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सैटेलाइट से माइक्रोवेव तरंगें मिट्टी और चट्टानों में अंदर तक करती हैं प्रवेश

तेहरान । 7 मार्च 2026 की रात 80 से ज़्यादा इज़राइली विमानों ने तेहरान और मध्य ईरान में 230 बम गिराए थे। इस बमबारी में एक अंडरग्राउंड बैलेस्टिक मिसाइल स्टोरेज और प्रोडक्शन साइट को ध्वस्त कर दिया गया। यहीं से ईरानी सशस्त्र बलों के सैकड़ों सैनिक ऑपरेट करते थे। इससे एक दिन पहले 6 मार्च को इज़राइल के 50 लड़ाकू विमानों ने करीब 100 बम गिराकर तेहरान के लीडरशिप कॉम्पलेक्स के नीचे बना खुफिया बंकर पूरी तरह नष्ट कर दिया। यह पहली बार नहीं है, इज़राइल ने 2025 में भी ईरान के कई अंडरग्राउंड बंकरों को निशाना बनाया था। अब सवाल यह है कि आखिर जमीन के अंदर छिपे हुए बंकरों का पता कैसे चलता है? कैसे इज़राइल ने ये जाना कि पड़ाड़ों और जमीन के नीचे बंकर हैं?

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक  दरअसल, जासूसी की आधुनिक तकनीक ने अंडरग्राउंड चीजों को खोजना बहुत आसान बना दिया है। अंतरिक्ष में हजारों किलोमीटर दूर घूमते सैटेलाइट, हाई-टेक सेंसर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मिलकर जमीन के नीचे चल रही गतिविधियों तक का पता लगा सकते हैं। अंडरग्राउंड बंकर बनाना तो आसान है, लेकिन उसे पूरी तरह छिपा पाना नामुमकिन है। इसकी वजह बंकर की बुनियादी जरूरतें हैं। ऐसी किसी भी फेसलिटी को चलाने के लिए बिजली चाहिए, ताकि मशीनें और कंप्यूटर काम कर सकें। लोगों के लिए सांस लेने योग्य हवा चाहिए, जिसके लिए वेंटिलेशन शाफ्ट बनाए जाते हैं। अंदर वैज्ञानिक, सैनिक और तकनीशियन आते-जाते रहते हैं। बाहर की दुनिया से संपर्क बनाए रखने के लिए संचार व्यवस्था जरूरी होती है। 

आज के जासूसी सैटेलाइट बेहद एडवांस रडार तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। इनमें सबसे अहम तकनीक सिंथेटिक एपर्चर रडार (एसएआर) है। यह तकनीक सैटेलाइट से माइक्रोवेव तरंगें जमीन की ओर भेजती है। ये तरंगें मिट्टी और चट्टानों में कुछ मीटर अंदर तक प्रवेश कर सकती हैं। जब ये तरंगें जमीन के नीचे किसी खाली जगह, सुरंग या बंकर से टकराती हैं, तो इनके वापस लौटने का पैटर्न बदल जाता है। वैज्ञानिक इस बदलाव का एनालिसिस करके जमीन के अंदर बने ढांचों का अनुमान लगा लेते हैं। अमेरिका के गुप्त जासूसी सैटेलाइट इसी तकनीक का इस्तेमाल करते हैं, जिससे दिन-रात और हर मौसम में निगरानी करना संभव हो जाता है। इज़राइल ने ईरान के अंडरग्राउंड बंकरों का पता लगाने के लिए कई तकनीकों का इस्तेमाल किया है। सिर्फ रडार या तापमान ही नहीं, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल भी गुप्त ठिकानों की जानकारी दे देते हैं। खुफिया एजेंसियां सिग्नल्स इंटेलिजेंस तकनीक का इस्तेमाल करती हैं, जो रेडियो तरंगों और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सिग्लनों को पकड़ती है। यदि किसी इलाके से असामान्य रेडियो कम्युनिकेशन हो रहा हो, सैटेलाइट फोन का इस्तेमाल बढ़ा हो या भारी बिजली की खपत हो रही हो, तो यह गतिविधि खुफिया एजेंसियों की नजर में आ जाती है। इसके अलावा मशीनों से निकलने वाले इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नल भी छिपे नहीं रह पाते।

इसके अलावा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) पर आधारित सैटेलाइट एनालिसिस जासूसी का बेहद शक्तिशाली तरीका बन चुका है। एआई पुरानी और नई सैटेलाइट तस्वीरों की तुलना करके बहुत छोटे-छोटे बदलाव भी पकड़ सकता है। अगर किसी इलाके में अचानक नई सड़क बनती है, मिट्टी का रंग बदलता है, पेड़-पौधे हटाए जाते हैं या रात में वाहनों की आवाजाही बढ़ती है, तो एआई सिस्टम तुरंत इन बदलावों की पहचान कर जानकारी दे देता है। इन सभी तकनीकों के संयुक्त उपयोग का एक बड़ा उदाहरण ईरान की गुप्त परमाणु फेसलिटी फोर्डो का खुलासा है। यह फेसलिटी पहाड़ के भीतर गहराई में बनाई जा रही थी और ईरान को विश्वास था कि इसे कोई नहीं ढूंढ पाएगा, लेकिन सैटेलाइट निगरानी सिस्टमों ने पहाड़ के भीतर असामान्य संरचना के संकेत पकड़ लिए। थर्मल सेंसर ने वेंटिलेशन से निकलती गर्म हवा का पता लगाया। कम्युनिकेशन सिग्लनों और निर्माण की गतिविधियों ने संदेह को और मजबूत किया।

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