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अशांति से शांति की ओर यात्रा ही है बुद्ध का मार्ग

प्रतिवर्ष वैशाख मास की पूर्णिमा को ‘बुद्ध पूर्णिमा’ के रूप में मनाया जाता है। बुद्ध पूर्णिमा इस वर्ष 1 मई को है। माना जाता है कि 563 ई.पू. वैशाख पूर्णिमा के ही दिन लुम्बनी वन में शाल के दो वृक्षों के बीच गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था, जिन्होंने वैशाख पूर्णिमा को ही बोध गया में बोधि वृक्ष के नीचे बुद्धत्व प्राप्त किया था। यही कारण है कि बौद्ध धर्म में बुद्ध पूर्णिमा को सबसे पवित्र दिन माना गया है। गौतम बुद्ध का वास्तविक नाम सिद्धार्थ गौतम था। गौतम उनका गौत्र था किन्तु कालांतर में वह सिद्धार्थ गौतम, महात्मा बुद्ध, भगवान बुद्ध, गौतम बुद्ध, तथागत आदि विभिन्न नामों से जाने गए। बचपन से ही राजकुमार सिद्धार्थ घंटों एकांत में बैठकर ध्यान किया करते थे लेकिन फिर भी उन्होंने पुत्र जन्म तक सांसारिक सुखों का उपभोग किया परन्तु धीरे-धीरे उनका मन सांसारिक सुखों से उचाट होता गया।

सिद्धार्थ मन की शांति पाने के उद्देश्य से एक दिन भ्रमण के लिए अपने सारथी छेदक को साथ लेकर रथ में सवार हो महल से निकल पड़े। रास्ते में उनका मनुष्य की दुःख की चार घटनाओं से साक्षात्कार हुआ। जब उन्होंने दुःख के इन कारणों को जाना तो मोहमाया और ममता का परित्याग कर पूर्ण सन्यासी बन गए। सबसे पहले उन्होंने मार्ग में एक रोगी व्यक्ति को देखा और सारथी से पूछा, ‘‘यह प्राणी कौन है और इसकी यह कैसी दशा है?’’सारथी ने बताया, ‘‘यह भी एक मनुष्य है और इस समय यह बीमार है। इस दुनिया में हर व्यक्ति को अपने जीवन में कभी न कभी रोगी होकर दुःखों का सामना करना ही पड़ता है।’’आगे बढ़ने पर सिद्धार्थ ने मार्ग से गुजरते एक वृद्ध, निर्बल व कृशकाय व्यक्ति और उसके बाद एक मृत व्यक्ति की अर्थी ले जाते विलाप करते लोगों को देखा तो हर बार सारथी से उसके बारे में पूछा। सारथी ने एक-एक कर उन्हें मनुष्य की इन चारों अवस्थाओं के बारे में बताया कि हर व्यक्ति को कभी न कभी बीमार होकर कष्ट झेलने पड़ते हैं। बुढ़ापे में काफी दुःख झेलने पड़ते हैं, उस अवस्था में मनुष्य दुर्बल व कृशकाय होकर चलने-फिरने में भी कठिनाई महसूस करने लगता है और आखिर में उसकी मृत्यु हो जाती है।

सिद्धार्थ यह रहस्य जानकर बहुत दुःखी हुए। आगे उन्हें एक साधु नजर आया, जो बिल्कुल शांतचित्त था। साधु को देख सिद्धार्थ के मन को अपार शांति मिली और उन्होंने विचार किया कि साधु जीवन से ही मानव जीवन के इन दुखों से मुक्ति संभव है। बस फिर क्या था, देखते ही देखते सिद्धार्थ सांसारिक मोहमाया के जाल से बाहर निकलकर पूर्ण वैरागी बन गए और एक दिन रात्रि के समय पत्नी यशोधरा तथा पुत्र राहुल को गहरी नींद में सोता छोड़ उन्होंने घर-परिवार और राजसी सुखों का परित्याग कर दिया तथा सत्य एवं ज्ञान की खोज में एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटकते रहे। उन्होंने छह वर्षों तक जंगलों में कठिन तप किया और सूखकर कांटा हो गए किन्तु ज्ञान की प्राप्ति न हो सकी। उसके बाद उन्होंने शारीरिक स्वास्थ्य व मानसिक शक्ति प्राप्त की और बोध गया में एक पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर गहन चिंतन में लीन हो गए तथा मन में दृढ़ निश्चय कर लिया कि इस बार ज्ञान प्राप्त किए बिना वे यहां से नहीं उठेंगे।

सात सप्ताह के गहन चिंतन-मनन के बाद वैशाख मास की पूर्णिमा को 528 ई.पू. सूर्याेदय से कुछ पहले उनकी बोधदृष्टि जागृत हो गई और उन्हें पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हो गई। उनके चारों ओर एक अलौकिक आभा मंडल दिखाई देने लगा। उनके पांच शिष्यों ने जब यह अनुपम दृश्य देखा तो उन्होंने ही राजकुमार सिद्धार्थ को पहली बार ‘तथागत’ कहकर संबोधित किया। ‘तथागत’ यानी सत्य के ज्ञान की पूर्ण प्राप्ति करने वाला। पीपल के जिस वृक्ष के नीचे बैठकर सिद्धार्थ ने बुद्धत्व प्राप्त किया, वह वृक्ष ‘बोधिवृक्ष’ कहलाया और वह स्थान, जहां उन्होंने यह ज्ञान प्राप्त किया, बोध गया के नाम से विख्यात हुआ तथा बुद्धत्व प्राप्त करने के बाद ही सिद्धार्थ को ‘महात्मा बुद्ध’ कहा गया। महात्मा बुद्ध मन की साधना को ही सबसे बड़ी साधना मानते थे। अपने 80 वर्षीय जीवनकाल के अंतिम 45 वर्षों में उन्होंने दुनियाभर में घूम-घूमकर बौद्ध धर्म का प्रचार किया और लोगों को उपदेश दिए।

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