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केजरीवाल के हाथ से खिसक गए राज्यसभा सांसद

नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी (आप) के लिए शुक्रवार का दिन किसी बड़े राजनीतिक भूकंप से कम नहीं रहा। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन की कोख से जन्मी इस 14 साल पुरानी पार्टी को अब तक का सबसे गहरा जख्म मिला है। पार्टी के कुल 10 राज्यसभा सांसदों में से 7 ने एक साथ इस्तीफा देकर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया है। इन बागियों में राघव चड्ढा, संदीप पाठक और स्वाति मालीवाल जैसे कद्दावर नाम शामिल हैं, जो पार्टी की रीढ़ माने जाते थे।

सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को इन सांसदों की नाराजगी की भनक पहले ही लग चुकी थी। संकट टालने के लिए उन्होंने शुक्रवार शाम इन नेताओं को अपने आवास पर बुलाया था। चर्चा थी कि केजरीवाल ने इन सांसदों को आश्वासन दिया था कि यदि वे वर्तमान स्थिति से खुश नहीं हैं, तो इस्तीफा दे सकते हैं और पार्टी उन्हें अगले कार्यकाल में पुनः अवसर देगी। हालांकि, यह सुलह की कोशिश धरी की धरी रह गई, क्योंकि सांसदों ने बैठक में पहुंचने से पहले ही भाजपा में शामिल होने का औपचारिक ऐलान कर दिया। पार्टी छोड़ने वालों में राघव चड्ढा, अशोक मित्तल, संदीप पाठक, हरभजन सिंह, संजीव अरोड़ा, विक्रम साहनी और स्वाति मालीवाल के नाम प्रमुखता से उभरे हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राघव चड्ढा ने पार्टी नेतृत्व पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि जिस दल को उन्होंने खून-पसीने से सींचा, वह अब अपने बुनियादी सिद्धांतों और आदर्शों से पूरी तरह भटक चुका है। इस बगावत की पटकथा गुरुवार को ही लिखी जा चुकी थी। बताया जा रहा है कि राघव चड्ढा को राज्यसभा में उप-नेता के पद से हटाकर अशोक मित्तल को जिम्मेदारी दिए जाने से असंतोष गहरा गया था। संवैधानिक नियमों के अनुसार, दो-तिहाई सांसदों का गुट होने के कारण चड्ढा ने इस विलय को कानूनी रूप से वैध बताया और संबंधित दस्तावेज राज्यसभा सभापति को सौंप दिए। भाजपा मुख्यालय में पार्टी अध्यक्ष ने इन सभी सांसदों का स्वागत किया, वहीं आम आदमी पार्टी ने इसे ऑपरेशन लोटस करार देते हुए भाजपा पर खरीद-फरोख्त का आरोप लगाया है। पंजाब और दिल्ली की सत्ता में काबिज आप के लिए अपने ही रणनीतिकारों का साथ छोड़ना एक अस्तित्वगत संकट बन गया है। अब देखना यह है कि पार्टी इस ऐतिहासिक टूट से खुद को कैसे उबार पाती है।

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