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दुनिया के सबसे ज्यादा बच्चे भारत में हैं लेकिन स्वास्थ्य के मामले में ये बच्चे काफी पिछड़ी हालत में हैं। देश के ज्यादातर शहरों के ज्यादातर पब्लिक स्कूलों में सुबह होने वाली प्रार्थना (प्रेयर असेंबली) अब स्थगित कर दी जाती है। कारण पता करने पर स्कूल प्रबंधन बताते हैं कि हर असेंबली में पांच छह से एक दर्जन से अधिक बच्चे प्रेयर के दौरान गश खाकर गिर जाते हैं। यह एक चिंता जनक तथ्य है और जिन्हें पहली बार पता चल रहा है वह अचरज कर सकते हैं लेकिन यह सच्चाई है। बच्चों खासकर शहरी बच्चों की शारीरिक सामर्थ्य बेहद कम हो रही है कुपोषण फास्टफूड पढ़ाई कोचिंग किताबों के बोझ से दबे बच्चे बचा समय मोबाइल में बिता रहे हैं और अपनी शारीरिक क्षमता को खो रहे हैं आउटडोर गेम से दूरी भी इस का एक बड़ा कारण है। ऐसे हालात में बच्चों को शारीरिक श्रम से जोड़ने की बेहद जरूरत है। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का हाल का एक बयान बेशक कुछ एसी कमरों में बैठ कर बालविकास की योजना बनाने वाले अंग्रेजीदा लोगों को चुभ सकता है लेकिन मुख्यमंत्री का असली ईशारा भविष्य के लिए संघर्ष और संस्कार से तप कर निकली युवा पीढ़ी देने का है।
विचार कीजिए क्या हम अपनी आने वाली नस्लों की रगों में भारतीयता की जगह आलस्य और सुविधाभोगी कल्चर दे रहे हैं? जरा सोचिएकृहड्डियों को कमजोर करने वाली सुख-सुविधाएं, एयर-कंडीशनर कमरों में सुलगती सुकुमार पीढ़ी और स्क्रीन पर रेंगती हुई बेजान उंगलियां... आज का हिंदुस्तान अपनी संतानों को शिक्षा नहीं, बल्कि चुनौतियों से पीठ दिखाकर भागने का एक धीमा जहर परोस रहा है! हमारी रीढ़ की हड्डी को इतना लचीला बना दिया गया है कि वह जिंदगी के पहले ही थपेड़े में कड़कड़ाकर टूट जाए। लेकिन इसी सन्नाटे को चीरती हुई जब देश के सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री पदासीन योगी का संबोधन गूंजता है, तो दिल्ली से लेकर लखनऊ तक का मखमली पाखंड भरभराकर ढह जाता है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जब गरजते हैं किकृजो शिक्षक बच्चों को धूप में तपना, मिट्टी से जूझना और श्रमदान की आग में जलना सिखाते हैं, उन पर उंगली उठाने की जुर्रत मत करना; उन्हें सूली पर नहीं, सम्मान के सर्वाेच्च शिखर पर बैठाओ!