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हनुमानजी मे शूरता, दक्षता, बल, धैर्य, बुद्धिमत्ता, नीति, पराक्रम और प्रभाव इन सभी सद्गुणों थे

श्रीराम ने हाथ जोड़कर दक्षिण दिशा में निवास करने वाले अगस्त्य मुनि से कहा कि महर्षि! इसमें सन्देह नहीं कि बालि और रावण के बल की तुलना नहीं थी परन्तु मेरा विचार है कि इन दोनों का बल भी हनुमानजी के बल की बराबरी नहीं कर सकता था। शूरता, दक्षता, बल, धैर्य, बुद्धिमत्ता, नीति, पराक्रम और प्रभाव इन सभी सद्गुणों ने हनुमानजी के भीतर घर कर रखा है। ये महाबाहु वीर धैर्य से एक ही छलांग में सौ योजन समुद्र को लाँघ गए। रावण के अन्तरूपुर में गए। अशोक वाटिका में सीताजी से मिले, उनसे वार्तालाप कर धैर्य बँधाया। अशोक वन में इन्होंने अकेले ही रावण के सेनापतियों, मंत्री, कुमारों, किंकरों तथा रावण पुत्र अक्षय को मार गिराया। तदनन्तर ये मेघनाद के नागपाश से बँधे और स्वयं ही मुक्त हो गए। तत्पश्चात् इन्होंने रावण से वार्तालाप किया। लंकापुरी को जलाकर भस्म किया। मुनीश्वर! मैंने तो इन्हीं के बाहु-बल से विभीषण के लिए लंका, शत्रुओं पर विजय, अयोध्या का राज तथा सीता, लक्ष्मण मित्र और बन्धुजनों को प्राप्त किया है।

एतन्मे भगवन् सर्वं हनूमति महामुने।

विस्तरेण यथातत्वं कथयामरपूजिता।

वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड सर्ग ३५-१३

देवबन्धु महामुने! भगवन! आप हनुमानजी के विषय में ये सब बातें यथार्थरूप से विस्तारपूर्वक बताइए।

श्रीरामचन्द्रजी के ये युक्तियुक्त वचन सुनकर अगस्त्यजी हनुमानजी के समक्ष यह बोले- श्रीराम! हनुमानजी के विषय में आप जो कुछ कहते हैं, वह सब सत्य ही है। बल-बुद्धि और गति में इनकी बराबरी करने वाला दूसरा कोई नहीं है। भगवान सूर्य के वरदान से जिनका स्वरूप सुवर्णमय हो गया है, ऐसा एक सुमेरू नाम से प्रसिद्ध पर्वत है, जहाँ हनुमानजी के पिता केसरी राज्य करते हैं। उनकी अंजना नाम से विख्यात पत्नी थीं। उनके गर्भ से वायुदेव ने एक उत्तम पुत्र को जन्म दिया। एक दिन माता अंजना फल लाने के लिए निकली और गहन वन में चली गई। उस समय माता से बिछुड़ जाने और भूख से अत्यन्त व्याकुल होने के कारण बालक (शिशु) हनुमान जोर-जोर से रोने लगे। उन्हें लाल रंगवाले सूर्यदेव उदित होते दिखाई दिए। हनुमानजी ने उन्हें कोई फल समझा और वे उस फल के लोभ से सूर्य की ओर उछल पड़े। उन्हें उड़ता देख देवताओं, दानवों और यक्षों को बड़ा आश्चर्य हुआ।

