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ध्वजारोहण या ध्वज फहराना

15 अगस्त 2026 का दिन प्रत्येक भारतीय के लिए गौरव, उत्साह और देशभक्ति का अवसर है। इस वर्ष हम भारत की स्वतंत्रता की 79वीं वर्षगांठ पूरी होने के बाद 80वाँ स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं। पाठक जानते हैं कि 15 अगस्त 1947 को भारत ने औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता प्राप्त की थी और इसी ऐतिहासिक दिन की स्मृति में प्रत्येक वर्ष स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है।स्वतंत्रता दिवस का सबसे महत्वपूर्ण और भावनात्मक क्षण राष्ट्रीय ध्वज से जुड़ा होता है। तिरंगा केवल तीन रंगों से बना एक ध्वज नहीं, बल्कि यह भारत की स्वतंत्रता, संप्रभुता, एकता, विविधता और असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान का प्रतीक है। भारत का वर्तमान राष्ट्रीय ध्वज 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा द्वारा अपनाया गया था। जब 15 अगस्त को तिरंगा आकाश में लहराता है, तो उसके साथ करोड़ों भारतीयों की आशाएं, आकांक्षाएं और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यबोध भी जुड़ जाता है।

राष्ट्रीय ध्वज से जुड़े नियमों में समय के साथ महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। 26 जनवरी 2002 से भारतीय ध्वज संहिता में बदलाव कर नागरिकों को अपने घर, कार्यालय और प्रतिष्ठानों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने का अधिकार दिया गया। इससे पहले आम नागरिकों के लिए राष्ट्रीय ध्वज फहराने पर कई प्रतिबंध थे। बाद में 30 दिसंबर 2021 के संशोधन के माध्यम से राष्ट्रीय ध्वज के निर्माण में हाथ से काते और हाथ से बुने कपड़ों के साथ-साथ मशीन से बने कपास, पॉलिएस्टर, ऊन, रेशम और खादी के बंटिंग के उपयोग की अनुमति दी गई। इस प्रकार अब केवल खादी से बने ध्वज तक यह व्यवस्था सीमित नहीं रही।इसके बाद 20 जुलाई 2022 को भारतीय ध्वज संहिता में एक और महत्वपूर्ण संशोधन किया गया। इसके तहत किसी नागरिक के घर पर राष्ट्रीय ध्वज को दिन और रात दोनों समय फहराने की अनुमति दी गई। इसलिए सूर्यास्त के बाद घर पर तिरंगा उतारना अनिवार्य नहीं है। हालांकि, रात में ध्वज फहराते समय उसकी गरिमा और सम्मान का पूरा ध्यान रखना आवश्यक है। राष्ट्रीय ध्वज साफ-सुथरा, सही स्थिति में और सम्मानजनक एवं प्रमुख स्थान पर प्रदर्शित होना चाहिए। केसरिया पट्टी हमेशा ऊपर की ओर होनी चाहिए और ध्वज उल्टा नहीं लगाया जा सकता। ध्वज फटा, मैला या अस्त-व्यस्त नहीं होना चाहिए तथा उसे जमीन, फर्श या पानी को स्पर्श नहीं करना चाहिए। राष्ट्रीय ध्वज का उपयोग सजावट, झालर, बंटिंग आदि के रूप में नहीं किया जा सकता।आज अधिकार और जनभागीदारी की भावना को आगे बढ़ाते हुए ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के माध्यम से नागरिकों को राष्ट्रीय ध्वज के प्रति सम्मान और राष्ट्रभक्ति व्यक्त करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। यह अभियान तिरंगे को केवल सरकारी संस्थानों तक सीमित रखने के बजाय प्रत्येक नागरिक के घर और जीवन से जोड़ने का माध्यम बना है।