कृतो यह महज़ कोई प्रशासनिक डांट नहीं है। यह सनातन भारत की छाती पर लगा एक ऐसा शॉक-ट्रीटमेंट है, जिसने सीधे हमारी सोई हुई रगों में खौलते खून को याद दिला दिया है। यह एक आधुनिक शासक की वह हुंकार है, जो इस देश के पाखंडी समाज और बिकाऊ कैमरे वालों को उनकी औकात बता रही है। इस दहाड़ के पीछे छिपे उस प्रचंड और आक्रामक आयाम को समझिए, जिसका सीधा नाता हमारे वेदों के वज्र और गुरुकुलों के रक्त-पसीने के इतिहास से है। आज की तथाकथित सॉफ्ट जनरेशन के मां-बाप बच्चे के हाथ में झाड़ू देखते ही छाती पीटने लगते हैं। कानून की धाराएं और बाल-अधिकारों के खोखले ढोंग लेकर थानों में कतारें लग जाती हैं। धिक्कार है ऐसी सोच पर! इतिहास गवाह है कि जिन बच्चों के हाथों में बचपन में छाले नहीं पड़ते, जवान होने पर उनके कंधों से राष्ट्र के बड़े दायित्व भी फिसल जाते हैं।
जरा सनातन इतिहास के पन्नों को पलटिए और याद कीजिए महर्षि धौम्य के आश्रम के उस बालक आरुणि को। मूसलाधार बारिश हो रही थी, रात का घना अंधेरा था और कड़कती बिजली के बीच गुरु का एक आदेश आता है कि खेत की मेड़ टूट गई है, उसे बांधकर आओ। बालक आरुणि भागता हुआ खेत पर पहुंचता है, मिट्टी बह रही होती है। जब कोई उपाय नहीं सूझता, तो वह खुद उस ठंडे, बर्फीले पानी के बीच मेड़ की जगह लेट जाता है और पूरी रात अपनी छाती से पानी को रोके रखता है। सुबह जब गुरु उसे वहां जमा हुआ देखते हैं, तो उनकी आंखों से आंसू बह निकलते हैं। वह आरुणि को छाती से लगाकर कहते हैं कि आज से तुम केवल शिष्य नहीं, बल्कि अखंड ज्ञान के प्रतीक हो।
क्या वह बाल-उत्पीड़न था? नहीं, वह निष्ठा और कठिन परिस्थितियों से लोहा लेने की वो पराकाष्ठा थी, जिसने एक साधारण बालक को उद्दालक जैसे महान ऋषि में बदल दिया।
इसी उज्जयिनी के संदीपनि आश्रम को भी देखिए। भोर की उस कंपकंपाती ठंड में, एक तरफ पूरी धरती का स्वामी, यदुवंश का कुलदीपककृराजकुमार कृष्ण है, और दूसरी तरफ दरिद्र ब्राह्मण का बेटा सुदामा। दोनों के नंगे बदन पर पसीने की बूंदें जम चुकी हैं, कंधों पर भारी कुल्हाड़ी है और वे खूंखार जंगलों को चीरते हुए सूखी लकड़ियों के गट्ठर उठा रहे हैं। क्या वह गुरु द्वारा शिष्यों का शोषण था?नहीं! वह उस ऋषि परंपरा की धधकती हुई भट्टी थी, जो जानती थी कि जब तक सोने को तपाया नहीं जाएगा, तब तक वह कुंदन नहीं बनेगा। वेद ज्ञान चिल्लाकर कहता है कि जिस शिक्षा में पसीना नहीं बहाता, जो शिक्षा तुम्हारे भीतर के मैं और अहंकार की चिता नहीं जला सकती, वह शिक्षा नहीं, बल्कि केवल पेट पालने का एक कसाईखाना है। योगी आदित्यनाथ इसी सनातन सत्य की ढाल बनकर खड़े हुए हैं। वे समाज को थप्पड़ मारकर जगा रहे हैं कि जिस देश के साक्षात ईश्वर ने गुरु के आंगन में गोबर उठाया हो, उस देश में स्कूल की माटी साफ करना गुनाह कैसे हो गया?
यह हकीकत है कि शिक्षक की गोद में प्रलय और निर्माण दोनों पलते हैं..
