Tuesday, September 29

सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत है मां नर्मदा

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सदियों से अपने प्रवाह को निरन्तर बनाये हुए नर्मदा नदी जिस कल-कल निनाद के साथ प्रवाहित होती है वह अक्षुण है। नर्मदा अपने आंचल में सदियों से हमारी संस्कृति को समेटे हुए है। जीवन जीने की सीख के साथ भाईचारा और मेल-मिलाप का संदेश देती माँ नर्मदा को हम जीवनदायिनी भी कहते हैं। अविरल बहती नर्मदा देश की सबसे पुरातन नदियों में से एक है। नर्मदा देश की एक मात्र ऐसी नदी है जो पश्चिम दिशा की ओर बहती है। इसका अधिकाधिक भाग यहां मध्यप्रदेश में ही प्रवाहित होता है। माँ नर्मदा का उद्गम स्थल अमरकंटक है। उल्लेख मिलता है कि यहाँ पर प्राचीन काल में ऋषि मुनियों ने कठिन तपस्या-साधना की थी। नर्मदा हमारे लिए बहती नदी नहीं बल्कि सामाजिक समरसता का वह स्रोत है जो हमारी जीवनशैली को समृद्ध बनाती है।

नर्मदा नदी का धार्मिक महत्व अत्यधिक है। जन आस्था के प्रमुख केन्द्र नर्मदा घाट हैं वहीं वेद पुराणों में इसका उल्लेख प्रमुखता के साथ मिलता है। धार्मिक महत्व के अनुसार नर्मदा नदी पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है। यह दिशा देव दिशा मानी जाती है। कहा जाता है कि नर्मदा के कण-कण में भगवान शंकर का वास है। शिव पुराण एवं महाभारत में नर्मदा की महिमा का वर्णन किया गया है। कालीदास ने रघुवंशम में नर्मदा का उल्लेख रेवा नाम से किया था। आदि शंकराचार्य ने नर्मदा के उद्गम स्थल पर तप किया था, जबकि भगवान परशुराम नर्मदा वन से गुजरे थे। वेद-पुराण में उल्लेख मिलता है कि जब प्रलय आया तब सभी नदियाँ समुद्र से मिलकर क्षीण हो गईं थीं तब एकमात्र नर्मदा का अस्तित्व ही शेष था इसलिए नर्मदा को अमर और मोक्षदायिनी माना गया है।

अपने गौरवशाली अतीत को समेटे हुए नर्मदा नदी वर्तमान में जिस तरह गंगा की तरह प्रवाहमान है, इसका प्रमुख कारण इससे जुड़ी धार्मिक भावनाएं एवं आस्था हैं। वर्तमान में देखा जा रहा है कि मानव द्वारा की जा रही उदासीनता के कारण नदियों के अस्तित्व पर संकट आ गया है और गंगा तथा नर्मदा नदियाँ किसी तरह अपना अस्तित्व समेटे हुए हैं। धार्मिक आस्थाओं के बावजूद क्षिप्रा जैसी प्राचीन नदी समाप्त प्रायरू है। गुजरात, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र राज्यों में 1312 किलोमीटर बहकर अपने कछार में बसे लाखें लोगों की जीवन रेखा नर्मदा को भी राष्ट्रीय नदी घोषित करने की पहल हो चुकी है। नर्मदा और उसकी सहायक नदियों पर सैकड़ों छोटे-बड़े बाँध बनाकर सिंचाई और जल विद्युत उत्पादन से सम्पूर्ण नर्मदा घाटी के स्थायी विकास कार्यक्रम आगे बढ़ रहे हैं। इन बड़े राज्यें की विभिन्न परियोजनाओं पर अरबों रुपयों के विकास कार्यक्रम इसी आधार पर शुरू हुये थेताकि नर्मदा अपने उद्गम स्थल से लेकर अरब सागर में मिलने तक निरन्तर प्रवाहमान बनी रहे।

नर्मदा के तट पर समय-समय पर उत्सव का आयोजन होता है। इन उत्सवों के माध्यम से जनचेतना जागृत करने का प्रयास किया जाता रहा है। इसी श्रृंखला में मध्यप्रदेश सरकार ने एक और कदम बढ़ाया है नर्मदा जयंती पर अमरकंटक के पावन स्थल पर नर्मदा महोत्सव का आयोजन सुनिश्चित कर। महोत्सव के दौरान अमरकंटक में प्रतिदिन माँ नर्मदा तट राम घाट पर महाआरती के साथ माँ नर्मदा पर आधारित लाईट एण्ड साउंड शो का आयोजन होगा। महोत्सव में नर्मदांचल की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर , कला एवं कृषि उत्पादों का प्रदर्शन किया जायेगा। साथ ही जनजातीय कलाकारों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से सम्मानित कर नारी शक्ति पर केंद्रित विभिन्न कार्यक्रम प्रस्तुत होंगें।

सरकार के प्रयास हमारी कोशिशों में श्रीवृद्धि करने का होता है। हमारा यह प्रयास होना चाहिए कि हम नर्मदा को स्वच्छ और निर्मल रखें ताकि नर्मदा सारे रोगों और अवरोधों से मुक्त होकर कल-कल बहती रहे। राजनीतिक तथा भौगोलिक सीमाओं से परे हटकर समग्र और संपूर्ण रूप से नर्मदा को राष्ट्रीय चिंता में शामिल किया जाये। आज जबकि अतिक्रमण और प्रदूषण के आघात झेल रही नर्मदा नदी अपने पूरे वेग के साथ प्रवाहमान है, वहीं दूसरी तरफ औद्योगीकरण, वनों का विनाश तथा रासायनिक प्रदूषण इसके अस्तित्व को नुकसान पहुँचा रहे हैं। विशेष अवसरों पर नर्मदा नदी पर बाहरी स्रोतों से जल प्रवाह कर लोग धार्मिक प्रयोजनों की पूर्ति तो कर लेते हैंलेकिन नदी पर इसका कितना दुष्प्रभाव पड़ रहा है इस तरफ कोई ध्यान नहीं देता। विडम्बना है कि सार्वजनिक स्थान पर धूम्रपान कर पर्यावरण प्रदूषित करने के विषय पर कड़े नियम बनाकर जुर्माने का प्रावधान तो हमारे देश में होता है, लेकिन नदियों मे गंदगी बहाने वालों, उद्योगों के बेकार रसायनों को नदियों में प्रवाहित कर उसे दूषित करने वालों की सदैव अनदेखी की जाती है। 

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