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नई दिल्ली। श्रीलंका के दक्षिणी समुद्री तट के पास हिंद महासागर में अमेरिका ने ईरानी युद्धपोत आईआरआईएस डेना को परमाणु पनडुब्बी से टॉरपीडो हमला करके डुबोया है, उसके बाद भारत और अमेरिका के बीच हुई एक दशक पुरानी संधि लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट की अहमियत बढ़ गई है। दरअसल, बिना संधि का जिक्र किए अमेरिकी सेना के एक पूर्व अधिकारी ने इसकी ओर इशारा करते हुए एक झूठा दावा किया है, जिसके बाद इसे समझना जरूरी हो गया है। भारत सरकार ने पहले ही साफ कर दिया है कि यह संधि किसी भी संघर्ष में शामिल होने के लिए हमें मजबूर नहीं कर सकती।
भारत और अमेरिका ने 29 अगस्त, 2016 को लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए थे। यह एक तरह से बुनियादी सैन्य समझौता है, जिसके तहत एक-दूसरे को ईंधन भरने, सप्लाई और मरम्मत के लिए मिलिट्री सुविधाओं के आपसी इस्तेमाल की सुविधा मिलती है। अमेरिका की कई देशों के साथ ऐसी संधि है। यह संबंधित देशों और अमेरिका के बीच आपसी सैन्य सहयोग के लिए की गई है। यह संधि मूल रूप से दोनों देशों को सैन्य गतिविधियों के लिए ईंधन और मरम्मत जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराती है। भारत-अमेरिका लंबे समय से साझा युद्धाभ्यास करते हैं, जिसमें इस तरह की प्रैक्टिस हमेशा से रही है। इस संधि के जरिए सिर्फ इस प्रक्रिया को स्ट्रीमलाइन किया गया है और दोनों ओर से भुगतान और अन्य लॉजिस्टिक सुविधाओं के उपयोग के लिए नोडल प्वाइंट तय किए गए हैं।
आपस में लॉजिस्टिक सुविधाएं उपलब्ध करवाने के अलावा यह संधि मुख्य तौर पर चार क्षेत्रों को कवर करती है। इसमें पोर्ट कॉल, संयुक्त युद्धाभ्यास, साझा मिलिट्री ट्रेनिंग और मानवीय सहायता के साथ-साथ आपात स्थिति में मदद करना शामिल है। हालांकि, किसी भी स्थिति में इस संधि पर अमल दोनों तरफ से आपसी सहमति से ही हो सकता है, जो मामले पर निर्भर करता है। इस समझौते में ऐसी कोई भी व्यवस्था नहीं है। भारत की धरती पर अमेरिकी सैनिक या संपत्ति का कोई अड्डा नहीं हो सकता है। यह पूरी तरह से एक लॉजिस्टिक समझौता है। भारत जरूरत पड़ने पर अमेरिकी सैन्य सुविधाओं का जरुरत के मुताबिक लॉजिस्टिक इस्तेमाल कर सकता है और यही अमेरिका भी भारत में कर सकता है।
यह समझौता भारत को किसी भी संघर्ष में शामिल होने का दबाव नहीं डाल सकता और न ही इसकी वजह से भारत स्वतः किसी अंतरराष्ट्रीय संघर्ष में शामिल होने को मजबूर है। दरअसल, अमेरिकी सेना के एक रिटायर्ड अधिकारी ने एक अमेरिकी मीडिया चैनल पर झूठा दावा किया कि अमेरिका ईरान पर हमले के लिए भारतीय नौ सैनिक अड्डे का इस्तेमाल कर रहा है। अमेरिकी पनडुब्बी ने टॉरपीडो हमले में ईरानी युद्धपोत आईआरआईएस डेना को भारत के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन के बाहर हिंद महासागर में डुबोया है।
भारत का एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन भारतीय समुद्र तट से करीब 370 किलोमीटर या 200 नॉटिकल मील तक फैला है। मतलब, श्रीलंका के दक्षिणी तट से दूर जिस जगह पर अमेरिकी हमला हुआ, वह भारतीय समुद्री सीमा से बहुत दूर है। आईआरआईएस डेना में 130 ईरानी नाविक सवार थे, जिनमें अमेरिकी हमले में 87 लोगों की मौत हो गई और 32 को श्रीलंकाई नेवी ने रेस्क्यू किया। आईआरआईएस डेना से आपात संदेश मिलने के बाद भारतीय नौ सेना भी सर्च ऑर रेस्क्यू ऑपरेशन में शामिल हुई थी।
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