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नारी शक्ति के नाम पर राजनीति

देशभर में आज नारी शक्ति वंदन अधिनियम के नाम पर भारतीय जनता पार्टी उत्सव मना रही है। “नारी शक्ति वंदन पखवाड़ा” के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि महिलाओं के अधिकारों की सबसे बड़ी हितैषी वही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सच्चाई है, या एक सुनियोजित राजनीतिक आवरण? संसद में 2023 में पारित इस कानून को संशोधित करने की कोशिश जब 2026 में की गई, तो भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा। संशोधन 58 मतों से गिर गया। विपक्ष ने एकजुट होकर इसे नकार दिया, क्योंकि इसके पीछे परिसीमन के जरिए राजनीतिक लाभ उठाने की मंशा साफ झलक रही थी। हार के बाद भाजपा ने इसे “नारी सम्मान” के उत्सव में बदलने की कोशिश शुरू कर दीकृयानी राजनीतिक हार को प्रचार की जीत में बदलने की रणनीति।

इतिहास गवाह है महिला अधिकारों पर हमेशा रहा विरोध

अगर हम इतिहास के पन्ने पलटें, तो सच्चाई कुछ और ही सामने आती है। जब हिंदू कोड बिल की बात हुईकृजिसे भीमराव अंबेडकर और जवाहरलाल नेहरू आगे बढ़ा रहे थेकृतब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और दक्षिणपंथी ताकतों ने इसका जमकर विरोध किया। संसद का घेराव हुआ, आंदोलन हुए।

 क्योंकि यह बिल 

महिलाओं का संपत्ति में बराबरी का अधिकार

तलाक का कानूनी अधिकार

एक पत्नी प्रथा लागू करना

गोद लेने का अधिकार

देना चाहता था।

संघ और जनसंघ ने इसे “संयुक्त परिवार पर हमला” और “परंपरा के खिलाफ” बताकर रोकने की कोशिश की। नतीजाकृपूरा बिल एक साथ पास नहीं हो सका, बल्कि टुकड़ों में कानून बने

हिंदू मैरिज एक्ट (1955)

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (1956)

हिंदू एडॉप्शन और मेंटेनेंस एक्ट (1956)

यानी, महिलाओं के अधिकारों की राह में सबसे बड़ा रोड़ा वही ताकतें थीं, जो आज खुद को उनका रक्षक बताती हैं।

सती प्रथा पर भी नरमी? इतिहास के काले पन्ने

1987 का रूप कंवर सती कांड भारतीय समाज को झकझोर देने वाली घटना थी। पूरे देश में विरोध हुआ, लेकिन भाजपा की तत्कालीन अध्यक्ष विजयाराजे सिंधिया ने इसे “परंपरा और आस्था” से जोड़कर देखा। यह वही दौर था जब सती निवारण अधिनियम लाना पड़ा। सवाल उठता है कि क्या यही महिला सम्मान है?

सुधारों का विरोध, राजनीति का समर्थन

समान वेतन अधिनियम (इंदिरा गांधी काल)

दहेज निषेध कानून

1989 में राजीव गांधी ने पंचायतों और स्थनीय निकायों में महिलाओं को आरक्षण देने की पहल की ।जो 1993 में.पंचायतों में 33ः महिला आरक्षण (नरसिम्हा राव सरकार) के रूप में लागू हुआ।

इन सभी सुधारों को लेकर जनसंघ/भाजपा का रुख या तो ठंडा रहा या आलोचनात्मक।

1996 से लेकर 2010 तक संसद में महिला आरक्षण बिल लटकता रहा। राज्यसभा में पास होने के बावजूद लोकसभा में अटकाया गया। हर बार नए बहानेकृकभी ओबीसी कोटा, कभी प्रक्रिया।

आज का सच- समर्थन या रणनीति?

2023 में जब नारी शक्ति वंदन अधिनियम पास हुआ, तो वह विपक्ष के सहयोग से संभव हुआ। लेकिन इसे लागू करने में 2026 तक देरी क्यों की गई? और फिर अचानक 16 अप्रैल 2026 को गजट नोटिफिकेशन, उसी दिन परिसीमन संशोधन का प्रयास! यह महज संयोग नहीं लगता। यह एक रणनीति की तरह दिखता है पहले कानून को टालो, फिर राजनीतिक फायदे के हिसाब से लागू करो।

निष्कर्ष: नारी शक्ति या सत्ता की रणनीति?

भाजपा का इतिहास यह बताता है कि:

जब भी महिलाओं को वास्तविक अधिकार देने की बात आई, विरोध हुआ

जब राजनीतिक लाभ दिखा, समर्थन सामने आया

और जब हार मिली, तो उसे “उत्सव” में बदल दिया गया

आज “नारी शक्ति वंदन पखवाड़ा” मनाया जा रहा है, लेकिन असली सवाल यह है

क्या यह महिलाओं के अधिकारों का सम्मान है, या राजनीतिक नैरेटिव का निर्माण?

क्या इतिहास को भुलाकर वर्तमान की छवि बनाई जा सकती है?

देश की महिलाएं अब प्रतीक नहीं, भागीदारी चाहती हैं। और यह तय उन्हें करना है कि कौन उनके अधिकारों का सच्चा साथी हैकृऔर कौन सिर्फ उनका नाम लेकर राजनीति कर रहा है।

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