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अमेरिकी के सबसे करीबी ब्रिटेन इस बार पकड़ी अलग राह

वाशिंगटन । ईरान को लेकर जारी वैश्विक तनाव के बीच अब नई भू-राजनीतिक खींचतान सामने दिख रही है। यह टकराव किसी युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि कूटनीति और रणनीति के स्तर पर नजर आ रहा है। एक ओर अमेरिका है, और दूसरी ओर उसके पारंपरिक सहयोगी यूरोपीय देश है। दशकों पुराना नाटो अब आंतरिक मतभेदों के कारण दबाव में दिख रहा है।

पूरे घटनाक्रम के केंद्र में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हैं, जिनके बयान और नीतियां टकराव को और तीखा बना रही हैं। ट्रंप ने यूरोप पर आरोप लगाया है कि ईरान के मुद्दे पर अमेरिका का साथ नहीं दिया। उनके अनुसार, जहां अमेरिका सख्ती के पक्ष में है, वहीं यूरोपीय देश बातचीत और कूटनीति पर जोर दे रहे हैं। यह मतभेद केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि आपसी भरोसे में आई दरार को दिखाता है। यूरोप के प्रमुख देश जर्मनी और फ्रांस शुरू से ही ईरान के साथ संवाद के पक्षधर रहे हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और जर्मनी के चांसलर ओलाफ शोल्ज ने स्पष्ट किया है कि युद्ध से हालात और बिगड़ सकते हैं, खासतौर पर तेल बाजार, शरणार्थी संकट और मध्य-पूर्व की स्थिरता पर इसका असर पड़ेगा।

वहीं, ब्रिटेन की स्थिति भी इस बार अलग दिखी। पारंपरिक रूप से अमेरिका का करीबी सहयोगी रहा ब्रिटेन इस मुद्दे पर पूरी तरह अलग खड़ा दिख रहा है। प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने स्पष्ट कहा कि ईरान का युद्ध ब्रिटेन का युद्ध नहीं है और वह अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार निर्णय लेगा। यह रुख ‘स्पेशल रिलेशनशिप’ के रूप में पहचाने जाने वाले अमेरिका-ब्रिटेन संबंधों में भी बदलाव का संकेत देता है। ट्रंप का यूरोप के साथ टकराव नया नहीं है। पहले भी उन्होंने व्यापारिक टैरिफ, रक्षा खर्च और यहां तक कि ग्रीनलैंड को लेकर विवाद खड़ा किया था। यूरोपीय देशों पर उनकी तीखी टिप्पणियां कई बार कूटनीतिक असहजता पैदा कर चुकी हैं।

विश्लेषकों के अनुसार, यह ‘कोल्ड वॉर’ पारंपरिक युद्ध की तरह नहीं होगा, बल्कि आर्थिक, सैन्य और कूटनीतिक दबाव के रूप में सामने आएगा। अमेरिका यूरोप पर टैरिफ बढ़ा सकता है और नॉटो में अपनी भूमिका सीमित करने की धमकी भी दे चुका है। इससे यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित हो सकती है, जो लंबे समय से अमेरिकी समर्थन पर निर्भर रही है। दूसरी ओर, यूरोप भी अब आत्मनिर्भर सुरक्षा नीति की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। ‘स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी’ की अवधारणा पर जोर देकर कहा कि वह रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। यदि यह खाई और गहरी होती है, तब इसका असर वैश्विक शक्ति संतुलन पर पड़ना तय है। रुस और चीन जैसे देश इस स्थिति का लाभ उठा सकते हैं। इसके बाद सवाल उठा रहा हैं कि क्या पश्चिमी एकता बनी रहेगी या दुनिया एक नए ध्रुवीकरण की ओर बढ़ेगी।

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