालो, कुछ दूर चलो,
देखो, जमाने में कितने गम हैं।।

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