Search

Shopping cart

Saved articles

You have not yet added any article to your bookmarks!

Browse articles

राहुल गांधी का मूल्यांकन

भारतीय राजनीति में शायद ही कोई नेता ऐसा रहा हो जिसकी आलोचना और चर्चा उतनी हुई हो जितनी राहुल गांधी की। पिछले डेढ़ दशक में उन्हें कभी अनुभवहीन, कभी अनिच्छुक राजनेता और कभी वंशवाद का प्रतीक बताया गया। इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने भी राहुल गांधी को अच्छी नीयत रखने वाला किंतु शौकिया राजनेता। प्रश्न यह है कि क्या यह मूल्यांकन आज भी उतना ही प्रासंगिक है, या समय ने इस निष्कर्ष को चुनौती दी है?

राहुल गांधी के आलोचक प्रायः उनके पारिवारिक पृष्ठभूमि को उनके राजनीतिक जीवन का केंद्रीय तथ्य मानते हैं। इसमें संदेह नहीं कि वे भारत के सबसे प्रसिद्ध राजनीतिक परिवार से आते हैं। किंतु क्या किसी नेता का अंतिम मूल्यांकन उसके उपनाम से होना चाहिए या उसके सार्वजनिक जीवन के कार्यों से? यदि केवल वंशवाद ही कसौटी है, तो भारतीय राजनीति के अनेक दलों और नेताओं की वैधता पर समान प्रश्न उठने चाहिए। लगभग हर बड़े दल में ऐसे नेता मौजूद हैं जिनकी प्रारंभिक राजनीतिक पहचान पारिवारिक विरासत से बनी। किंतु उनके मूल्यांकन में अक्सर उनकी राजनीतिक क्षमता, जनाधार और चुनावी प्रदर्शन को भी महत्व दिया जाता है। राहुल गांधी के मामले में यह उदारता कम दिखाई देती है। पिछले वर्षों में राहुल गांधी ने भारतीय राजनीति में एक अलग प्रकार की राजनीतिक शैली प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। भारत जोड़ो यात्रा और भारत जोड़ो न्याय यात्रा केवल राजनीतिक अभियान नहीं थे; वे जनता से प्रत्यक्ष संवाद स्थापित करने के प्रयास भी थे। हजारों किलोमीटर की यात्राएँ, लगातार जनसंपर्क और विभिन्न सामाजिक समूहों से संवाद किसी ऐसे नेता की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं जिसे राजनीति में रुचि नहीं है, यह कहना कठिन हो जाता है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि राहुल गांधी ने अत्यंत प्रतिकूल राजनीतिक वातावरण में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखी है। भारतीय राजनीति में ऐसे अनेक नेता रहे हैं जो एक बड़ी चुनावी हार के बाद सार्वजनिक जीवन के हाशिये पर चले गए। इसके विपरीत राहुल गांधी राष्ट्रीय राजनीति के प्रमुख विपक्षी चेहरों में बने रहे, लोकसभा में चुने जाते रहे और विपक्षी विमर्श को प्रभावित करते रहे। किसी भी लोकतंत्र में यह स्वयं एक राजनीतिक उपलब्धि मानी जाती है।

यहीं रामचंद्र गुहा जैसे विश्लेषकों के मूल्यांकन पर प्रश्न उठता है। यदि किसी नेता की सफलता का मापदंड केवल सत्ता प्राप्ति है, तो लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका का महत्व कम हो जाता है। और यदि सफलता का मापदंड जनसंपर्क, वैचारिक हस्तक्षेप, संगठनात्मक प्रभाव और सार्वजनिक स्वीकार्यता भी है, तो राहुल गांधी का मूल्यांकन अधिक संतुलित होना चाहिए।

गुहा की आलोचना का एक दूसरा पक्ष भी है। वे कांग्रेस में गांधी परिवार की केंद्रीय भूमिका को भारतीय लोकतंत्र की समस्या मानते हैं। यह एक वैध तर्क है। किंतु निष्पक्ष विश्लेषण की मांग यह है कि वही कसौटी अन्य दलों और अन्य राजनीतिक परिवारों पर भी समान कठोरता से लागू की जाए। यदि किसी दल में वंशानुगत नेताओं की उपस्थिति राजनीतिक क्षमता का प्रमाण मानी जाती है, तो दूसरे दल में वही तथ्य लोकतांत्रिक दोष का पर्याय कैसे बन जाता है? राहुल गांधी का मूल्यांकन करते समय यह स्वीकार करना आवश्यक है कि उनकी राजनीति से असहमति संभव है। उनकी रणनीतियों की आलोचना भी की जा सकती है। किंतु उन्हें केवल एक राजनीतिक उपनाम तक सीमित कर देना उनके सार्वजनिक जीवन के वास्तविक प्रयासों की उपेक्षा होगी।

लोकतंत्र में किसी नेता का अंतिम मूल्यांकन इतिहास करता है, और इतिहास केवल वंश नहीं देखता; वह यह भी देखता है कि कठिन समय में किसने संघर्ष किया, जनता से संवाद किया और अपने विचारों के लिए कितना जोखिम उठाया। राहुल गांधी के समर्थक इसी आधार पर कहते हैं कि उनके बारे में प्रचलित धारणाओं और उनके वास्तविक राजनीतिक प्रयासों के बीच की दूरी को अब नए सिरे से परखा जाना चाहिए। इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि राहुल गांधी कौन हैं; प्रश्न यह भी है कि क्या भारतीय सार्वजनिक विमर्श उन्हें उसी कसौटी पर परखता है जिस पर वह अन्य नेताओं को परखता है। यदि उत्तर नहीं है, तो शायद पुनर्मूल्यांकन का समय आ चुका है। रामचंद्र गुहा से इतना.तो आग्रह किया ही जाना चाहिए कि जिन राजनीतिक दलों ने वंशवादी प्रतिष्ठा के आधार पर ही दूसरे दलों से नेताओं को तोड़ा और अपने दल में शामिल किया उन पर वे क्या राय रखते हैं।क्या सिंधिया,रीता बहुगुणा,वीरेन्द्र सिंह,चौटाला,वरुण गांधी ,अमरेंद्र सिह ,पटवा,सखलेचा,राजवीर सिंह,पंकज सिंह,पीयूष गोयल,बांसुरी स्वराज,अनुराग ठाकुर ,अशोक चव्हाण, देवड़ा,प्रवेश वर्मा आदि भी समीक्षा के समानाधार पर कसे जाते हैं?इन सबकी योग्यता इनका परिवार ही है.लेकिन राहुल गांधी ही बौद्धिक पूर्वाग्रहों का आसान शिकार हैं क्यों? वंश किसी नेता को अवसर तो दे सकता है, लेकिन जनता बार-बार केवल वंश के आधार पर वोट नहीं देती। लोकतंत्र में विरासत प्रवेश-द्वार हो सकती है, स्थायित्व नहीं।

राहुल गांधी की आलोचना कीजिए, उनकी राजनीति से असहमत रहिए, लेकिन उनके राजनीतिक जीवन के दो दशकों के संघर्ष, यात्राओं और जनसंवाद को केवल एक उपनाम में समेट देना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा। तब तो और भी नहीं जब न्यायाधीश इतिहासकार के रूप में जाना जाता हो।


Comments (0)

Leave a Comment