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सच्चिदानंद स्वरुप परब्रह्म परमात्मा मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्री राम के अतिप्रिय सेवक, निष्ठावान एवं समर्पित भक्त और भगवान श्रीराम के अत्यंत विश्वसनीय पार्षद श्री हनुमानजी महाराज श्रीराम भक्ति तत्व के महानतम आदर्श हैं, वे अपने आराधकों को जीवन के चरम लक्ष्य राम भक्ति की और अग्रसर करते हुए राम भक्तों को अपना आश्रय प्रदान करते हैं। दाता हैं। श्री हनुमानजी राम भक्ति में रत मनुष्यों की संकटापन्न स्थिति में उनके संकटों का निवारण करते हुए जीवन घ्में शुभ मङ्गल का संचार करने वाले प्रत्यक्ष देवता है, वे एक तरफ जहां राम चरणारविन्द में द्रढ निष्ठा पूर्वक समर्पित रहते हैं, वहीं राम काज हेतु सदैव तत्पर भी रहा करते हैं। यद्यपि हनुमानजी सब जगह विद्यमान हैं, तथापि जहां जहां भगवान् श्री राम का कीर्तन गाया जाता है, अथवा जहां राम कथा होती है, वहां वहां मारुति नंदन भाव विभोर होकर उसी समय पहुंच जाते हैं। राम कथा के अमर गायक श्री हनुमानजी महाराज आज भी रसिकजनों को राम कथामृत प्रदान करते हुए स्वयं भी ऋषि मुनियों से राम कथा का श्रवण करते हैं। गोस्वामी तुलसीदास श्री हनुमानजी महाराज का स्तवन इस तरह करते है-
यत्र यत्र रघुनाथ कीर्तनं, तत्र तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम्।
वाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं, मारुतिं नमत राक्षसांतकम्।।
अर्थात जहां जहां रघुनाथ श्रीराम का कीर्तन होता है, अथवा श्रीराम की पावन कथा, स्मरण या जप होता है, वहां वहां नैत्रों में अश्रुपूरित आनंद लिए हनुमानजी तत् काल उपस्थित हो जाते हैं। ऐसे राक्षसों के लिए काल स्वरूप श्री हनुमानजी को प्रणिपात किया जाना चाहिए। रामायण में उल्लेख मिलता है कि भगवान् श्री राम और भगवती सीता द्वारा प्रदत्त आशिर्वाद से श्री हनुमानजी अजर अमर हैं, और कल्प पर्यन्त पृथ्वी लोक में निवास करते हुए श्री राम कथा को कहते और श्रवण करते हैं। श्री राम चरित मानस के सुंदरकांड में गोस्वामी तुलसीदास देवी सीता द्वारा हनुमानजी को अपना आशीर्वाद प्रदान किए जाने का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना,होहु तात बल सील निधाना।
अजर अमर गुननिधि सुत होहू,करहुं बहुत रघुनायक छोहू।
अर्थात सीता माता ने हनुमानजी को भगवान् श्री राम का प्रिय जानकर उन्हें आशीर्वाद दिया कि है तात! तुम बल और शील के निधान, अजर अमर और गुणों की निधि होओ, और श्रीरघुनाथजी तुम पर बहुत कृपा करें। श्री हनुमानजी महाराज प्रत्यक्ष देवता माने जाते हैं, और यह मान्यता है कि किसी भी दैहिक, दैविक और भौतिक ताप अथवा संकटपूर्ण किसी अन्य गंभीर परिस्थिति में जब उसके समाधान का कहीं कोई रास्ता नहीं दिखाई देता हो, तब हनुमानजी की शरण ग्रहण कर आत्म निवेदन करने पर आसन्न संकटापन्न स्थिति के समाधान का रास्ता निकल आता है। हनुमान चालीसा में कहा गया है-
नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा। संकट ते हनुमान छुड़ावै, मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।
अर्थात जो लोग निरंतर अपकी उपासना करते हैं, दुःख उनके समीप भी नहीं आता, और जो मनुष्य श्रद्धा भक्ति पूर्वक आपका स्मरण, आराधना करते हैं, उनके संकट दूर हो जाते हैं।
