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मेरठ के बहुचर्चित नीला ड्रम कांड में सौरभ राजपूत की कातिल उसकी पत्नी मुस्कान रस्तोगी और उसके प्रेमी साहिल शुक्ला को फांसी की सजा सुनाई गई है। पतिहंता महिला को पहली बार देश में फांसी की सजा सुनाई गई है। मुस्कान और साहिल ने सौरभ के पांच टुकड़े करके नीले ड्रम में सीमेंट डाल कर जमा दिए थे। यह समूचे समाज को भीतर तक झकझोरने वाला हत्याकांड रहा, जिसने भारतीय परिवारिक सामाजिक व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए। क्या कोई विवाहित महिला ऐसा भी कर सकती है? जिस दंपति के एक छोटी बच्ची हो, जिसका पति उसको बेपनाह प्यार करता हो, लेकिन विवाहित युवती ने न अपना भविष्य देखा और न बच्ची का... वह वासना भरे कथित प्यार में ऐसी अंधी हुई कि अपने प्रेमी के साथ मिल कर पति के ही पांच टुकड़े कर दिए। बुधवार को जब कोर्ट ने मुस्कान से पूछा कि तुमको क्या सजा दी जाए ? तो उसने सिर्फ इतना कहा, मेरी बच्ची छोटी है। जाहिर है, उसका अपराध दया माफी के काबिल बिल्कुल नहीं था।
यहां अदालत में न्याय के तख्त पर आसीन न्यायाधीश ने महाभारत के जिस श्लोक का अपने निर्णय में उल्लेख किया है वह गौरतलब है - निर्वनो वध्यते व्याघ्रो निर्व्याघ्रं छिद्यते वनम्।तस्माद्व्याघ्रो वनं रक्षेद् वनं व्याघ्रं च पालयेत्घ् इसका अर्थ है कि बिना वन (जंगल) के बाघ मारा जाता है और बिना बाघ के जंगल काट दिया जाता है। इसलिए बाघ को वन की रक्षा करनी चाहिए और वन को बाघ का पालन-पोषण करना चाहिए। इस श्लोक के माध्यम से अदालत ने समाज और कानून या दंड के बीच के परस्पर संबंधों को समझाया। जज ने स्पष्ट किया कि दंड भी धर्म है, यानी समाज की रक्षा के लिए अपराधी को उसके अपराध की गंभीरता के अनुसार दंड देना बेहद जरूरी है, ताकि समाज में संतुलन बना रहे।उन्होंने फैसला पढ़ना शुरू किया इससे पहले उन्होंने अहम टिप्पणी में कहा कि दंड भी धर्म है. उन्होंने महाभारत का जिक्र करते हुए कहा कि दंड को भी धर्म ही बताया गया है, यानी अपराधी को दंड देना धर्म है.
आपको क्रमवार याद दिला दें कि 24 फरवरी 2025 को मर्चेंट नेवी अफसर सौरभ राजपूत लंदन से वापस मेरठ लौटे और इंदिरा नगर स्थित अपने घर पहुंचे.25 फरवरी 2025 को सौरभ के घर में उनकी पत्नी मुस्कान रस्तोगी का जन्मदिन मनाया गया.28 फरवरी 2025 को उनकी बेटी पीहू का जन्मदिन मनाया गया.3 मार्च 2025रू अभियोजन पक्ष के अनुसार, साजिश के तहत सौरभ को नींद की दवा दी गई और उसके बाद उसके प्रेमी साहिल शुक्ला को घर बुलाया गया, जहां सौरभ की बेरहमी से हत्या कर दी गई. इसके बाद शव के टुकड़े कर उसे सीमेंट भरकर एक नीले ड्रम में सील कर दिया गया.4 मार्च 2025रू इस दिन मुस्कान अपनी बेटी को मायके छोड़कर साहिल के साथ शिमला घूमने निकल गई और सौरभ के फोन से मैसेज भेजकर परिवार को धोखे में रखा.17 मार्च 2025रू शिमला से लौटने के बाद जब मामले का खुलासा हुआ और पुलिस ने जांच शुरू की, तो घर के अंदर रखे नीले ड्रम से सौरभ राजपूत के शव के टुकड़े बरामद किए गए. पुलिस ने आरोपी मुस्कान और साहिल को गिरफ्तार किया.
आपको बता दें कि 14 अक्टूबर को मुस्कान और साहिल को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कोर्ट में पेश किया गया था. इससे पहले अदालत ने 30 सितंबर को मुस्कान और साहिल को सौरभ राजपूत की हत्या करने और उनके शव को छिपाने की कोशिश के मामले में दोषी करार दिया था. करीब 13 महीने तक चले मुकदमे में कुल 126 सुनवाई हुईं, जिसके बाद अदालत ने दोनों को सजा सुनाई.
