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छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों पर फोकस कर रहे हैं कई देश

वॉशिंगटन। दुनियाभर में सामरिक हालात हर दिन बदल रहे हैं और इसके साथ ही युद्ध के मोर्चे पर खतरे भी बढ़ते जा रहे हैं। लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों और मानवरहित ड्रोन्स ने रक्षा विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। एरियल थ्रेट को रोकने के लिए रडार और एयर डिफेंस सिस्टम विकसित किए जा रहे हैं, लेकिन हालिया युद्धों में देखा गया है कि कभी-कभी आयरन डोम और थाड जैसे आधुनिक डिफेंस सिस्टम भी पूरी तरह कारगर साबित नहीं होते। ऐसे में दुनिया के तमाम शक्तिशाली देश अब डिफेंस के साथ-साथ अटैक के उन साधनों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं जो दुश्मन के मजबूत एयर डिफेंस को भेद सकें। इसी कड़ी में छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों का विकास अब वैश्विक फोकस में आ गया है।

यूरोप जहां नेक्स्ट जनरेशन कॉम्बैट एयरक्राफ्ट की योजना बना रहा है और भारत अपने एमसीए प्रोजेक्ट पर तेजी से काम कर रहा है, वहीं अमेरिका ने इस दिशा में एक बहुत बड़ा कदम उठाया है। अमेरिका ने छठी पीढ़ी के फाइटर जेट विकसित करने का अरबों डॉलर का ठेका बोइंग को दिया है, जिसे एफ-47 नाम दिया गया है। इसे भविष्य के स्वॉर्म लीडर के रूप में देखा जा रहा है, जो हवाई युद्ध की पूरी रणनीति को बदलने की क्षमता रखता है। एफ-22 रैप्टर के अगले चरण के रूप में विकसित किए जा रहे इस विमान में ऑल-एंगल स्टील्थ, एडैप्टिव इंजन तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित मिशन सिस्टम जैसी उन्नत क्षमताएं शामिल होंगी।

हालांकि, इस अत्याधुनिक तकनीक की कीमत भी बेहद चौंकाने वाली है। एफ-47 की प्रति यूनिट लागत लगभग 300 मिलियन डॉलर (करीब 2500-3000 करोड़ रुपये) आंकी गई है, जो इसे दुनिया का सबसे महंगा फाइटर जेट बनाती है। यह कीमत वर्तमान के आधुनिक एफ-35 जेट से तीन गुना ज्यादा है। तुलनात्मक रूप से देखें तो एक एफ-47 की कीमत में भारत के 4 से 5 तेजस विमान खरीदे जा सकते हैं। पेंटागन के इस महत्वाकांक्षी प्रोग्राम पर अब तक अरबों डॉलर खर्च किए जा चुके हैं और आगामी बजट में इसके लिए अतिरिक्त फंड की मांग की गई है। यह निवेश स्पष्ट संकेत देता है कि भविष्य के युद्धों में श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए महाशक्तियां अब तकनीक और स्टील्थ क्षमताओं पर किसी भी हद तक दांव लगाने को तैयार हैं।


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