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पाकिस्तान ने अमेरिकी हमले के डर से ईरानी विमानों को दी पनाह?

इस्लामाबाद। अमेरिका और ईरान के बीच गहराते सैन्य तनाव के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या पाकिस्तान 53 साल पुराने एक एहसान का कर्ज चुका रहा है। हालिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि ईरान ने अमेरिकी हमलों के डर से अपने सैन्य विमानों को पाकिस्तान के नूर खान एयरबेस पर छिपाया है। हालांकि, पाकिस्तानी अधिकारियों ने इन दावों को सिरे से खारिज करते हुए इन्हें अविश्वसनीय बताया है। उनका तर्क है कि यह बेस शहर के बीचों-बीच स्थित है, जहाँ विमानों के बेड़े को छिपाना नामुमकिन है। यह पूरी स्थिति 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की याद दिलाती है। उस समय ईरान में शाह मोहम्मद रजा पहलवी का शासन था और ईरान पाकिस्तान का सबसे करीबी सहयोगी था। जब भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तानी हवाई क्षेत्रों पर अपना दबदबा कायम कर लिया और भीषण बमबारी शुरू की, तब पाकिस्तान को अपने लड़ाकू और नागरिक विमानों के नष्ट होने का डर सताने लगा। उस संकट काल में ईरान ने अपने एयरबेस पाकिस्तान के लिए खोल दिए थे और कई पाकिस्तानी विमानों ने वहां शरण ली थी। इसके अलावा, ईरान ने पाकिस्तान को सैन्य हेलीकॉप्टर, गोला-बारूद और ईंधन की भी गुप्त आपूर्ति की थी।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान के विमानों को पनाह देने की खबरें सच साबित होती हैं, तो यह वैश्विक कूटनीति में बड़े बदलाव का संकेत होगा। वर्तमान में ईरान अमेरिका का कट्टर दुश्मन है, जबकि पाकिस्तान अपनी सुरक्षा के लिए चीन पर अत्यधिक निर्भर है। रिपब्लिकन पार्टी के सांसद लिंडसे ग्राहम ने चेतावनी दी है कि यदि पाकिस्तान ने ईरानी विमानों को छिपाया है, तो अमेरिका को मध्यस्थ के रूप में पाकिस्तान की भूमिका पर फिर से विचार करना होगा। आधी सदी बाद कूटनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं। पाकिस्तान इस समय एक नाजुक संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा हैकृएक तरफ वह चीन का सबसे करीबी साझेदार है, तो दूसरी तरफ वह अमेरिका के साथ अपने बिगड़े हुए सैन्य संबंधों को सुधारने की कवायद में जुटा है। हालांकि, ओसामा बिन लादेन और चरमपंथी समूहों के इतिहास के कारण अमेरिकी सुरक्षा प्रतिष्ठान में पाकिस्तान की विश्वसनीयता को लेकर आज भी गहरा संदेह बना हुआ है। फिलहाल, इन दावों ने दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है।

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