Saturday, October 24

जिज्ञासु पत्रकार चुम्मकीय व्यवहार माधव कांत मिश्रा अब नहीं रहे

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गजेन्द्र चौहान
पूरे चार दशक तक भारतीय पत्रकारिता जगत में एक कर्म योद्धा की तरह अपनी अमिट पहचान छोड़ने वाले, अनेक पत्र-पत्रिकाओं के प्रधान संपादक, मार्ग दर्शक व संचालन करने वाले, राष्ट्रीय सहारा समूह को उसकी ऊंचाइयों तक ले जाने वाले और अपने अंतिम समय में सब परित्याग कर तपस्वी, सेवा कर्म और आध्यात्म की चेतना की मशाल उठाने वाले श्री माधव कांत मिश्रा जी, अर्थात् महामण्लेश्वर-मारतंड गिरी जी महाराज अचानक स्वर्गीय हो गए।

उन्होंने सभी कार्य आश्चर्य चकित करने वाले किए और अंत भी आश्चर्य और अचंभित, स्तम्भित कर देने वाला ही प्राप्त किया। अभी थे, अभी नहीं रहें। मेरी उनकी मुलाकात सबसे पहले कंचन जंघा भवन के तीसरे फ्लोर पर तब हुई जब वह श्रीमती मेनका गांधी की पत्रिका ‘सूर्या इण्डिया’ के हिन्दी संस्करण के संपादक नियुक्त हुए और यह सिलसिला शुरू हुआ तो लयबद्ध हो गया। कभी रात में तो कभी दिन में उनका फोन आ जाता। वह काफी समय तक फोन पर बात करते। सब कुछ अपने विषयक बताते और सब कुछ हमारे बारे में एक जिज्ञासु पुरुष की तरह जानना चाहते। लगता ही नहीं कि हम और वो कभी-कभी वर्षों तक नहीं मिले मिले तो ठीक ऐसे जैसे दो बिछुड़े हुए मिले हों। एक रोचक किस्सा यह कि उनके विषय में लोगों में बड़ी भ्रांतियां शुरू से रहीं, ऐसे लगता रहा मुझे कि वह अपने बारे में ऐसे भ्रांतियां जानबूझ कर फैलाते थे। वह कहते थे कि मैंने चिट्ठियों के अलावा कुछ लिखा ही नहीं है, लेकिन वह हिन्दी व अंग्रेजी दोनों भाषाओं के विद्वान थे।

उन्होंने वेद शास्त्र और तमाम धर्मग्रन्थों का अध्ययन किया था लेकिन बमुश्किल बहस में पड़ते थे। एक रात को अचानक अलीगढ़ में फोन गया और बोले एक अखबार है विश्व मानव मैं देख रहा हूं। आप हरियाणा में काम करोगे पर अभी के अभी जाना होगा। मैंने कहा कि ठीक है और मैं करनाल भेज दिया। वहां का माहौल देखकर मैं एक सप्ताह में ही भाग आया। इतनी अव्यवस्था में अखबार का प्रकाशन हो रहा था कि सारा स्टॉफ बुरे हाल में था। स्थानीय संपादक महेंद्र मनुज थे। वह संपादक ही नहीं लगते थे और पूरा स्टाफ उन्हें संपादक मानकर कदर करता था। माधव कांत मिश्र जी हौज खास में जमे थे मैं वापस आकर मिला तो कहने लगे आपको माहौल ठीक करने तो भेजा था। खैर एक लंबे समय मेरी उनकी मुलाकात नहीं हुई और एक दिन फिर उनकी सूचना दिल्ली में मेरे पास आई पता लगा कि एक राष्ट्रीय दैनिकका प्रकाशन करने जा रहे हैं। मैंने समझा कोई बड़ी बिदम्वना है। पर शीघ्र ही दैनिक राष्ट्रीय सहारा का प्रकाशन हो गया।

दैनिक सहारा से काफी गौरत-बे-गैरत नाम जुड़े पर माधव कांत जी ने न परवाह की और सफलता पूर्वक वर्षों दैनिक हिन्दी के प्रधान संपादक बने रहे। गले में पड़ा ऐनक, सजे संवरे बाल, लंब-सम चमकता, महकता और प्रफुल्लित कराता जीवंत व्यक्तित्व। सभी से सम भाव सहज ही मिलना-मिलाना लोगों को आश्चर्य में तब भी डालता था और अंत तक डालता ही रहा। ऐसे फक्कड़ की एक दिन अक्समात सूचना मिली कि सब कुछ त्याग दिया और संन्यासी हो गए। संन्यासी शीघ्र ही महामंडलेश्वर हो गए। यह सत्य है कि माधव कांत का चरित्र व जीवन उनके नाम के अनुरूप रहा। वह अपने संघर्ष कर्म से ही जाने जाते हैं उनके साथ कभी बड़ी भीड़ हुई तो कभी एकाकी नितांत अकेले। सच में उनका मन-तन सब एक जिज्ञासु का क्रंदन ही रहा। संवेदना और भाव में जहां यह चेतना के शिखर पर खड़े थे वहीं हर व्यक्ति को संतुष्ट करने की लालसा उनके मन में थी। बात इतनी सी कि अखबारी दुनिया में एक कहावत बन गई थी कि राजेन्द्र अवस्थी ‘कादम्बिनी’ के लगभग चालीस वर्षों तक संपादक रहे।

हिन्दुस्तान टाइम्स हाउस में ही उन्होंने अपना पूरा जीवन बिता दिया। इसके विपरीत माधव कांत जी ने अपने पूरे जीवन में अनेक पत्र-पत्रिकाओं में गुजारे और कहीं भी अपने स्वाभिमान से कोई समझौता नहीं किया। वह कोई धनिक व्यक्ति नहीं थे लेकिन उनका प्रभामंडल यह साबित कर देता था कि वह एक अजेय धनिक ही नहीं संपूर्ण पुरूष भी हैं। भाषा की तपश्चर्या ऐसी कि शब्द मुंह में आते ही मीठे बन जाते थे। हिन्दी दिवस के अर्द्ध रात्रि में वह संपूर्णतः विज्ञाम हेतु चले गए। सब संघर्षों अपकर्मों से बहुत दूर। उन्होंने हिन्दी भाषा के लिए सतत् संघर्ष साधना की। आज भी टेलीविजन की बहसों में हो या धर्म वक्ता के रूप में वह मानस तक संप्रेषित होने वाले हिन्दी बंध गाते-गाते सो गए। लेकिन किसी हिन्दी भाषी अखबार और हिन्दी चैनल ने उनका नाम तक नहीं लिया। अति दुखदः।

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