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उत्तर भारत के पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश,छत्तीसगढ़,ओडिशा व प. बंगाल जैसे राज्य इन दिनों भीषण गर्मी की चपेट में हैं। इन राज्यों में कई जगहों पर तापमान 40 डिग्री से लेकर 44 डिग्री तक पहुंच गया है। पिछले दिनों भारतीय मौसम विज्ञान विभाग द्वारा हीटवेव अलर्ट भी जारी किया जा चुका है। मौसम विभाग ने अपनी चेतावनी में लू चलने और तापमान में 4 डिग्री तक बढ़ोतरी होने की संभावना को लेकर लोगों को सचेत किया है। पिछले कुछ वर्षों से लगभग हर साल गर्मी के तापमान में इज़ाफ़ा होता ही जा रहा है। जीवन के लिये एकमात्र ग्रह पृथ्वी गत दो दशकों से ग्लोबल वार्मिंग का निरन्तर प्रभाव झेल रही है। इसके अलावा भी वैज्ञानिकों द्वारा भारत में तेज़ गर्मी के और भी कई कई कारण बताये जा रहे हैं। इन कारणों में ख़ासकर जलवायु परिवर्तन के अलावा हीट डोम और अल नीनो प्रभाव को रेखांकित किया जा रहा है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार उच्च दबाव प्रणाली गर्म हवा को ज़मीन के पास फंसाकर ढक्कन की तरह काम करती है, जिससे तापमान तेजी से बढ़ता है। परिणाम स्वरूप गर्मी और तीव्र हो जाती है। उधर पहले से हो रहा जलवायु परिवर्तन, सूखी मिट्टी और कम वनस्पति (वृक्ष कटान) इसे बढ़ावा देते हैं। इसी को हीट डोम प्रभाव कहा जाता है। इसके अतिरिक्त ग्रीनहाउस गैसों से वैश्विक तापमान बढ़ रहा है। इसने हीटवेव की तीव्रता और इसकी अवधि दोनों को ही बढ़ा दिया है। बताया जा रहा है कि 2026 में दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों में 92 शहर केवल भारत में हैं। इन गर्म क्षेत्रों में केवल दिन ही नहीं बल्कि यहां की रातें भी गर्म रहती हैं। इसे सीवियर वार्म नाइट कहते हैं। यह स्थिति जलवायु परिवर्तन का ही नतीजा है। साथ ही इस हीट वेव पर अल नीनो का प्रभाव भी बताया जा रहा है। आशंका व्यक्त की जा रही है कि 2026 में सुपर अल नीनो की आशंका से रिकॉर्ड गर्मी पड़ना भी संभव है। अल नीनो का प्रभाव ही प्रशांत महासागर में गर्म पानी का दौर हवाओं को कमज़ोर कर भारत में गर्मी और कम मानसून लाता है। इसी के साथ गर्मी को बढ़ने में अनियंत्रित शहरीकरण की भी बड़ी भूमिका है। देश में चारों ओर खेत व जंगल वृक्ष निरन्तर कम होते जा रहे हैं। और शहरीकरण के नाम पर कंक्रीट के जंगल बढ़ते जा रहे हैं। लिहाज़ा अर्बन हीट आइलैंड का प्रभाव और कंक्रीट-आधारित विकास इसके लिए ख़ासकर ज़िम्मेदार हैं। यह कंक्रीट के जंगल दिन में गर्मी को सोखते हैं और रात में इसे छोड़ते हैं। उधर शहरों में होती जा रही पेड़-पौधों की कमी से वातावरण में नमी घटती जा रही है। यही वजह है कि दिल्ली व अहमदाबाद जैसे महानगरों में रातें पूर्व की तुलना में 60ः अधिक गर्म होने लगी हैं। शहरों में कंक्रीट, डामर और सीमेंट की पक्की इमारतें सूर्य की गर्मी सोख लेती हैं तथा रात में धीरे-धीरे छोड़ती हैं, जिससे तापमान ग्रामीण क्षेत्रों से 5-10 डिग्री अधिक रहता है। पेड़-पौधों और हरियाली की कमी से वाष्पीकरण घटता है, जो प्राकृतिक शीतलन प्रदान करता। साथ ही वाहनों, एसी और उद्योगों से निकलने वाली गर्मी इसे और भी तीव्र बनाती है। गोया भारतीय शहरों में बढ़ता शहरीकरण बढ़ते तापमान के लिये 60ः तक ज़िम्मेदार है। और यही तापमान वृद्धि प्रति दशक 0.2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि करता है। शहरीकरण ने गर्मी में 90ः इज़ाफ़ा किया है तथा रात्रिकालीन सतह तापमान लगभग 70-80ः तक बढ़ा है। मिसाल के तौर पर जमशेदपुर में शहरीकरण ने तापमान वृद्धि में 100ः योगदान दिया।
