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शांति समझौते की असली जरूरत अमेरिका को है, न कि ईरान को?

वाशिंगटन। इस्लामाबाद में 21 घंटे चली अमेरिका-ईरान वार्ता भले ही बिना किसी किसी नतीजे के खत्म गई हो, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया के बाद एक नया नैरेटिव सामने आया है। क्या इस बार शांति समझौते की असली जरूरत अमेरिका को है, न कि ईरान को? विश्लेषकों का मानना है कि इस बार हालात उलटे हैं। आमतौर पर जहां अमेरिका दबाव बनाता है और दूसरा पक्ष झुकने की स्थिति में होता है, वहीं इस बार ईरान ज्यादा मजबूत नजर आया।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इस्लामाबाद में कहा कि कोई समझौता नहीं हुआ। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान ने अमेरिका की शर्तें मानने से इनकार कर दिया है। हालांकि उन्होंने पाकिस्तान की भूमिका की तारीफ की, लेकिन उनके चेहरे और शब्दों से निराशा साफ झलक रही थी। बातचीत फेल होने के बावजूद विदेश नीति पर नजर रखने वाले माइकल कुगेलमैन ने कहा कि अमेरिका, घरेलू राजनीतिक कारणों से, एक ऐसी डील चाहता है जिससे वह युद्ध से बाहर निकल सके। इतने सीनियर ग्रुप का पाकिस्तान तक आना अमेरिका के कमिटमेंट को दिखाता है। वेंस के कमेंट्स के बावजूद, शायद यह अभी खत्म नहीं हुआ है और बातचीत हो सकती है लेकिन यह साफ नहीं है कि वे पाकिस्तान में होंगी या कहीं और। 


रिपोर्ट के मुताबिक सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि इस्लामाबाद में चल रही बातचीत के दौरान अमेरिका उन लक्ष्यों को हासिल करना चाहता था, जिन्हें वह जंग के जरिए हासिल नहीं कर सका था, जिसमें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नियंत्रण और ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी सामग्री हटाने जैसे मुद्दे शामिल हैं, लेकिन ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने इन कोशिशों को नाकाम कर दिया। ईरान ने बातचीत में तर्कसंगत पहल और प्रस्ताव रखे, अब गेंद अमेरिका के पाले में है कि वह इन मुद्दों को नरमी से देखे। साथ ही यह भी कहा कि अमेरिका ने जंग की तरह ही बातचीत में भी गलत आकलन किया है और जब तक वॉशिंगटन किसी उचित समझौते पर सहमत नहीं होता, तब तक होर्मुज स्ट्रेट के मुद्दे पर कोई बदलाव नहीं होगा। रिपोर्ट की मानें तो ईरान को कोई जल्दबाजी नहीं है, और फिलहाल अगली बैठक के समय और स्थान को लेकर कोई फैसला नहीं हुआ है।

वहीं ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता बकई ने कहा कि ईरान और अमेरिका के बीच कई मुद्दों पर सहमति बन गई है और 2-3 जरूरी मामलों पर राय में अंतर था1 उन्होंने बताया कि बातचीत का यह दौर पिछले साल का सबसे लंबा दौर था, जो कुल 24 या 25 घंटे तक चला। बकई ने भी साफ किया कि बातचीत में होर्मुज, परमाणु कार्यक्रम, युद्ध की भरपाई, प्रतिबंध हटाने और जंग खत्म करने जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि डिप्लोमेसी कभी खत्म नहीं होती, और कहा कि यह टूल देश के हितों की रक्षा के लिए है और डिप्लोमैट्स को युद्ध और शांति दोनों समय में अपनी ड्यूटी निभानी चाहिए।

अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में जेडी वेंस ने यह संकेत दिया कि अमेरिका ने फाइनल और बेस्ट ऑफर टेबल पर रख दिया है, लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि जब कोई देश फाइनल ऑफर की बात करता है, तो इसका मतलब होता है कि वह डील को लेकर ज्यादा उतावला है। इसी पर एक विश्लेषक ने कहा कि अच्छी बात यह है कि बातचीत टूटी नहीं है, लेकिन बुरी बात यह है कि कोई ब्रेकथ्रू भी नहीं हुआ। दरअसल, बातचीत के दौरान करीब पांच राउंड की चर्चा हुई और हर राउंड के बाद दोनों पक्षों ने लिखित प्रस्ताव और जवाब प्रस्तावों की अदला-बदली की। इससे यह साफ है कि एक बड़ा ढांचा बन चुका है, लेकिन उसपर अंतिम सहमति नहीं बन पाई। एक्सपर्ट्स कह रहे हैं कि ईरान इस समय ज्यादा मजबूत स्थिति में है।

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