Wednesday, January 22

….वो अब भी मेरे ख्वाबों में

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-ताज गोठी

पुरानी याद जो कभी पुरानी न हुई
वो अब भी मेरे ख्वाबों में आ जाती है अक्सर,
नहीं कोशिश करता उसे रोकने की,
और न अब है वो मय्यसर।।

अधूरी गजल सी आज भी उसने
जगह बना रखी है दिल के कोने में,
बेमन लाख कोशिश करू उसे भुलाने की,
अभी तो वक्त लगेगा उन यादों को दफन होने में।।
….वो अब भी मेरे ख्वाबों में

कभी-कभी छुप कर ढूंढ़ता हूं उसे फेसबुक पर,
उस नाम जैसी सैकड़ों पर वो नहीं है कहीं पर,
फिर यह सोच कर बन्द कर देता हंू सारे ख्वाब,
खुदा ने बख्शना होता तो वो यहीं होती मेरे पास।।
….वो अब भी मेरे ख्वाबों में

दिल के लेन-देन में कोई ख्वाइश न थी,
न कभी छुआ, न हाथ पकड़ा कशिश आंखों में थी,
ऐसे पवित्र बंधन अब न जाने कहां खो गए,
मासूम दिल से उन्हें याद किया और न जाने कब सो गए।।
…वो अब भी मेरे खवाबों में

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