Wednesday, April 1

सबसे बड़ा धर्म है उपकार- आचार्य डा. राजेश ओझा।

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उपकार का मतलब है दूसरे का भला करना। अपने और अपने परिवार के लिए तो पशु-पक्षी भी जीते हैं लेकिन इनसे हटकर अन्य लोग हैं, जिनमें जीव-जंतु, वनस्पतियां आदि सभी शामिल हैं उनके हित में भी हमें सोचना चाहिए। जैब विविधता, पर्यावरण संरक्षण और विश्व शांति का प्रयास इसी भावना के तहत किया जा रहा है।  अठारह पुराणों में भगवान वेद व्यास के सारांश रूप में दो ही बचन हैं-एक परोपकार के समान कोई पुण्य नहीं और दूसरों को पीड़ा पहुंचाने के समान कोई पाप नहीं। यही बात गोस्वामी तुलसीदस ने भगवान शंकर और कामदेव के प्रसंग में बतायी है। कामदेव जानते थे कि भगवार शंकर का विरोध उनके लिए अनिष्टकारी होगा लेकिन देवताओं का हित हो रहा है तो परहित में प्राण भी चले जाएं तो यह धर्म है।
तारक असुर से त्रस्त देवता जब ब्रह्माजी के पास गये तो उन्होंने पाय बताया कि तारक को शंकर जी का पुत्र ही मार सकता है लेकिन शिव जी सती के वियोग में शादी की बात ही नहीं सोच रहे। ब्रह्माजी ने कहा-
मोर कहा सुनि करहु उपाई, होइहि ईस्वर करिहि सहाई।
सती जो तजी दच्छ मख देहा, जनमी जाइ हिमाचल गेहा।
तेहिं तपु कीन्ह संभु पति लागी, सिव समाधि बैठे सबु त्यागी।
जदपि अहइ असमंजस भारी, तदपि बात एक सुनहु हमारी।
पठवहु काम जाइ सिव पाहीं, करै छोभु संकर मनमाही।
तब हम जाइ सिवहिं सिरनाई, करवाउब विवाहु बरिआई।
एहि विधि भलेहिं देवहित होई, मत अति नीक कहइ सबु कोई।
अस्तुति सुरन्ह कीन्हि अति हेतू, प्रगटेउ विषमवान झष केतू।
मेरी बात सुनकर उपाय करो तो ईश्वर भी सहायता करेंगे। उन्होंने कहा कि सती ने जो दक्ष के यज्ञ में शरीर त्यागा था, वही हिमाचल के घर पार्वती के रूप में पैदा हुई हैं। उन्होंने शंकर भगवान को पति के रूप में पाने के लिए तपस्या की है लेकिन शंकर भगवान सब कुछ त्याग कर समाधि लगाकर बैठे हैं। यद्यपि यह बहुत बड़ा असमंजस है लेकिन मेरी बात सुनो। तुम (देवगण) जाकर कामदेव को शिव जी के पास भेजो। वह (कामदेव) शिवजी के मन में क्षोभ उत्पन्न करे इससे शिवजी की समाधि भंग होगी, तब हम सभी जाकर शिव जी के चरणों पर सिर रखकर आग्रह करेंगे कि प्रभो आप विवाह कर लीजिए। इस प्रकार जबर्दस्ती उन्हें विवाह के लिए राजी करेंगे। इस प्रकार भले ही देवताओं का हित हो अन्यथा तारक असुर को मारने का अन्य कोई उपाय नहीं दिख रहा है। सभी देवताओं ने कहा कि यही उपाय सबसे अच्छा है। देवताओं ने कामदेव की स्तुति की तो वह पांच विषम वाण धारण करने वाला और मछली की आकृति की ध्वजा वाला कामदेव प्रकट हुआ।
सुरन्ह कही निज विपति सब सुनि मन कीन्ह विचार।
संभु विरोध न कुसल मोहि विहसि कहेउ अस मार।
तदपि करब मैं काजु तुम्हारा, श्रुति कह परम धरम उपकारा।
परहित लागि तजइ जो देही, संतत संत प्रसंसहिं तेही।
