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ईरानी मिसाइलें लगा रहीं सटीक निशानें

तेहरान। ईरान ने शुक्रवार को दुनिया को एक नई तरह की जंग की झलक दिखाई। ऐसी जंग जिसमें सिर्फ मिसाइलें ही नहीं, बल्कि सैटलाइट और एआई भी बराबरी से शामिल रहा। ईरान ने करीब 3800 किमी दूर हिंद महासागर में स्थित अमेरिका-ब्रिटेन के संयुक्त सैन्य अड्डे डिएगो गार्सिया पर लंबी दूरी की बलिस्टिक मिसाइलें दागीं। हालांकि ये मिसाइलें अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकी, लेकिन इस घटना ने डिफेंस सेक्टर में हलचल मचा दी है। रूस के मिसाइल लॉन्च सिस्टम, चीन के सैटलाइट, एआई सर्विलांस और ईरान के मिसाइल सिस्टम का ऐसा गठजोड़ दिखा कि पश्चिमी देश टेंशन में आ गए।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक जैसे फोन में गूगल मैप्स काम करता है और हमें रास्ता दिखाता है, उसी तरह दुनिया भर के देशों के पास अपने सैटलाइट नेविगेशन सिस्टम हैं। अमेरिका के पास जीपीएस है, रूस के पास ग्लोनास और यूरोप के पास गेल्लियो है। इसी तरह चीन का अपना सिस्टम ब्याडियो है। अब फर्क यह है कि जीपीएस पर अमेरिका का कंट्रोल होता है यानी अगर युद्ध की स्थिति हो, तो अमेरिका दुश्मन देश के जीपीएसस सिग्नल को कमजोर या बंद कर सकता है। इसे जैमिंग या स्पूफिंग कहा जाता है। 

यहीं से कहानी में ट्विस्ट आता है। पिछले कुछ साल में ईरान को यह समझ आ गया कि अगर वह जीपीएस पर निर्भर रहेगा, तो युद्ध के समय उसकी मिसाइलें भटक सकती हैं। इसलिए उसने धीरे-धीरे चीन के ब्याडियो सिस्टम का इस्तेमाल किया। ब्याडियो का फायदा यह है कि इसके मिलिट्री सिग्नल ज्यादा सुरक्षित होते हैं और इन्हें जाम करना आसान नहीं होता। मिसाइल को अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए रास्ता चाहिए होता है, ठीक वैसे ही जैसे आपको किसी नई जगह जाने के लिए गूगल मैप की जरूरत होती है। पहले मिसाइलें सिर्फ इनर्शियल सिस्टम यानी अंदर लगे सेंसर के भरोसे चलती थीं, लेकिन यह सिस्टम थोड़ी बहुत गलती कर सकता है। जब इसमें ब्याडियो जैसा सैटलाइट सिस्टम जुड़ जाता है, तो मिसाइल को लगातार अपडेट मिलता रहता है कि सही रास्ते पर हैं या नहीं। इससे किसी भी मिसाइल की सटीकता बढ़ जाती है। ईरान की मिसाइलें इसी वजह से सटीक लोकेशन पर हमला कर रही हैं।

जानकारी के मुताबिक गलती सिर्फ 1 मीटर से कम। जीपीएस के सिविलियन वर्जन में 5-10 मीटर है। मिलिट्री सिग्नल में फ्रीक्वेंसी हॉपिंग और ऑथेंटिकेशन है यानी इसके सिग्नल को आसानी से नहीं रोका जा सकता। मिसाइल उड़ते समय भी 2000 किमी दूर से कमांड भेज सकते हैं यानी रास्ता बदल सकते हैं। एक्सपर्ट्स का दावा है कि ब्याडियो खुद एआई पर नहीं चलता, लेकिन ईरान की मिसाइल में जो रिसीवर होता है, उसमें एआई का इस्तेमाल किया जा रहा है। एक रिपोर्ट में फ्रेंच इंटेलिजेंस के पूर्व डायरेक्टर अलैन जुइलेट ने कहा कि ईरान की मिसाइलें अब पहले से ज्यादा सटीक हैं। जीपीएस की जगह चाइनीज सिस्टम इस्तेमाल करने से यह हो रहा है। चीन के ब्याडियो में करीब 45 सैटलाइट्स हैं, जो खाड़ी देशों और हिंद महासागर में अच्छा कवरेज देते हैं। जुइलेट के मुताबिक युद्ध के दौरान दुश्मन देश कोशिश करता है कि सैटलाइट सिग्नल को खराब कर दिया जाए। इसे जैमिंग कहते हैं। ऐसे में मिसाइल को गलत सिग्नल मिल सकता है और वह रास्ता भटक सकती है, लेकिन यहीं पर एआई काम आता है। 

साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट और ओगुन सिक्योरिटी के सीईओ डॉ. ओलुदारे ओगुनलाना के मुताबिक ‘2026 का ईरान कॉन्फ्लिक्ट पहला युद्ध है जहां एआई-पावर्ड टारगेटिंग और ब्याडियो-गाइडेड मिसाइलें एक साथ इस्तेमाल हुईं। ब्याडियो अब सिर्फ नेविगेशन नहीं, चीन का टैक्टिकल डेटा लिंक बन गया है। ईरान अब चीन पर निर्भर है। ईरान की मिसाइलें और एआई की मदद से प्री-स्ट्राइक टारगेटिंग और रियल टाइम करेक्शन से लैस हैं। बता दें चागोस द्वीपसमूह का हिस्सा है, जो हिंद महासागर के बीच में स्थित 60 से ज्यादा द्वीपों की एक शृंखला है। यह अमेरिका और ब्रिटेन का संयुक्त सैन्य बेस है। यहां मौजूद बेस पर बी-2 स्टेल्थ बॉम्बर तैनात किए जा सकते हैं, जिन्हें अमेरिका ने 2025 में हूती विद्रोहियों के खिलाफ इस्तेमाल किया था। अमेरिका इस बेस को पश्चिम एशिया, दक्षिण एशिया और पूर्वी अफ्रीका में सुरक्षा अभियानों के लिए बेहद खास प्लैटफॉर्म मानता है।

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