हनुमानजी का जन्म और उनके कर्म अद्भुत एवं विस्मयकारी हैं। धर्म शास्त्रों के अनुसार भगवान् शिव के द्वारा अपने स्वामी श्री राम की सेवा की तीव्र अभिप्सा के निमित्त उन्होंने ग्यारहवें रुद्र के रूप में वायुदेव केसरी और देवी अञ्जना के पुत्र हनुमान के रूप में जन्म लिया, और भगवान् श्री राम की सेवा कर अपनी अभिलाषा पूरी की। वैसे कुछ ग्रंथकार श्री हनुमानजी के वानर रूप को स्वरुपगत नहीं मानते हुए जातिगत मानते हैं, किंतु पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चूंकि भगवान् विष्णु ने रामावतार में पुरुष रुप धारण किया था,और भगवान् शिव उनकी सेवा के अभिलाषी थे, ऐसे में यदि मनुष्य रूप में जन्म लेकर सेवा करते तो यह दास भाव के अनुकूल नहीं होता, इसलिए उन्होंने मनुष्य से निम्न समझी जाने वाली वानर योनि में जन्म लेकर दास भाव से अपने स्वामी श्री राम की सेवा की।
श्रीरामचरितमानस के अनुसार बाल्यावस्था में ही हनुमानजी ने उदयकालीन सूर्यदेव को एक फल समझकर निगल लिया था, परिणामस्वरूप त्रलौकी में हाहाकार की स्थिति निर्मित हो गई थी। बाद में भगवान् सूर्य ही उनके गुरु हुए, और हनुमानजी ने उनसे शिक्षा ग्रहण की, वे सूर्य देव के स्नेह भाजन हुए और उनसे तेज,औज, बुद्धि और बल पा गए। हमारे वेद, उपनिषद एवं पौराणिक ग्रंथों में भगवान् श्री राम के पावन नाम की बड़ी महिमा गाई गई है, और हनुमानजी महाराज तो भगवान् श्री राम के अतिप्रिय दास हैं, इसलिए वे राम नाम स्मरण को कभी बिसारते ही नहीं, और हर क्षण अपने प्रभु का स्मरण किया करते हैं। श्री रामरक्षा स्तोत्र में गोस्वामी तुलसीदास भगवान् शिव और माता पार्वती के बीच हुए संवाद का उल्लेख करते हुए एवं राम नाम की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं-
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे,
सहस्त्र नामतत्तुल्यं राम नाम वरानने।
अर्थात है देवी पार्वती ! राम राम राम इस प्रकार तीन बार राम नाम का उच्चारण सहस्त्र नाम के तुल्य है, इसलिए मैं सदैव राम नाम में ही रमण करता हूं। भगवान् शिव स्वयं को श्री राम के दास मानते हैं, और श्री हनुमान स्वयं रुद्रावतार हैं ऐसे में सेवक अपने स्वामी का विस्मरण आखिर कैसे कर सकते है, एतदर्थ श्री हनुमानजी नित्य निरंतर राम नाम में ही रमे रहते हैं।
विराट वैभव से परिपूर्ण श्री हनुमानजी महाज्ञानी और अतुलनीय बल के धाम हैं, फिर भी विनयशील हैं, और राम काज में अत्यंत लघु रुप धारण कर लेते हैं। हनुमानजी भगवान् श्री राम की आज्ञा पाकर जब सीता माता की खोज हेतु निकले तो वे अत्यंत लघु रूप में आकाश मार्ग से गमन करते हुए लंका पहुंचे
श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते है कि-
मसक समान रूप कपि धरी,
लंकहि चलेऊ सुमिरि नरहरि।
अति लघु रूप धरेऊ हनुमाना,
पैठा नगर सुमिरि भगवाना।
अर्थात, लंका की भूमि पर कदम रखने के पहले उन्होंने मनुष्य रूप में पृथ्वी पर विचरण कर रहे, अपने स्वामी श्रीराम का स्मरण करते हुए लंका की सीमा में प्रवेश किया,और जब लंका नगरी में माता सीता की खोज शुरू की, तब भी लघु रूप धारण कर सर्व प्रथम अपने स्वामी श्री राम का स्मरण करते हुए सीताजी का अनुसंधान करने लगे। हनुमानजी शुद्ध भक्त हैं, इसलिए अहंकार रहित हैं, और उनके द्वारा राम काज निष्पादन हमें प्रैरित करता है कि किसी बड़े उद्देश्य की पूर्ति के लिए छोटा हो जाना ही ठीक है। अहंकार पूर्वक किए गए किसी भी महान कार्य में पूरी तरह सफलता नहीं प्राप्त हो सकती, इसीलिए हनुमानजी अपने स्वामी श्री राम की आज्ञा पाकर जब सीता माता की खोज हेतु निकले तो अपने मुख में राम नाम को धारण किया किंतु अपने स्वरूप को अत्यंत छोटा आकार प्रदान किया।
हनुमानजी महाराज अजर अमर हैं, और सब युगों में वर्तमान है, और अपने आराधकों को संरक्षण प्रदान करते हुए उन्हें राम भक्ति पथ पर अग्रसर करते हैं, श्री हनुमानजी राम कथा के अमर गायक हैं, ओर आज भी रसिकों जनों को राम कथा का अमृत प्रदान करते हुए ऋषि मुनियों से स्वयं भी राम कथा का श्रवण करते हैं।
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