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बुडापेस्ट। दुनिया के राजनीतिक मानचित्र पर एक तरफ युद्ध की लपटें तेज हो रही हैं, तो दूसरी तरफ यूरोपीय अर्थव्यवस्था की धड़कनें ठंडी पड़ती दिखाई दे रही हैं। इस बीच हंगरी के विदेश मंत्री पीटर सिज्जार्टो के एक हालिया बयान ने पूरे यूरोप की बेचैनी को सतह पर ला दिया है। अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए भारत ने साबित किया कि उसका मध्य मार्ग सबसे सटीक था।
हालांकि, यदि समुद्री बीमा और माल ढुलाई की लागत बढ़ती है, तो भारत के लिए भी चुनौतियां बढ़ेंगी। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि ऊर्जा सुरक्षा के बिना कोई भी राष्ट्र केवल अपनी राजनीतिक विचारधारा के दम पर आगे नहीं बढ़ सकता। अंतरराष्ट्रीय कानून के संदर्भ में देखें तो रूस पर लगे प्रतिबंध पश्चिमी देशों के अपने निजी फैसले हैं, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र का वैश्विक समर्थन प्राप्त नहीं है। यही कारण है कि भारत और चीन जैसे देश अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप व्यापार करने के लिए स्वतंत्र हैं। अब सवाल यह है कि क्या यूरोप अपनी ईगो को किनारे रखकर ऊर्जा वास्तविकता को स्वीकार करेगा?
पिछले दो वर्षों से यूरोपीय देश जिस रूसी तेल का उपयोग भारत की रिफाइनरियों के रास्ते कर रहे थे, अब उस पर संकट के गहरे बादल मंडरा रहे हैं। मध्य पूर्व में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते बारूदी संघर्ष ने ब्रुसेल्स के रणनीतिकारों को हिलाकर रख दिया है। डर इस बात का है कि यदि भारत से होने वाली तेल की आपूर्ति बाधित हुई, तो यूरोप का ऊर्जा सूरज हमेशा के लिए अस्त हो सकता है। यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप ने नैतिकता का हवाला देकर रूसी कच्चे तेल पर कड़े प्रतिबंध लगाए थे, लेकिन अपनी अर्थव्यवस्था को चालू रखने के लिए उसने एक पिछले दरवाजे का सहारा लिया। भारत ने रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदा, उसे अपनी उन्नत रिफाइनरियों में संसाधित किया और फिर डीजल व जेट फ्यूल के रूप में यूरोप को निर्यात किया। तकनीकी रूप से यूरोप जिन विमानों और गाड़ियों को दौड़ा रहा था, उनका मूल स्रोत रूस ही था।
भारत इस पूरे खेल में एक ग्लोबल रिफाइनरी बनकर उभरा, जिसने वैश्विक ऊर्जा संतुलन को बनाए रखा। अब मध्य पूर्व के समीकरणों ने इस पूरी व्यवस्था को खतरे में डाल दिया है। यदि ईरान-इजरायल युद्ध के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य जैसा महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग बंद होता है, तो भारत से होने वाली रिफाइंड तेल की सप्लाई लाइन कट जाएगी। इससे न केवल वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें आसमान छुएंगी, बल्कि यूरोप के पास ऊर्जा का कोई व्यवहार्य विकल्प नहीं बचेगा। हंगरी के विदेश मंत्री ने स्पष्ट रूप से कहा है कि यूरोपीय संघ को अब विचारधारा छोड़कर अपने हितों पर ध्यान देना चाहिए। उनका तर्क है कि मौजूदा संकट में रूस से ऊर्जा आपूर्ति पर लगी पाबंदियां हटाना ही यूरोप के अस्तित्व को बचा सकता है।
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