हालांकि, यहां यह समझना भी जरूरी है कि ‘ध्वजारोहण’ और ‘ध्वज फहराना’ शब्दों का प्रयोग अक्सर एक-दूसरे के स्थान पर कर दिया जाता है, लेकिन इनके अर्थ और परंपरागत प्रयोग में अंतर है। ध्वजारोहण का शाब्दिक अर्थ है-ध्वज को नीचे से ऊपर उठाकर निर्धारित ऊंचाई तक ले जाना और स्थापित करना। वहीं ध्वज फहराने का आशय है-पोल के ऊपर स्थित ध्वज को खोलकर अथवा फैलाकर हवा में लहराना। इस दृष्टि से दोनों क्रियाओं की प्रकृति अलग है। भारत के राष्ट्रीय पर्वों में इस अंतर को समझने के लिए 15 अगस्त और 26 जनवरी का उदाहरण सबसे उपयुक्त है। 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं। इसके विपरीत 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति राष्ट्रीय ध्वज का ध्वजारोहण करते हैं। इसलिए सामान्यतः कहा जाता है कि 15 अगस्त को ध्वज फहराया जाता है और 26 जनवरी को ध्वजारोहण किया जाता है।इसके पीछे दोनों राष्ट्रीय पर्वों की ऐतिहासिक परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण हैं। 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ था। उस समय ब्रिटिश शासन के प्रतीकात्मक रूप से हटने और स्वतंत्र भारत के उदय का संदेश देते हुए तिरंगे को ऊपर फहराया गया। दूसरी ओर, 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ और देश एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य बना। इसलिए गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति द्वारा ध्वजारोहण की परंपरा स्थापित हुई। हालांकि सामान्य बोलचाल में ‘ध्वजारोहण’ और ‘ध्वज फहराना’ कई बार समान अर्थ में प्रयुक्त होते हैं और सरकारी अथवा सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी दोनों शब्द सुनने को मिल सकते हैं। लेकिन राष्ट्रीय पर्वों की विशिष्ट संवैधानिक एवं ऐतिहासिक परंपरा को ध्यान में रखते हुए 15 अगस्त के लिए ‘राष्ट्रीय ध्वज फहराना’ और 26 जनवरी के लिए ‘राष्ट्रीय ध्वजारोहण’ कहना अधिक सटीक और प्रचलित है। भारत सरकार के राष्ट्रीय पोर्टल पर भी स्वतंत्रता दिवस के संदर्भ में 15 अगस्त के अवसर पर तिरंगे के फहराने और ध्वज-समारोह का उल्लेख मिलता है।

दरअसल, तिरंगे का फहरना केवल एक औपचारिक क्रिया नहीं है। यह उस संघर्ष की याद दिलाता है जिसमें असंख्य ज्ञात-अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। जब तिरंगा हवा में लहराता है, तो उसमें शहीद भगत सिंह का साहस, महात्मा गांधी का सत्य और अहिंसा का संदेश, सुभाष चंद्र बोस का अदम्य राष्ट्रवाद, सरदार पटेल का राष्ट्रीय एकीकरण और असंख्य वीरों का त्याग दिखाई देता है। यही कारण है कि स्वतंत्रता दिवस का ध्वज समारोह भारतीय जनमानस के लिए अत्यंत भावनात्मक महत्व रखता है। 80वाँ स्वतंत्रता दिवस इसलिए भी विशेष है कि यह हमें केवल अतीत का गौरव याद करने का अवसर नहीं देता, बल्कि भविष्य के भारत के निर्माण का संकल्प भी कराता है। स्वतंत्रता केवल विदेशी शासन से मुक्ति का नाम नहीं; वास्तविक स्वतंत्रता तभी सार्थक है जब देश का प्रत्येक नागरिक समान अवसर, सम्मान, सुरक्षा और विकास का अनुभव करे। तिरंगे के नीचे खड़े होकर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों का भी ईमानदारी से निर्वहन करेंगे।

अंततः यही कहना उचित होगा कि 15 अगस्त का तिरंगा हमें संदेश देता है कि स्वतंत्रता बड़ी कीमत पर मिली है और इसकी रक्षा करना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। ध्वज का फहरना हमारे स्वतंत्र अस्तित्व का प्रतीक है, जबकि उसके प्रति सम्मान हमारी राष्ट्रीय चेतना का परिचायक है। इस 80वें स्वतंत्रता दिवस पर आइए, तिरंगे को केवल सलामी ही न दें, बल्कि उसके मूल्यों-एकता, अखंडता, समानता, त्याग और राष्ट्रप्रेम को अपने जीवन में उतारने का संकल्प भी लें। जय हिंद! जय भारत!


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