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भारत में वर्षा संकट गहराया

नई दिल्ली । प्रशांत महासागर में सक्रिय अल नीनो अब विकराल रूप धारण करता दिख रहा है, जिसका असर वैश्विक मौसम पर स्पष्ट है। इससे प्रशांत क्षेत्र में अब तक कम से कम 17 शक्तिशाली तूफानों को जन्म दिया है, जिन्होंने जान-माल के साथ-साथ समुद्री व्यापार को भी अस्त-व्यस्त किया है। वहीं, भारत में इस मॉनसून सीज़न में कई हिस्सों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है, जिससे कृषि और जल संसाधनों के लिए गंभीर चिंताएँ पैदा हो गई हैं। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, प्रशांत महासागर का बढ़ता तापमान उष्णकटिबंधीय तूफानों के लिए एक आदर्श प्रजनन स्थल बन गया है।

इस साल जून में अपनी दस्तक के बाद से अल नीनो लगातार मजबूत हुआ है, जिससे समुद्र की गर्म सतह तूफानों को अद्वितीय ऊर्जा प्रदान कर रही है और उनकी तीव्रता व संख्या में वृद्धि हुई है। अगस्त माह में सिर्फ प्रशांत महासागर और दक्षिण चीन सागर में कुल 12 चक्रवाती प्रणालियाँ विकसित हुईं। हांगकांग के मौसम विज्ञानियों के मुताबिक, 1961 के बाद किसी एक महीने में इतनी बड़ी संख्या में तूफानों का बनना यह एक नया रिकॉर्ड है। इन तूफानों का कहर अप्रैल से अब तक प्रशांत क्षेत्र में 230 से अधिक लोगों की जान ले चुका है। चीन को जुलाई में लगातार तीन बड़े तूफानों सहित कई प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ा, जिससे भारी तबाही हुई।

अमेरिकी आँकड़ों के अनुसार, सिर्फ जुलाई में चीन में इन आपदाओं से करीब 8.5 अरब डॉलर का सीधा आर्थिक नुकसान हुआ। इसके अलावा, प्रमुख शिपिंग कंपनियों ने एशिया-प्रशांत के कुछ व्यस्ततम बंदरगाहों पर जहाजों के समय पर नहीं पहुँचने और बढ़ती भीड़ की समस्याओं की सूचना दी है, जिससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर भी असर पड़ा है। प्रशांत में जहाँ तूफानों का सिलसिला जारी है, वहीं भारत में मॉनसून की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। 1 जून से 18 सितंबर तक के आँकड़ों के अनुसार, देश के लगभग 43 प्रतिशत क्षेत्र में सामान्य से कम या अत्यधिक कम बारिश दर्ज की गई है। उदाहरण के लिए, बिहार में लगभग 37 प्रतिशत और राजस्थान में करीब 20 प्रतिशत कम वर्षा हुई है। इस कमी का सीधा असर खरीफ फसलों की पैदावार और करोड़ों किसानों की आय पर पड़ना तय है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि आने वाले महीनों में भी प्रशांत क्षेत्र में तूफानी गतिविधियाँ बनी रह सकती हैं। समुद्र का बढ़ता तापमान और बदलते वायुमंडलीय हालात जापान सहित कई एशियाई देशों के लिए तेज हवाओं, भारी बारिश और समुद्री व्यवधान का खतरा बढ़ा सकते हैं। भारत के लिए, अल नीनो का असर मॉनसून की असमानता के रूप में सामने आ रहा है, इसलिए वर्षा के क्षेत्रीय वितरण और कृषि पर इसके दीर्घकालिक प्रभावों पर लगातार नजर बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।

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