आपको बता दें कि सौरभ हत्या कांड के बाद कुछ और केस सामने आए। इन पर भी अदालतें देर सबेर फैसला सुनाएंगी। इसी माह की 16 तारीख को मेरठ के ही एक और केस का फैसला आना है, जिसमें रविता कश्यप और उसके प्रेमी अमरदीप ने अमित कश्यप की हत्या कर उसे सांप के काटने से हुई मौत दिखाने की कोशिश की। पति के बिस्तर पर सांप छोड़ दिया। सोनम रघुवंशी केस की भी आपको याद होगा। इस केस में सोनम पर अपने पति राजा रघुवंशी की हनीमून के दौरान हत्या करने का आरोप है। महाराष्ट्र के एक-दो नहीं, पांच से ज्यादा केस हैं। इसी तरह पुणे के केतन हत्याकांड ने भी विवाह जैसी संस्था की धज्जियाँ उड़ाई थीं। जिस रिश्ते से जीवन संवरने की उम्मीद होती है, वही बनने से पहले ही अगर मौत की वजह बन जाए तो भरोसा आखिर किस पर किया जाए? रिश्ते अब अपनी शतों पर चलाने की जिद में उलझते नजर आते हैं। आए दिन इस प्रकार की घटनाएं सामने आ रही हैं। सवाल हत्याओं से ज्यादा विवाह परंपरा, उसकी मर्यादा और रिश्तों के खून पर उठ रहे हैं। पति-पत्नी का रिश्ता विश्वास, प्रेम और साथ निभाने की प्रतिज्ञा पर टिका होता है। लेकिन जब इसी रिश्ते में विश्वास की जगह छल, संवाद की जगह हिंसा और मतभेद की जगह हत्या ले लेती है, तो सवाल केवल अपराध का नहीं, बल्कि पूरे समाज की सोच का यन जाता है। नीला ड्रम कांड और मुस्कान साहिल से जुड़े मामले ने समाज को झकझोरने के साथ यह सोचने पर भी विवश किया है कि आखिर वैवाहिक रिश्ते इस हद तक कैसे पहुंच रहे हैं कि जीवनसाथी ही जीवन का दुश्मन बन जाता है। पति की हत्या, शव को छिपाने और अपराध के साक्ष्य मिटाने जैसे आरोप किसी भी सभ्य समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं। ऐसे मामलों में जनभावना स्वाभाविक रूप से कठोरतम दंड की मांग करती है। और अदालत ने फांसी की सजा सुनाकर संदेश भी दिया कि जयन्यतम मामलों में कोई राहत नहीं दी जा सकती। भारतीय कानून में हत्या एक गंभीर दंडनीय अपराध है। एक जुलाई 2024 से लागू भारतीय न्याय संहित में हत्या के लिए मृत्युदंड या आजीवन कारावास तथा जुमनि का प्रावधान है। इससे पहले के अपराधों पर लागू कानून का निर्धारण घटना की तारीख और संक्रमण संबंधी कानूनी प्रावधानों के अनुसार होता है। नीला ड्रम कांड केवल एक अपराध की घटना नहीं है। इस घटना के बाद समाज की सोच भी बदली। विवाह योग्य लड़के खौफ में आ गए। वह विवाह से कतराने लगे। इस कांड ने विवाह परंपरा को ही सवालों के घेरे में ला दिया। सोशल मीडिया पर नीला ड्रम ऐसे छा गया, मानो उसका ही कसूर था। हालात-ए-कत्ल का मंजर देखकर पुलिस टीम के भी रोंगटे खड़े हो गए, जब नीले ड्रम में सौरभ राजपूत टुकड़े-टुकड़े होकर जमा पड़ा था। अपराध छिपाने के लिए शव के टुकड़े करना, उन्हें ठिकाने लगाना या साक्ष्य नष्ट करना जांच में महत्वपूर्ण परिस्थितियां रहीं। न्याय का उद्देश्य केवल अपराधी को दंडित करना नहीं, बल्कि कानून के प्रति समाज का विश्वास बनाए रखना भी है। नीला ड्रम कांड के बाद पति की हत्या से जुड़े दूसरे चर्चित मामलों की चर्चा ने एक गंभीर सवाल खड़ा किया है। क्या वैवाहिक रिश्तों में हिंसा और प्रतिशोध की प्रवृत्ति बढ़ रही है? इसका उत्तर केवल सुर्खियों और वायरल खबरों से नहीं दिया जा सकता। ये घटनाएं सामाजिक विकृतियों पर आत्ममंथन की मांग करती हैं। आर्थिक अपेक्षाएं, विवाहेतर संबंधों को लेकर विवाद, संदेह, अहंकार, संपत्ति के झगड़े और पारिवारिक हस्तक्षेप आदि इसके कई कारक हैं। ऐसे जघन्य अपराधों में फांसी की सजा केवल एक नजीर है। जिस पवित्र रिश्ते का खून हुआ, उसकी कहां सुनवाई होगी ? नीला ड्रम कांड में सुनाई गई सजा एक चेतावनी भर है। अपराध की भयावहता केवल शव छिपाने के तरीके में नहीं, उस मानसिकता में भी है जो किसी इंसान की जान लेने को समस्या का समाधान समझती है। इस मानसिकता को बदलने के लिए कानून, परिवार, शिक्षा और समाज-सभी को अपनी भूमिका निभानी होगी।
सोशल मीडिया के इस दौर में तमाम तरह का अनैतिक असामाजिक और रिश्तों की पवित्रता को नष्ट करने वाली रील और सामग्री को वायरल कर परिवार व समाज को दूषित किया जा रहा है और नयी पीढ़ी में वैचारिक प्रदूषण का बीजारोपण कर भारतीय संस्कृति समाज और परिवार को तोडने का अधम काम किया जा रहा है। सबसे अहम सवाल है कि विवाह परंपरा को कैसे पुनर्जीवित और मजबूत बनाया जाए। सवाल यही है कि सात फेरों में साथ जीने-मरने का वादा करने वाले रिश्ते में आखिर जिंदगी इतनी सस्ती कैसे हो गई?इस गंदगी और अपराध की सोच को अंकुरित होने से पहले ही खत्म करना होगा तभी परिवार नाम की संस्था को बचाया जा सकता है।
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