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2026 में विनाशकारी सुपर अल नीनो ले सकता है आकार: वैज्ञानिक

नई दिल्ली । समुद्र की सतह का तापमान तेजी से बढ़ रहा है, जो अल नीनो के विकसित होने का मुख्य संकेत है। यदि मौजूदा रुझान जारी रहा, तो 2026 में एक सुपर अल नीनो आकार ले सकता है, और जलवायु परिवर्तन के साथ मिलकर यह घटना 2027 तक वैश्विक तापमान को नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा सकती है। प्रशांत महासागर पर शोध कर रहे वैज्ञानिकों का कहना है कि आज से लगभग डेढ़ सौ साल पहले के उस अल नीनो ने दुनिया के बड़े हिस्से में भीषण गर्मी, लंबा सूखा और अकाल पैदा किया था, जिसमें तत्कालीन वैश्विक आबादी के लगभग 4 प्रतिशत हिस्से की मृत्यु हो गई थी। वैज्ञानिकों को चिंता है कि क्या 2026 में इतिहास खुद को दोहराएगा। अल नीनो तब होता है जब मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। इसका असर यह होता है कि यह हवा के प्रवाह को बदल देता है, जिससे मानसून कमजोर पड़ता है और दुनिया भर में बारिश का संतुलन बिगड़ जाता है। भारत, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका और अमेजन बेसिन जैसे क्षेत्रों में सूखे और भीषण गर्मी का सामना करना पड़ता है, जबकि अमेरिका के कुछ हिस्सों में भारी बारिश और बाढ़ आ जाती है।

 भारत के लिए यह खबर विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि देश की कृषि, जल संसाधन और पूरी अर्थव्यवस्था मानसून पर ही टिकी है। 2026 में उत्तर, मध्य और पूर्वी भारत में लंबे समय तक लू चलने और मानसून में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है। इससे कृषि पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा, फसलों की पैदावार घट सकती है, जिससे खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ेंगी और आम आदमी पर महंगाई का बोझ पड़ेगा। बारिश की कमी से जलाशयों और भूजल स्तर में भारी गिरावट आ सकती है, जिससे जल संकट पैदा होगा। जलवायु परिवर्तन पहले ही तापमान बढ़ा रहा है, ऐसे में अल नीनो का प्रभाव आग में घी डालने का काम करेगा। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के शुरुआती संकेतों के अनुसार, मानसून लंबी अवधि के औसत का लगभग 92 प्रतिशत रह सकता है, और प्रशांत महासागर में खारेपन के बदलते स्तर इस खतरे को 20 प्रतिशत तक और बढ़ा सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि हालांकि अभी इसे मेगा अल नीनो का नाम देना जल्दबाजी होगी, लेकिन संकेत इतने मजबूत हैं कि तैयारी अभी से शुरू करनी होगी। बेहतर जल प्रबंधन, मजबूत हीट एक्शन प्लान और किसानों के लिए सहायता प्रणाली ही इस संभावित आपदा से निपटने का एकमात्र रास्ता है। 1877-78 का सबक साफ है, जब समुद्र का तापमान नाटकीय रूप से बदलता है, तो उसके परिणाम पूरी दुनिया को भुगतने पड़ते हैं। यह घटना भीषण गर्मी, सूखे और फसलों की बर्बादी को जन्म देती है, जिससे बड़े पैमाने पर अकाल की स्थिति बनती है। 

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