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कई करेंसी पर चल सकती है वैश्विक अर्थव्यवस्था

मुंबई । दुनिया इस समय सिर्फ आर्थिक उतार-चढ़ाव नहीं बल्कि एक बड़े संरचनात्मक बदलाव के दौर से गुजर रही है। अमेरिका की अगुवाई वाला मौजूदा वैश्विक आर्थिक मॉडल कमजोर पड़ रहा है, जिससे देश अब राष्ट्र प्रथम की नीति पर लौटते हुए अपने घरेलू उद्योगों और सप्लाई चेन को मजबूत करने पर ध्यान देंगे।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्वीकरण की रफ्तार अब धीमी पड़ सकती है और दुनिया ज्यादा राष्ट्रवादी आर्थिक मॉडल की तरफ बढ़ सकती है। रिपोर्ट बताती है कि पहले अमेरिका जो मुक्त व्यापार, खुले बाजार और वैश्विक पूंजी निवेश का सबसे बड़ा समर्थक था, अब उसी व्यवस्था पर दबाव देख रहा है। बढ़ती आर्थिक असमानता, राजनीतिक तनाव और भू-राजनीतिक संघर्षों ने कई देशों को अपने राष्ट्रीय हितों और घरेलू उद्योगों को प्राथमिकता देने के लिए विवश किया है। वैश्वीकरण के फायदे सभी तक समान रूप से न पहुंचने से अमीर-गरीब की खाई बढ़ी है, जिससे सरकारें अब घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देने और रोजगार सृजन के लिए अधिक हस्तक्षेप करेंगी। आने वाले समय में वित्तीय बाजारों और विदेशी पूंजी पर निर्भरता घट सकती है, और कई देश पूंजी प्रवाह पर अधिक नियंत्रण लगाएंगे। होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर तनाव से वैश्विक सप्लाई चेन में बार-बार व्यवधान आ सकता है, जिसके लिए कंपनियों और सरकारों को नई रणनीतियाँ बनानी होंगी।

रिपोर्ट यह भी कहती है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल से आय असमानता बढ़ेगी, जिससे सरकारों पर गरीब और मध्यम वर्ग को राहत देने के लिए नई सामाजिक योजनाएं लाने का दबाव पड़ेगा। इसके अलावा, डॉलर का वैश्विक दबदबा भी धीरे-धीरे कम हो सकता है और दुनिया कई बड़ी मुद्राओं पर आधारित नई व्यवस्था की ओर बढ़ सकती है। भारत के लिए यह बदलाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट सलाह देती है कि सेवा क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता के बजाय, भारत को अब विनिर्माण और औद्योगिक ढांचे को मजबूत करने पर ध्यान देना होगा। आयात पर निर्भरता कम करने और घरेलू उद्योगों को सशक्त बनाने के लिए मेक इन इंडिया जैसी उत्पादन-आधारित योजनाओं का विस्तार करना होगा। कुल मिलाकर, आने वाला दौर पूरी तरह मुक्त बाजार के बजाय औद्योगिक उत्पादन, राष्ट्रीय सुरक्षा और सरकारी हस्तक्षेप पर अधिक केंद्रित रहेगा।

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