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भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों को लेकर रफ्तार काफी धीमी

नई दिल्ली । भारत सरकार ने 2030 तक हर 10 में से 3 वाहन इलेक्ट्रिक होने का लक्ष्य रखा था, लेकिन मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि यह सपना अभी दूर नजर आ रहा है। भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों को लेकर चर्चाएं भले तेज हों, लेकिन जमीन पर उनकी रफ्तार अब भी काफी धीमी है।

एक्सपर्ट्स का मानना है कि जिस गति से देश आगे बढ़ रहा है, उसमें अगले पाँच वर्षों में 10 से 12 प्रतिशत की हिस्सेदारी हासिल करना भी बड़ी चुनौती साबित होगी। ऐसे में प्रदूषण घटाने और विदेशी तेल पर निर्भरता कम करने की योजनाएं प्रभावित होती दिख रही हैं। बिक्री के आंकड़े बताते हैं कि 2020 तक देश में कुल वाहन बिक्री में इलेक्ट्रिक की हिस्सेदारी 1 प्रतिशत से भी कम थी, जो 2025 तक बढ़कर लगभग 8 प्रतिशत हो गई है। यह बढ़ोतरी अच्छी जरूर लगती है, लेकिन महत्वाकांक्षी लक्ष्यों के मुकाबले यह बेहद कम है। दिलचस्प रूप से इलेक्ट्रिक वाहन बाजार में सबसे बड़ी हिस्सेदारी थ्री-व्हीलर्स की है। आज देश में बिकने वाले कुल थ्री-व्हीलर्स में से करीब 61 प्रतिशत इलेक्ट्रिक हैं। 

कमर्शियल इस्तेमाल में इनकी बचत अधिक होती है, इसलिए इनकी मांग तेजी से बढ़ी है। इसके उलट निजी कारों की बात करें तो इनकी स्थिति कमजोर है। आज भी कुल कार बिक्री में इलेक्ट्रिक कारों की हिस्सेदारी करीब 3 प्रतिशत के आसपास ही है, जिससे यह साफ है कि आम लोग ईवी अपनाने में हिचकिचा रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ईवी खरीदने में सबसे बड़ी बाधा बैटरी खत्म होने का डर है। शहरों में कुछ चार्जिंग प्वाइंट जरूर उपलब्ध हैं, लेकिन हाईवे और छोटे शहरों में चार्जिंग स्टेशनों की भारी कमी है। ऐसे में लंबी दूरी की यात्रा करने वाले लोग इलेक्ट्रिक कार को लेकर असमंजस में रहते हैं। 

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