ऐसे में सबसे ज्वलंत प्रश्न यही है कि आखि़र तापमान वृद्धि की ज़िम्मेदार हमारी वर्तमान पीढ़ी क्या अपनी आने वाली नस्लों को भी ऐसी ही या इससे भी अधिक तपती पृथ्वी देकर जायेगी या इससे बचने के कुछ उपाय करना चाहेगी ? इसके लिये सबसे पहले भारतीय शहरों में हरित आवरण को विस्तार देने की सख़्त ज़रूरत है। हालाँकि इसके लिये अनेक सरकारी योजनाएं व स्थानीय उपाय प्रभावी हैं जोकि शहरी गर्मी कम करने में हमारी सहायता करते हैं। इसके लिये बाक़ायदा कार्य योजना बनाकर तथा वर्षाऋतु के आरंभ से ही सरकारी और नगर निकाय भूमि पर बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अभियान चलाये जा सकते हैं। कई राज्य इस दिशा में सक्रियता से काम भी कर रहे हैं। वृक्षारोपण को एक आंदोलन का रूप देने के लिये हर व्यक्ति अपने परिवार के शादी ब्याह,मैरिज एनिवर्सरी,बर्थडे, जन्म मृत्यु बरसी जैसे अवसरों पर वृक्षारोपण कर इन अवसरों को यादगार बनाने के साथ साथ जलवायु को बेहतर बनाने की दिशा में भी अपना क़ीमती योगदान दे सकता है। इसके अलावा हर व्यक्ति जहां ज़मीन कम हो वहां अपने घरों की छतों पर रूफ़ गार्डनिंग कर सकता है और वर्टिकल गार्डन भी लगा सकते हैं। अपने घरों के खुले क्षेत्र में अधिक से अधिक गमले लगाकर भी तापमान को काफ़ी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है तथा ताज़ी ऑक्सीजन प्राप्त की जा सकती है। ग़ौरतलब है कि कोरोना काल में जब देशभर में अचानक कोरोना प्रभावित लोगों के लिये ऑक्सीजन की कमी पैदा हुई थी उस समय लोगों को हरियाली और वृक्षारोपण की ख़ूब याद आई थी। कई बीमार लोग तो खेतों में पेड़ों के नीचे बैठकर स्वास्थ्य लाभ लेते देखे गये। इस आपदा ने ऑक्सीजन को लेकर लोगों में इतनी जागरूकता बढ़ायी कि उसी समय से गमलों व पौधों की नर्सरी का व्यवसाय कई गुना बढ़ गया।
बहरहाल भविष्य में तापमान वृद्धि से बचने व इसके दीर्घकालिक उपाय करने के साथ साथ तात्कालिक रूप से शरीर पर पड़ने वाले इसके दुष्प्रभाव से बचाव करना भी बेहद ज़रूरी है। इसके लिए सबसे पहले अपने शरीर को डिहाइड्रेशन से बचाना और शरीर को हाइड्रेटेड रखना सबसे ज़रूरी है। इसके लिये बहुत सारा पानी पीना चाहिये और बार बार पीना चाहिए। इसके अलावा नारियल पानी, नींबू पानी, सत्तू व ओआरएस जैसे शीतल पेय भी शरीर के तापमान को नियंत्रित रखने में मददगार होते हैं और डिहाइड्रेशन रोकते हैं। ज़ीरा, धनिया या ख़स मिला ठंडा पानी भी इसके लिये बहुत फ़ायदेमंद है। इसके साथ ही अनावश्यक रूप से बाहर निकलने से भी बचना चाहिये। इसके साथ ही घरों में पर्दे,सनशेड आदि लगाकर धुप को रोका जा सकता है। रात के समय खिड़कियां खुली रखने,पंखा चलने व आवश्यकता हो तो गीले कपड़े पहनने या ठन्डे पानी से नहाने व पैरों को ठन्डे पानी में भिगोकर रखने से भी प्रचंड गर्मी से राहत पाई जा सकती है। इस मौसम में आहार में भी सावधानियां बरतने की ज़रुरत है। हल्का व पौष्टिक भोजन लेना चाहिये। जंक फ़ूड को तो पूरी तरह नज़रअंदाज़ करना चाहिए। इसप्रकार से धरती के इस बढ़ते तापमान का हम किसी हद तक मुक़ाबला कर सकते हैं।
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