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पश्चिम एशिया में भीषण युद्ध

 वाशिंगटन। पश्चिम एशिया में पिछले 19 दिनों से जारी संघर्ष अब एक बेहद विनाशकारी और निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाए जाने के बाद, ईरान ने भी पलटवार करते हुए इजरायल सहित खाड़ी देशों पर मिसाइलों और ड्रोनों की बौछार कर दी है। बुधवार को ईरान द्वारा सऊदी अरब, कतर और संयुक्त अरब अमीरात के तेल एवं गैस ठिकानों पर किए गए हमलों ने इस युद्ध के दायरे को पूरे क्षेत्र में फैला दिया है। इस बीच, अंतरराष्ट्रीय हलकों से बड़ी खबर सामने आ रही है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मध्य पूर्व में सैन्य अभियान को मजबूती देने के लिए हजारों अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती पर विचार कर रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन का यह कदम ईरान के खिलाफ जारी जंग में अगले बड़े दांव की तैयारी का हिस्सा है।

अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती से राष्ट्रपति को सैन्य विकल्पों में लचीलापन मिलेगा। इस योजना का प्राथमिक उद्देश्य स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से तेल टैंकरों की आवाजाही को सुरक्षित करना है। यह एक ऐसा मिशन होगा जिसमें नौसेना और वायुसेना की मुख्य भूमिका होगी। हालांकि, रणनीतिक चर्चाओं में यह बात भी सामने आई है कि अमेरिका ईरान के तटों पर अपने सैनिकों को सीधे तैनात कर सकता है ताकि तेल आपूर्ति को बाधित होने से बचाया जा सके। सबसे चौंकाने वाला विकल्प ईरान के खर्ग द्वीप पर जमीनी सेना भेजने को लेकर है। खर्ग द्वीप ईरान के कुल तेल निर्यात का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा संभालता है, जो उसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। हालांकि, सैन्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ऐसा कोई भी ऑपरेशन बेहद जोखिम भरा हो सकता है, क्योंकि ईरान के पास इस द्वीप की रक्षा के लिए मिसाइल और ड्रोन क्षमताएं मौजूद हैं। इसके अतिरिक्त, अमेरिकी प्रशासन ईरान के समृद्ध यूरेनियम भंडार वाले क्षेत्रों को अपने नियंत्रण में लेने के लिए भी सैन्य तैनाती की संभावनाओं पर मंथन कर रहा है।

हालांकि, सैनिकों की इस बड़े पैमाने पर तैनाती से राष्ट्रपति ट्रंप के लिए राजनीतिक चुनौतियां भी खड़ी हो सकती हैं। अपने चुनावी अभियान के दौरान उन्होंने वादा किया था कि वे अमेरिका को मध्य पूर्व के नए संघर्षों में नहीं धकेलेंगे। अमेरिकी जनता के बीच भी इस युद्ध को लेकर समर्थन काफी सीमित है। हाल ही में एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने इस युद्ध नीति से नाराजगी जताते हुए इस्तीफा भी दे दिया है। आंकड़ों के मुताबिक, ईरान के साथ अब तक किसी सीधे जमीनी टकराव के बिना ही 13 अमेरिकी सैनिक अपनी जान गंवा चुके हैं और लगभग 200 घायल हुए हैं। ऐसे में हजारों और सैनिकों को युद्ध क्षेत्र में उतारना न केवल सैन्य रूप से, बल्कि राजनीतिक रूप से भी एक बड़ा जुआ साबित हो सकता है।

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