अपने पुत्र को सूर्यदेव की ओर जाते देखकर दाह के भय से बचाने के लिए उस समय वायुदेव (पवनदेव) भी बर्फ के ढेर की भाँति शीतल होकर उनके पीछे-पीछे चलने लगे। सूर्यदेव ने यह सोचकर कि अभी यह बालक है इसे गुण-दोष का ज्ञान नहीं है और इसके अधीन देवताओं को भी बहुत सा भावी कार्य होना है अतरू उन्हें जलाया नहीं। बालक हनुमान को देखकर इन्द्र को अधिक क्रोध नहीं आया। फिर भी इस प्रकार धावा करते हुए इन्द्र ने बालक हनुमान पर उन्होंने अपने हाथ से छूटे हुए वज्र के द्वारा प्रहार किया। इन्द्र के वज्र की चोट खाकर हनुमान एक पहाड़ पर गिरे वहाँ गिरते समय इनकी बायीं ठुड्डी टूट गई। वज्र के आघात से व्याकुल होकर इनके गिरते ही वायुदेव इन्द्र पर कुपित हो गए। उनका यह क्रोध प्रजाजनों के लिए बहुत हानिकारक हुआ। सामर्थ्यवान मारूत (पवनदेव) ने समस्त प्रजा के साथ रहकर भी वहाँ अपनी गति समेट ली। श्वास आदि के रूप में संचार रोक दिया और अपने शिशु पुत्र हनुमान को लेकर वे पर्वत की एक गुफा में घुस गए।

वायुप्रकोपाद् भूतानि निरुच्छूवासनि सर्वतरू।

संधिभिर्भिद्यमानैश्च काष्ठभूतानि जझिरे।।

वाल्मीकि रामायण उत्तरकाण्ड सर्ग ३५-५१

वायु के प्रकोप से समस्त प्राणियों की साँस बन्द होने लगी। उनके सभी अंगों के जोड़ टूटने लगे और वे सब के सब काठ के समान चेष्टा शून्य हो गए।

तदनन्तर गन्धर्व, देवता, असुर और मनुष्य आदि सभी प्रजा दुरूखी होकर सुख प्राप्त करने की इच्छा से ब्रह्माजी के पास गए। प्रजाजनों की यह बात सुनकर ब्रह्माजी ने कहा- इसमें कुछ कारण है ऐसा कहकर वे प्रजाजनों से फिर बोले- आज देवराज इन्द्र ने राहु की बात सुनकर वायु के पुत्र को मार गिराया, इसीलिए वे क्रोधित हो गए हैं। ब्रह्माजी ने कहा अदिति पुत्रों! अब हमें उस स्थान पर चलना चाहिए, जहाँ हम सबको पीड़ा देने वाले पवनदेव छिपकर बैठे हैं। कहीं ऐसा न हो कि उन्हें प्रसन्न किए बिना हम सबका विनाश हो जाए। तदनन्तर देवता, गन्धर्व, नाग और गुह्यक आदि प्रजाओं को सात ले, ब्रह्माजी उस स्थान पर गए जहाँ वायुदेव इन्द्र द्वारा मारे गए अपने पुत्र को लेकर बैठे हुए थे। पुत्र के मारे जाने से वायुदेवता बहुत दुरूखी थे। ब्रह्माजी को देखकर वे उस शिशु (हनुमानजी) को लिए हुए ही उनके आगे आकर खड़े हो गए।

ब्रह्माजी ने अपने लम्बे फैले हुए और आभरण भूषित हाथ से पवन देवता को उठाकर खड़ा किया और उनके उस शिशु पर हाथ फेरा। जैसे पानी से सींच देने पर सूखती हुई खेती हरी हो जाती है, उसी प्रकार ब्रह्माजी के हाथ का लीलापूर्वक स्पर्श पाते ही शिशु हनुमान् पुनरू जीवित हो गए। हनुमान को जीवित हुआ देख पवनदेव समस्त प्राणियों के भीतर अवरुद्ध हुए प्राण आदि का पूर्ववत् प्रसन्नतापूर्वक संचार करने लगे। तब ब्रह्माजी वायुदेवता का प्रिय करने की इच्छा से देवगणों से बोले- इन्द्र, अग्रि, वरुण, महादेव और कुबेर आदि देवताओं! यद्यपि आप सब जानते हैं तथापि मैं आप लोगों के हित की सारी बातें बताऊँगा, सुनिये-

