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अमेरिका-ईरान जंग के बीच कौन जीता और कौन हरा

वाशिंगटन । करीब सवा महीने तक चले संघर्ष के बाद अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने और शांति स्थापित होने की उम्मीद बनी है। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा केंद्र होर्मुज जलडमरूमध्य रहा, जो वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। हाल के घटनाक्रमों में ईरान ने अपने संवर्धित यूरेनियम को “पवित्र” बताते हुए उसे किसी भी देश, खासकर अमेरिका को सौंपने से इनकार कर दिया और डोनाल्ड ट्रंप के दावों को खारिज कर दिया। ईरान की सैन्य इकाई इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने होर्मुज से गुजरने वाले नागरिक जहाजों के लिए सख्त नियम लागू किए हैं। अब सभी जहाजों को तय रूट का पालन करना होगा और आईआरजीसी नेवी से अनुमति लेनी होगी, जबकि सैन्य जहाजों के प्रवेश पर रोक लगा दी गई है। ईरान ने साफ किया कि जलडमरूमध्य तभी खुला रहेगा जब युद्धविराम कायम रहेगा।

दुनिया के लिए यह राहत की खबर है क्योंकि होर्मुज से लगभग 20 प्रतिशत वैश्विक तेल व्यापार होता है। संघर्ष के दौरान सप्लाई बाधित होने से भारत सहित कई देशों में ऊर्जा संकट गहराने लगा था। अब मार्ग खुलने से तेल-गैस की आपूर्ति सामान्य होने की उम्मीद है। अमेरिका ने सैन्य दबाव और नौसैनिक नाकाबंदी के जरिए ईरान को झुकाने में सफलता पाई। ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाने और प्रॉक्सी संगठनों से दूरी बनाने के संकेत देने पड़े। इस लिहाज से यह अमेरिका की रणनीतिक जीत मानी जा सकती है। हालांकि, ईरान ने भी जवाबी हमलों में अमेरिकी ठिकानों और उसके सहयोगी खाड़ी देशों को नुकसान पहुंचाया, जिससे अमेरिका को भी अपेक्षा से ज्यादा क्षति उठानी पड़ी। ईरान इस युद्ध में सबसे ज्यादा नुकसान उठाने वाला देश माना जा रहा है। परमाणु महत्वाकांक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने की नीति ने उसे भारी कीमत चुकाने पर मजबूर किया। अयातुल्ला अली खामेनेई सहित कई शीर्ष नेताओं की मौत, बुनियादी ढांचे का विनाश और आर्थिक क्षति ने देश को कमजोर कर दिया। हालांकि, अंत में कूटनीतिक लचीलापन दिखाकर उसने पूरी तरह हार से खुद को बचा लिया। खाड़ी देश जैसे सऊदी अरब, यूएई, कुवैत और कतर इस संघर्ष में बीच में फंस गए।

तेल निर्यात रुकने और हमलों में बुनियादी ढांचे को नुकसान होने से उनकी अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ा। अब जलडमरूमध्य खुलने से उन्हें राहत मिलेगी, लेकिन अगर ईरान को सुरक्षा गारंटी मिलती है, तो क्षेत्र में उसका प्रभाव बढ़ने का खतरा बना रहेगा। वहीं इजरायल के लिए यह युद्ध अस्तित्व का प्रश्न था। उसने ईरान के परमाणु खतरे को रोकने के लिए अमेरिका के साथ मिलकर कार्रवाई की। हालांकि उसे भी नुकसान झेलना पड़ा, लेकिन प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का कहना है कि देश की सुरक्षा सर्वोपरि है और ईरान के खतरे को खत्म करने के प्रयास जारी रहेगा। 

कुल मिलाकर, यह संघर्ष किसी एक पक्ष की पूर्ण जीत नहीं बल्कि जटिल संतुलन का परिणाम है। अमेरिका ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया, ईरान ने आंशिक रूप से झुककर खुद को बचाया, जबकि खाड़ी देश और इजरायल अपने-अपने हितों और सुरक्षा चिंताओं के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि यह युद्धविराम कितनी स्थायी शांति में बदल पाता है।

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