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भगवान शिव के साथ तीन का संयोग

सनातन धर्म में भगवान शंकर का अति महत्वपूर्ण स्थान है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश इन त्रिमूर्ति के बिना इस सृष्टि की रचना की कल्पना असम्भव है। ये तीनों इस सृष्टि के रचनाकार हैं, रक्षक हैं और संहारक भी है।

जब भक्तगण शिव भक्ति साहित्य का अध्ययन करते हैं तो यह पाते हैं कि शिव के जीवन में श्तीन्य संख्या का अत्यधिक महत्व है-

१. त्रिनेत्र- इनके तीन नेत्र हैं। इनके तीसरे नेत्र का महत्वपूर्ण स्थान है। यह ज्ञानचक्षु है। यह नेत्र जब शिवजी कुपित होते हैं तब खुलता है। कामदेव पर जब शिवजी क्रोधित हुए तब उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोलकर उसको भस्म कर दिया था। यह नेत्र शिव की असीम शक्ति का प्रतीक है। पृथ्वी पर जब अनाचार अत्याचार और अशान्ति फैलती है तब कुपित शिवजी अपना तृतीय नेत्र खोलकर विश्व में शान्ति स्थापित करते हैं।

२. त्रिशूल- शिवजी अपने हाथ में त्रिशूल धारण करते हैं। यह भी सत्व, रज और तमो गुण का प्रतीक है। यह तीन कालों का प्रतिनिधित्व करता है। सत, रजत और तमो गुण भी इसमें समाविष्ट है। शिवजी ने गुणों को त्रिशूल रूप में धारण कर रखा है। यह भूत, भविष्य और वर्तमान को इंगित करता है।

३. त्रिपुंड- सफेद चंदन से शिवजी अपने मस्तक पर तीन पंक्तियों से निर्मित तिलक धारण करते हैं जिसे त्रिपुंड कहा जाता है। त्रिपुंड में तीन रेखाएं होती हैं। प्रत्येक रेखा में नौ देवता होते हैं, इस प्रकार कुल सत्ताईस देवताओं का निवास त्रिपुंड में होता है। त्रिपुंड लगाने से सकारात्मक ऊर्जा और दिव्य शक्ति प्राप्त होती है। त्रिपुंड लगाने से अहंकार, अज्ञानता और मोह माया से मुक्ति प्राप्त होती है। त्रिपुंड की तीन रेखाएं ब्रह्मा, विष्णु और महेश की प्रतीक हैं।

४. बिल्व पत्र- भगवान शिव को बिल्व-पत्र अत्यधिक प्रिय है। इसमें भी तीन पत्र होते हैं। कहा जाता है कि माता पार्वती के स्वेद बिन्दु से बिल्व वृक्ष की उत्पत्ति हुई है। इसके तीन पत्रों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास है। बिल्व पत्रों के कुछ वृक्षों पर पाँच और सात पत्रों के बिल्व पत्र भी पाये जाते हैं। भगवान शिव को चढ़ाये जाने के लिए तीन पर्ण वाले अखंडित बिल्व पत्र का ही चयन किया जाता है।

५. पुष्प- भगवान शिव को वैसे तो सभी प्रकार के सुगन्धित पुष्प समर्पित किए जाते हैं परन्तु विशेष कर धतूरा, आंकड़ा और हारसिंगार के फूलों का शिव पूजन में विशेष महत्व है।

६. सन्तान- शिवजी सम्पूर्ण सृष्टि के पालनहार हैं परन्तु पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार इनकी तीन सन्तानें हैं- १. श्रीगणेशजी, २. श्रीकार्तिकेयजी और ३. अशोकसुन्दरी जो शिवजी की जलाधारी के अन्तिम छोर पर निवास करती है। कुछ पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शिवजी की पाँच कन्याएँ दशाई गई है।

इस प्रकार हम सभी के जीवन के रक्षक भगवान शिव अपनी असाधारण छबि के कारण अपने भक्तों पर सर्वदा कृपा बनाए रखते हैं। भगवान शिव को भोला भंडारी भी इसीलिए कहा जाता है। एक लोटा अभिषेक के जल से तथा सामान्य पूजन से भी प्रसन्न होकर अपने भक्तों पर कृपा बनाए रखते हैं।

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