अस कहि चलेउ सबहि सिरुनाई, सुमन धनुष कर सहित सहाई।
चलत मार अस हृदयँ बिचारा, सिव विरोध ध्रुव मरनु हमारा।
कामदेव जब प्रकट हुए तो देवताओं ने अपनी विपत्ति (मुसीबत) सुनाई और वह उपाय भी बताया जिससे विपत्ति दूर हो सकती है। उपाय सुनकर कामदेव ने मन में विचार किया और हंसकर देवताओं से कहा कि शिव जी के साथ विरोध (उनके मन के विपरीत) करने से मेरी कुशल नहीं है। इसके बाद भी मैं तुम्हारा (देवों का) काम करूंगा क्योंकि वेद दूसरे के साथ भलाई (उपकार) को ही परम धर्म कहते हैं। वेदों मेें कहा गया है कि जो दूसरे के हित में प्राण त्याग देता है, संत सदैव उसकी बड़ाई किया करते हैं। इतना कहकर कामदेव ने सभी देवों को प्रणाम किया और अपना पुष्पों का धनुष लेकर वसंतादि सहायकों के साथ चला। चलते समय कामदेव के हृदय में ऐसा विचार आया कि शिव जी के साथ इस प्रकार का विरोध करने से मेरी मृत्यु निश्चित है।
तब आपन प्रभाउ विस्तारा, निज बस कीन्ह सकल संसारा।
कोपेउ जबहिं बारिचर केतू, छन महुँ मिटे सकल श्रुति सेतू।
ब्रह्मचर्ज ब्रत संजम नाना, धीरज धरम ग्यान विग्याना।
सदाचार जप जोग विरागा, सभय विवेक कटकु सबु भागा।
कामदेव ने यह तो समझ लिया कि उसका मरण निश्चित है फिर भी वह अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से करने लगा। कामदेव ने अपने प्रभाव का जब विस्तार किया तो समस्त संसार विषय-वासना में डूब गया। कामदेव जो वारिचर (मछली) केतु (ध्वजा) अर्थात मछली के निशान की ध्वजा लेकर चलते हैं, ने जब क्रोध किया तो उस समय वेदों की सारी मर्यादा अर्थात समाज के लिए जो संयम और नियम बनाये गये हैं, वे सभी टूट गये। श्रुति सेतु अर्थात वेदों के बंधन टूटते ही ब्रह्मचर्य, व्रत, संयम आदि तथा धैर्य, धर्म, ग्यान और विज्ञान, सदाचार, जप, योग, विराग और ज्ञान की समस्त सेना भाग खड़ी हुई।
भागेउ विबेकु सहाय सहित सो सुभट संजुग महि मुरे।
सदग्रंथ पर्वत कंदरन्हि महंु जाइ तेहि अवसर दुरे।
होनिहार का करतार को रखवार जग खरभरू परा।
दुइ माथ केहि रतिनाथ जेहि कहुं कोपि कर धनु सरू धरा।
जे सजीव जग अचर चर नारि पुरूष असनाम।
ते निज निज मरजाद तजि भए सकल बस काम।
कामदेव को देखकर विवेक (ज्ञान) अपने सहायकों के साथ भाग गया। उसके योद्धा रणभूमि से पीठ दिखा गये। उस समय वे सब सद् ग्रंथ पर्वत की कन्दराओं में जा छिपे। अर्थात ज्ञान, वैराग, संयम नियम, सदाचार आदि ग्रंथों में ही लिखे रह गये, व्यवहार में उनका कोई पालन ही नहीं कर रहा था। सारे जगत में खलबली मच गयी। सभी कहने लगे कि हे विधाता कौन है, जिसके लिए रतिनाथ अर्थात रति के स्वामी कामदेव ने कोप करके हाथ में धनुषबाण उठाया है। उस समय स्थिति यह हो गयी थी कि जगत में स्त्री-पुरुष संज्ञा वाले, जितने भी चर और अचर प्राणी थे, वे सभी अपनी-अपनी मर्यादा को छोड़कर आचरण करने लगे।

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