अनेन शिशुना कार्यं कर्तव्यं वो भविष्यति।

तद् ददध्वं वरान् सर्वे मारुतस्यास्य तुष्टये।।

वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड सर्ग ३६-९

इस बालक के द्वारा भविष्य में आप लोगों के बहुत से कार्य सिद्ध होंगे, अत वायुदेवता की प्रसन्नता के लिए आप सब लोग इसे वर दें।

इन्द्र ने हनुमान के गले में बड़ी प्रसन्नतापूर्वक कमलों की माला पहना दी और कहा- मेरे हाथ से छूटे हुए वज्र के द्वारा इस बालक का हनु (ठुड्डी) टूट गई थी, इसलिए इस कपिश्रेष्ठ का नाम हनुमान होगा। इसके अतिरिक्त मैं इसे दूसरा अद्भुत वर यह देता हूँ कि आज से यह मेरे वज्र के द्वारा भी नहीं मारा जा सकेगा।

तदनन्तर भगवान सूर्यदेव ने कहा- मैं इसे अपने तेज का सौवाँ भाग देता हूँ। इसके साथ ही साथ जब इसमें शास्त्राध्ययन करने की शक्ति आ जाएगी तब मैं ही इसे शास्त्रों का ज्ञान प्रदान करूँगा, जिससे यह अच्छा वक्ता होगा। शास्त्रज्ञान में कोई भी इसकी समानता करने वाला न होगा।

वरुण ने भी वर देते हुए कहा- दस लाख वर्षों की आयु हो जाने पर भी मेरे पाश और जल से इस बालक की मृत्यु नहीं होगी।

फिर यम ने वर दिया- यह मेरे दण्ड से अवध्य और नीरोग होगा।

तदनन्तर पिंगलवर्ण की एक आँख वाले कुबेर ने कहा- मैं सन्तुष्ट होकर यह वर देता हूँ कि युद्ध में कभी इसे विषाद न होगा तथा मेरी यह गदा संग्राम में इसका वध न कर सकेगी।

इसके बाद भगवान शंकरजी ने यह उत्तम वर दिया- यह मेरे और आयुधों द्वारा भी अवध्य होगा।

तदनन्तर विश्वकर्मा ने इन्हें इस प्रकार का वर दिया-

मत्कतानि च शस्त्राणि यानि दिव्यानि तानि च।

तैरवध्यत्वमपन्नश्चिरजीवी भविष्यति।।

वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड सर्ग ३६-२०

मेरे बनाए हुए जितने दिव्य अस्त्र-शस्त्र हैं, उनसे अवध्य होकर यह बालक चिरंजीवी होगा।

अन्त में ब्रह्माजी ने उस बालक को लक्ष्य करके कहा- यह दीर्घायु, महात्मा तथा सब प्रकार के ब्रह्मदण्डों से अवध्य होगा। तदनन्तर ब्रह्माजी ने पवन देव से कहा- मारुत! तुम्हारा यह पुत्र मारुति शत्रुओं के लिए भयंकर और मित्रों के लिए अभयदाता होगा। युद्ध में कोई भी इससे जीत न सकेगा। यह इच्छानुसार रूप धारण कर सकेगा, जहाँ चाहेगा जा सकेगा। इसकी गति इसकी इच्छानुसार तीव्र या मन्द होगी तथा यह कहीं भी रूक नहीं सकेगी। यह कपिश्रेष्ठ बड़ा यशस्वी होगा। इतना ही नहीं यह युद्धस्थल में रावण का संहार और भगवान श्रीरामचन्द्रजी को प्रसन्नता का सम्पादन करने वाला अनेक अद्भुत एवं रोमांचकारी कार्य करेगा।

अन्त में इस प्रकार हनुमानजी को वर देकर वायुदेवता की अनुमति से ब्रह्मा आदि सब देवता जैसे आये थे, उसी तरह अपने-अपने स्थान पर चले गए।


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