आधुनिक संदर्भ में आपको बता दें कि अच्छा पोषण मजबूत रोग प्रतिरोधक क्षमता, कम बीमारियाँ, बेहतर स्वास्थ्य और एक उत्पादक समाज का स्रोत है। भारत में, स्कूल जाने वाले अधिकांश बच्चे कुपोषण, विशेषकर अल्पपोषण से ग्रस्त हैं। यह समीक्षा भारत के विभिन्न क्षेत्रों के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में बच्चों में दुर्बलता, बौनापन, अधिक वजन और मोटापे की व्यापकता का पता लगाने के लिए की गई है। इस उद्देश्य के लिए, रिसर्च गेट, पबमेड, गूगल स्कॉलर, अमेरिकन जर्नल ऑफ क्लिनिकल न्यूट्रिशन जैसे विभिन्न स्रोतों और भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और विभिन्न राज्य सरकारों की वेबसाइटों जैसे विभिन्न एजेंसियों के सर्वेक्षणों का उपयोग करके तीस अध्ययनों की समीक्षा की गई। सभी अध्ययनों में डेटा संग्रह के लिए आहार संबंधी जानकारी, संरचित साक्षात्कार और मानवमितीय मापों का उपयोग किया गया। विभिन्न अध्ययनों के परिणाम बताते हैं कि अल्प वजन वाले बच्चों का प्रतिशत 6.6ः से 83ः तक है। बौनेपन की व्यापकता 13.8ः से 56.1ः तक, दुर्बलता की व्यापकता 6.7ः से 75ः तक और अल्प वजन की व्यापकता 6.6ः से 83ः तक है। निष्कर्ष यह निकला कि बच्चों में कुपोषण एक बड़ी समस्या है और इस समस्या से निपटने के लिए बहुत ध्यान देने की
योगी आदित्यनाथ जानते हैं कि अगर देश की सीमाओं पर तोपों के सामने टिकना है, अगर विज्ञान के मोर्चों पर महाशक्तियों की आंखों में आंखें डालनी हैं, तो हमें कांच के खिलौने नहीं, लोहे के मर्द तैयार करने होंगे। जो बच्चा आज स्कूल की क्यारियों में कुदाल चलाने से डरेगा, वह कल देश के दुश्मनों की छाती पर संगीन क्या चलाएगा? शासक का यह विजन उस शिक्षक के हाथों को वज्र की ताकत देना है, ताकि वह बिना किसी कानूनी या सामाजिक खौफ के, इस देश की मिट्टी से चंद्रगुप्त पैदा कर सके। आधुनिक पतन का दौर केवल किताबी कीड़े, डिग्रियों की गुलामी, पसीने से नफरत और खोखली सहूलियतें।आदित्यनाथ योगी का नया विजन प्राचीन ऋषि परंपरा का पुनरुत्थानकृजहां श्रम ही सबसे बड़ा संस्कार और राष्ट्ररक्षा का कवच है।आज की शिक्षा व्यवस्था ने बच्चों को इतना कमजोर बना दिया है कि वे छोटी सी नाकामी पर अवसाद के गर्त में गिर जाते हैं। मुख्यमंत्री इसी सड़ांध को साफ करना चाहते हैं। वे बच्चों को मुश्किलों की धूप में खड़ा करना चाहते हैं, ताकि जब जिंदगी उनके सामने पहाड़ जैसी चुनौतियां लेकर आए, तो वे टूटने के बजाय उस पहाड़ का सीना चीरकर रास्ता बना सकें।
फैसला अभिभावकों का है वह अपने बच्चों को एक ऐसी पीढ़ी बनाना चाहते हैं जो वातानुकूलित कमरों में बैठकर सिर्फ डिग्रियां गिनेगी, या फिर एक ऐसा महामानव तैयार करना चाहते हैं जिसके पैरों की धमक से दुश्मन का सिंहासन डोल जाए? हमें अपनी शिक्षा को पश्चिमी चश्मे की गुलामी से मुक्त करना ही होगा। हमें उनकी रगों में वेदों की उस ऋचा का रक्त बहाना है जो एक मजबूत राष्ट्रभक्त पीढ़ी का निर्माण करे। सैकड़ों सालों के अंधकार के बाद कोई एक ऐसा शासक आता है जो आने वाली पीढ़ियों के चरित्र की नींव में अपना खून-पसीना लगाता है। उठो और इस प्रचंड विजन के सारथी बनो! इस श्रमदान की कुदाल को थाम लो, क्योंकि जो समाज अपने बच्चों को पसीना बहाना नहीं सिखाता, इतिहास गवाह है, एक दिन उसकी आने वाली पीढ़ियों को खून के आंसू रोने पड़ते हैं। किताबों के पन्नों से सिर्फ पेट पाला जाता है, राष्ट्र का निर्माण तो आज भी स्कूल गुरुकुल की तपी हुई माटी और शिक्षक के संस्कारों से ही होता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का यह उद्बोधन समूचे देश के लिए एक प्रेरणा स्रोत बनना चाहिए और इस के मूल में छिपी एक मजबूत राष्ट्रभक्त धर्मनिष्ठ वीर योद्धा पीढ़ी बनाने के मूल उद्देश्य को समझना होगा।
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