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ईरान की सैकड़ों मां ने खो दिए अपने लाल

वाशिंगटन। सोशल मीडिया पर बीते दिनों एक मां का संदेश आया। वह अपने फाइटर पायलट बेटे के लिए परेशान थीं। उन्होंने एक्स पर लिखा- आज की रात प्रार्थनाओं में उन दो एफ-15 पायलटों को याद रखें, जिनके विमान ईरान ने गिरा दिए हैं। अमेरिका ने तलाशी अभियान चलाकर अपने पायलट बचा लिया। उस मां के बेटे को भी, लेकिन यह सिर्फ एक पहलू है, दूसरी तरफ ईरान की सैकड़ों मां आंसुओं में डूबी हैं। इस युद्ध में अब तक साढ़े तीन हजार से ज्यादा ईरानी लोगों की मौत हो चुकी है। 1600 से ज्यादा आम नागरिक मारे गए हैं और इनमें करीब 250 बच्चे शामिल हैं। संघर्ष के पहले ही दिन तेहरान के पास मिनाब में एक स्कूल पर इजराइल-अमेरिकी ने हमला किया, जिसमें सौ से ज्यादा स्कूली बच्चियों की जान चली गई। ईरान की जिन मां ने अपने बच्चों को खोया है, क्या उनके दुख की कल्पना भी की जा सकती है। फिर पश्चिम एशिया के उन लोगों की भी सोचिए, जो बमों-मिसाइलों के धमाकों की दहशत में दिन-रात गुजार रहे हैं। कहीं यह युद्ध उन्हें हमेशा के लिए बदल न दे।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका और इस्राइल इस युद्ध को जरूरी बता रहे हैं। युद्ध से कोई समाधान नहीं निकलता। हिंसा हमेशा प्रतिहिंसा को जन्म देती है, जिसमें मानवता की आहूति दी जाती है। युद्ध से फायदा होता है तो सिर्फ हथियार बेचने वाली कंपनियों को और उन सत्ताधीशों को, जो इसकी आड़ में राष्ट्रवाद का ज्वार बढ़ाकर अपनी सत्ता बचाने की कोशिश करते हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी हिंसा का हमेशा विरोध करते थे, क्योंकि उनके मुताबिक अगर इससे कुछ अच्छा दिखता भी है, तो वह अस्थायी होता है, लेकिन उसका असर बुरा होता है।

युद्ध इसलिए कभी जरूरी नहीं हो सकता, क्योंकि उसके पीछे छूट जाते हैं दुख, प्रतिशोध, अशांति और तबाही। इनसे उबरने में बरसों लग जाते हैं। अगर रूस-यूक्रेन युद्ध में जितना नुकसान यूक्रेन के इन्फ्रास्ट्रक्चर को हुआ है, उसे दोबारा खड़ा करने में करीब 600 अरब डॉलर लगेंगे। एक करोड़ यूक्रेन वासियों को अपना घर छोड़ना पड़ा है, 60 लाख तो देश ही छोड़कर चले गए। इस युद्ध ने भी कई माताओं की गोद सूनी कर दी। पश्चिम एशिया और यूक्रेन युद्ध को लेकर भारत ने हमेशा शांति की वकालत की है। शांति से समृद्धि का द्वार खुलता है और युद्ध से विनाश का।

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