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आधुनिक और प्राचीन शिक्षा पद्धति का संगम है बिहार का ये गुरुकुल

पटना । आधुनिकता के दौर में बिहार राज्य में एक ऐसा गुरुकुल है जो आज भी भारतीय संस्कृति और परंपरा को जीवंत बनाए हुए है। यहां पढने वाले बच्चों की सुबह मंत्रोच्चार और पूजा-अर्चना से शुरू होती है।  बिहार के भोजपुर जिले के चरपोखरी प्रखंड स्थित सोनवर्षा गांव का श्री तोताद्रु मठ लक्ष्मी नारायण मंदिर आज भी प्राचीन गुरुकुल परंपरा को सहेजकर नई पीढ़ी को संस्कार और शिक्षा दोनों प्रदान कर रहा है। इस मठ में पिछले 50 वर्षों से गुरुकुल पद्धति के तहत बच्चों को शिक्षा दी जा रही है। समय के साथ जहां आधुनिक शिक्षा व्यवस्था तेजी से बदली है, वहीं यह गुरुकुल आज भी भारतीय संस्कृति की जड़ों को मजबूत करने में जुटा हुआ है। यहां 6 से 15 वर्ष तक के बच्चे रहकर शिक्षा प्राप्त करते हैं और उनका पूरा जीवन अनुशासन, संस्कार और अध्ययन के इर्द-गिर्द घूमता है। गुरुकुल में बच्चों का दिन सुबह 4 बजे शुरू हो जाता है। स्नान और पूजा-पाठ के बाद मंदिर में आरती और मंत्रोच्चार किया जाता है। इसके बाद संस्कृत, वेद और शास्त्रों की शिक्षा दी जाती है। 

खास बात यह है कि यहां केवल धार्मिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि आधुनिक विषयों को भी बराबर महत्व दिया जाता है। बच्चों को गणित, अंग्रेजी और अन्य जरूरी विषय भी पढ़ाए जाते हैं, ताकि वे आधुनिक प्रतिस्पर्धा में भी पीछे न रहें। इस तरह यहां प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति और आधुनिक शिक्षा का अनोखा संगम देखने को मिलता है। यहां पढ़ने वाले बच्चों की दिनचर्या बेहद अनुशासित होती है। सुबह की साधना और पढ़ाई के बाद शाम को खेलकूद का समय दिया जाता है। रात में पारायण और लेखन कार्य कराया जाता है। पूरा दिन नियम और अनुशासन के तहत बीतता है और रात 9रू30 बजे तक सभी गतिविधियां समाप्त हो जाती हैं। गुरुकुल में रहकर बच्चे केवल पढ़ाई ही नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला, अनुशासन और संस्कार भी सीखते हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड सहित कई राज्यों से आए करीब 50 से 60 बच्चे यहां रहकर शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। अब तक सैकड़ों छात्र इस गुरुकुल से शिक्षा हासिल कर चुके हैं और कई छात्र विभिन्न क्षेत्रों में नौकरी भी कर रहे हैं। 

हाल ही में यहां के तीन शिष्य शिक्षक बने हैं, जो इस बात का उदाहरण है कि गुरुकुल परंपरा केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि भविष्य निर्माण का माध्यम भी बन सकती है। मठ के महाराज स्वामी रंगनाथ आचार्य का कहना है कि भारत दोबारा विश्व गुरु बनने की क्षमता रखता है, लेकिन इसके लिए देश को अपनी जड़ों और पारंपरिक शिक्षा पद्धति की ओर लौटना होगा। उनके अनुसार गुरुकुल बच्चों को ज्ञान के साथ संस्कार भी देता है, जो आधुनिक जीवन में बेहद जरूरी हैं। मठ का संचालन ग्रामीणों और समाज के सहयोग से किया जा रहा है और सीमित संसाधनों के बावजूद यहां बच्चों को बेहतर भविष्य देने का प्रयास लगातार जारी है। तेजी से बदलती दुनिया के बीच आरा का यह गुरुकुल यह संदेश देता है कि आधुनिकता के साथ अपनी परंपरा और संस्कृति को बचाकर रखना भी उतना ही जरूरी है।

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