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जीवाश्म ईंधन के कारण प्रदुषण बढा

लंदन। दुनिया कोयला, तेल और गैस जैसी जीवाश्म ईंधनों पर अपनी निर्भरता कम नहीं कर रही है और यह स्थिति अब “लत” बन चुकी है। यह कहना है ग्लोबल हेल्थ इंस्टीट्यूट में रिसर्च फेलो का हैं। रिसर्च फेलो के अनुसार, जीवाश्म ईंधन जलाने से बड़ी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है, इससे जलवायु परिवर्तन तेज होता है। यही ईंधन वायु प्रदूषण का मुख्य कारण हैं। रिसर्च फेलो के मुताबिक, हर साल करीब 20 लाख मौतें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जीवाश्म ईंधन जलाने के कारण होती हैं। इसके बावजूद, दुनिया साफ और सस्ती ऊर्जा के विकल्प उपलब्ध होने के बाद भी पारंपरिक ईंधनों पर निर्भर बनी हुई है।

रिसर्च फेलो बताती हैं कि निर्भरता के पीछे ऊर्जा कंपनियों के आर्थिक हित, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और धीमे नीतिगत बदलाव जिम्मेदार हैं। हमें नुकसान का पता है, विकल्प भी मौजूद हैं, फिर भी हम बदलाव नहीं कर पा रहे यही लत की विशेषज्ञों के मुताबिक, वायु प्रदूषण का सबसे ज्यादा असर हमारे फेफड़ों पर पड़ता है। इससे निमोनिया, फेफड़ों का कैंसर और अन्य क्रॉनिक बीमारियों का खतरा बढ़ता है। प्रदूषित हवा में मौजूद सूक्ष्म जहरीले कण रक्त प्रवाह में घुसकर पूरे शरीर को प्रभावित करते हैं। इससे हृदय रोग और स्ट्रोक की आशंका बढ़ती है।

इसके अलावा, शोध बताते हैं कि लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहने से दिमाग पर असर होता है, जिससे डिमेंशिया और अन्य न्यूरोलॉजिकल समस्याएं होती हैं। गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों के लिए यह खतरा और अधिक गंभीर है, क्योंकि विकासशील शरीर पर प्रदूषण का प्रभाव स्थायी हो सकता है।

रिसर्च फेलो के अनुसार, जीवाश्म ईंधन का बाजार वैश्विक राजनीति से गहराई से जुड़ा है। उदाहरण के तौर पर, रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद गैस की कीमतों में भारी वृद्धि हुई। ऊर्जा संकट से निपटने के लिए कई देशों ने हाल के वर्षों में कोयला, तेल और गैस उद्योग को लगभग एक ट्रिलियन डॉलर की सब्सिडी दी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही संसाधन स्वास्थ्य सेवाओं, स्वच्छ ऊर्जा और जनकल्याण योजनाओं में लगाए जाते, तब दीर्घकालिक लाभ कहीं अधिक होते।

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