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मजबूत आंकड़ों के बावजूद क्यों अहम है विश्वासमत

पटना। बिहार की राजनीति में शुक्रवार का दिन बेहद महत्वपूर्ण है, खासतौर पर तब जबकि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली सरकार विधानसभा में विश्वासमत हासिल करने के लिए सदन का सामना करेगी। मुख्यमंत्री के आग्रह पर बुलाए गए एक दिवसीय विशेष सत्र में यह प्रस्ताव पेश किया जाना है। 

इस विशेष सत्र के दौरान नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव समेत विपक्ष के अन्य नेता सरकार को घेरने की पूरी कोशिश करेंगे। तेजस्वी यादव के आक्रामक तेवर सदन का राजनीतिक तापमान बढ़ा सकते हैं और बहस को तीखा बना सकते हैं। यदि संख्याबल पर नजर डालें तो 243 सदस्यीय बिहार लेजिस्लेटिव असेम्बली में सत्तारूढ़ गठबंधन एनडीए बेहद मजबूत स्थिति में है। भारतीय जनता पार्टी (88), जनता दल (यूनाइटेड) (85), लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) (19), हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (5) और राष्ट्रीय लोक मोर्चा (4) को मिलाकर कुल 201 विधायक सरकार के समर्थन में हैं। इसके मुकाबले विपक्ष के पास मात्र 41 विधायक हैं, जिनमें राष्ट्रीय जनता दल (25), कांग्रेस (6), एआईएमआईएम (5), वाम दल (3) और अन्य (2) शामिल हैं। ऐसे में यह लगभग तय माना जा रहा है कि सरकार आसानी से विश्वासमत हासिल कर लेगी।

हालांकि, असली सस्पेंस संख्याओं में नहीं, बल्कि प्रक्रिया में छिपा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या विश्वासमत पर वास्तविक मतदान होगा या इसे ध्वनिमत से पारित किया जाएगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विश्वासमत केवल सरकार की संख्या शक्ति साबित करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह एक बड़ा राजनीतिक मंच भी है। जहां एक ओर सरकार अपनी स्थिरता, एकजुटता और नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन करना चाहेगी, वहीं विपक्ष इसे सरकार की नीतियों और फैसलों पर हमला करने के अवसर के रूप में देख रहा है।


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