Loading...
Mon, Nov 29, 2021
Breaking News
image
गणेश मेकदन्त्ं च हेरम्ब विध्ननाशकम् /10 Sep 2021 04:41 AM/    90 views

श्री गणेशजी एकदन्त कब हो गए

 
पृथ्वी लोक को क्षत्रियों को मुक्त करने के पश्चात् परशुरामजी एक बार अपने गुरु भगवान शंकरजी से मिलने के लिए कैलास पर्वत पर पहुँचे। वे बड़े उत्साहित थे कि अपने गुरु से भेंट कर वे उनका आशीर्वाद ग्रहण करेंगे। उन्होंने कैलास नगरी का भ्रमण किया। वे उसके सौन्दर्य को देखकर मंत्र मुग्ध हो गए। उनके मन में श्रीगणेश तथा कार्तिकेय से मिलने की भी प्रबल इच्छा थी। जैसे ही वे शंकरजी के निवास स्थान पर पहुँचे तो उन्हें सर्वप्रथम पार्वती नन्दन गणेशजी मिले। गणेशजी ने परशुरामजी से निवेदन किया कि अभी माता पार्वती तथा शंकरजी विश्राम कर रहे हैं। अत भेंट नहीं हो सकेगी। वहाँ जाना अभी उचित नहीं है। मुनिश्री को गणेशजी ने बहुत समझाया कि यह उनके विश्राम का समय है अत क्षमा करें। आप प्रतीक्षा करें। किन्तु परशुरामजी को यह बात कदापि स्वीकार नहीं थी। वे बलपूर्वक आगे बढ़े। गणेशजी ने उन्हें रोकने का प्रयत्न किया। दोनों में विवाद हुआ और मल्ल युद्ध होने लगा। कार्तिकेयजी भी वहाँ उपस्थित हो गए। उन्होंने भी उन दोनों के बढ़ते विवाद को देखकर स्थिति को सँभालने का प्रयत्न किया। गणेशजी को परशुरामजी का व्यवहार उचित नहीं लगा। परशुरामजी ने अपना परशु हाथ में लिया और युद्ध करने लगे। गणेशजी ने भी अपनी शक्ति लगाकर मुनिश्री को अपनी सूँड में लपेट लिया और उन्हें घूमाने लगे। परशुरामजी गणेशजी की इस शक्ति को देखकर अचंभित हो गए। परशुरामजी ने शिव द्वारा प्रदत्त स्तोत्र तथा कवच का श्रद्धापूर्वक पाठ किया और गौरीपुत्र गणेश पर अपने परशु से प्रहार कर दिया। अपने पिता के अमोघ अस्त्र के सम्मानार्थ गणेशजी ने अपने बाएं हाथ से परशु को थाम लिया किन्तु उस तेजस्वी परशु ने गणेशजी के बायें दाँत को समूल काट दिया और पुन परशुरामजी के हाथ में वापस आ गया। भयानक गर्जना के साथ गणेशजी का वह रक्तरंजित दाँत पृथ्वी पर गिर पड़ा। कार्तिकेय के साथ वीरभद्र आदि अनेक पार्षदगण भयाक्रान्त हो गए। विश्रामगृह में निद्रा में लीन शिवजी की निद्रा भंग हो गई। जैसे ही माता पार्वती बाहर आई उन्हें गणेशजी के मुँह से रक्त बहते हुए दिखा। उन्होंने देखा कि गणेशजी का एक दाँत टूटा पड़ा था। कार्तिकेय ने माता को सारा घटनाक्रम सुनाया। वे गणेशजी को गोद में लेकर विलाप करने लगीं। उन्होंने अग्र पूजित गणेशजी की महिमा परशुरामजी को सुनाई। पार्वती माता का क्रोध देखकर मुनिश्री ने मन ही मन अपने इष्टदेव श्रीकृष्ण का स्मरण किया। श्री कृष्ण बौने बालक का रूप धारण कर पधारे। शंकरजी और पार्वती का आतिथ्य उन्होंने स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि परशुरामजी ने गुरुपत्नी और गुरु पुत्र की अवहेलना की है इसीलिए मैं यहाँ उपस्थित हूँ। वे बोले.
श्न पार्वती परा साध्वी न गणेशात्परो वशी।
पार्वती से बढ़कर कोई पतिव्रता स्त्री नहीं है और गणेशजी से श्रेष्ठ कोई जितेन्द्रिय नहीं है। उन्होंने पार्वती माता से कहा कि जिस प्रकार गणेश और कार्तिकेय आपके पुत्र हैं उसी प्रकार परशुराम भी आपके पुत्र हैं। यह बालकों का विवाद है जो दैवदोष से घटित हुआ है। तुम्हारे इस प्रिय पुत्र का नाम श्एकदन्त्य हुआ। पुराणों में भी कहा गया है.
गणेश मेकदन्त्ं च हेरम्ब विध्ननाशकम्।
लम्बोदरं शूर्पकर्णं गजवक्त्रं गुहाग्रजम्।।
;ब्रह्मवैवर्त पुण् गणपति खंड ४४ध्८५द्ध
परशुरामजी ने भी माता पार्वती से क्षमा याचना की.
रक्षरक्ष जगन्मातरमपराधं क्षमस्वे।
शिशूनापराधेन कुतो माता हि कुप्यति।।
;ब्रह्मवैवर्त पुण् गणपति खंण् ४५ध्५७द्ध
अर्थात्. जगज्जननी! रक्षा करो, रक्षा करो। मेरे अपराध को क्षमा कर दो। बच्चे के अपराध पर भला माता कुपित होती है परशुरामजी रुदन करने लगे। माता पार्वती ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि भगवान आशुतोष की कृपा से तुम सर्वत्र विजयी रहो। परशुरामजी ने गणेशजी की स्तुति की और पार्वती तथा शंकरजी की चरण वन्दना पर प्रस्थान किया।

Leave a Comment