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हाल के वर्षों में न्यायपालिका की निष्पक्षता, भ्रष्टाचार और जवाबदेही को लेकर जितने गंभीर सवाल उठ रहे हैं। संसद में सरकार ने जो जानकारी दी है, उसमें हजारों शिकायतें सरकार के पास भ्रष्टाचार की पंहुची हैं। उनमें पूर्व दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा का मामला सबसे अधिक चिंताजनक है। उनके आवास से करोड़ों रुपये के जले हुए नोट मिले, सुप्रीम कोर्ट की समिति ने जांच की, उन्हें इस्तीफा देने की सलाह दी गई, लेकिन उन्होंने पहले इस्तीफा नहीं दिया। बाद में उनका तबादला इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया गया, जहां उन्हें कोई न्यायिक कार्य नहीं सौंपा गया। अब उन्होंने राष्ट्रपति को इस्तीफा भेज दिया है, किंतु उसके स्वीकार न होने तक वे अभी भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीशों की सूची में बने हुए हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने भारतीय न्यायपालिका की जवाबदेही और भ्रष्टाचार की व्यवस्था पर गहरे प्रश्न खड़े कर दिए हैं। हजारों शिकायतें प्राप्त होने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और सरकार ने जो चुप्पी साध रखी है। कोई कार्यवाही नहीं की यह चिंता का विषय है। सबसे बड़ा सवाल यह है, यदि किसी न्यायाधीश पर गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप हों। वह महाभियोग प्रक्रिया पूरी होने से पहले इस्तीफा दे दे, तो क्या उसके विरुद्ध आगे कोई प्रभावी कार्रवाई संभव नहीं होती है। संविधान के अनुसार उच्च न्यायालय और सर्वाेच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने का एकमात्र संवैधानिक तरीका संसद में महाभियोग ही है। यह प्रक्रिया इतनी जटिल और राजनीतिक सहमति पर आधारित है कि व्यवहार में शायद ही कभी पूरी हो पाती है। ऐसे में यदि कोई न्यायाधीश इस्तीफा दे देता है, तो महाभियोग स्वतः अप्रासंगिक हो जाता है। जब भ्रष्टाचार के आरोपों की शिकायत न्यायपालिका अथवा सरकार के पास जाती है। ऐसी स्थिति में आंतरिक जांच कराकर सरकार यदि राष्ट्रपति के माध्यम से उनकी सेवा समाप्त करके उनके ऊपर मुकदमा चला सकती है। सरकार नियुक्ति करती है। कदाचरण में उसके पास हटाने का अधिकार भी होता है।
यह तर्क भी सामने आ रहा है कि न्यायाधीशों को मिले संवैधानिक संरक्षण का उद्देश्य न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना था, न कि भ्रष्टाचार के आरोपों से सुरक्षा देना। न्यायाधीश संरक्षण कानूनों और संवैधानिक प्रावधानों के कारण सेवानिवृत्ति लाभ, पेंशन और पद की गरिमा पर तत्काल प्रभाव डालना कठिन है। यही सुरक्षा जवाबदेही न्याय व्यवस्था को निष्प्रभावी बना दे, तो जनता का न्यायपालिका पर विश्वास कम या खत्म होना स्वाभाविक है। यशवंत वर्मा के मामले में अभी तक किसी आपराधिक प्राथमिकी या विस्तृत आपराधिक जांच की स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई। यदि किसी सामान्य सरकारी अधिकारी के यहां इतनी मात्रा में संदिग्ध नकदी मिलती, तो प्रवर्तन एजेंसियां तुरंत सक्रिय हो जातीं। न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखने के नाम पर यदि जांच प्रक्रिया ही ना हो, तो इससे “कानून सबके लिए समान है” का संवैधानिक सिद्धांत कमजोर पड़ जाता है।
यह सही है, किसी भी न्यायाधीश को केवल आरोपों के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। न्यायिक स्वतंत्रता लोकतंत्र की मूल शर्त है। लेकिन स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन भी आवश्यक है। अब समय आ गया है कि संसद और न्यायपालिका मिलकर ऐसी व्यवस्था विकसित करें, जिसमें गंभीर भ्रष्टाचार के मामलों में न्यायाधीशों की स्वतंत्र, पारदर्शी और समयबद्ध जांच हो, चाहे वे पद पर हों, इस्तीफा दे चुके हों या सेवानिवृत्त हो गए हों। ट्रायल कोर्ट के जजों पर हाईकोर्ट एवं राज्य सरकार मिलकर कार्यवाही करती हैं। यशवंत वर्मा प्रकरण केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं है; पिछले कुछ वर्षों में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार बढ़ा है। यह समय भारतीय न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता की अग्नि परीक्षा का है। वर्तमान में जिस तरह के आरोप हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों पर लग रहे हैं। जिस तरह से निर्णयों को लेकर राजनैतिक दलों द्वारा खुलकर आरोप-प्रत्यारोप लगाये जा रहे हैं। भ्रष्टाचार एवं सरकार के दवाब में फैसले के आरोप लग रहे हैं। जज सेवा से स्तीफा देकर अथवा सेवा निवृत होने के तुरन्त बाद राजनीति में सक्रिय हो रहे हैं। विचारधारा के अनुसार जजों की नियुक्ति के आरोप लग रहे हों। ऐसी स्थिति में हाईकोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए जो प्रोटेक्शन एक्ट है, उसमें संशोधन किया जाना जरुरी है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो न्यायपालिका का अस्तित्व संकट में पड़ना तय है। हाल ही में केजरीवाल, सीबीआई और हाईकोर्ट की जज स्वर्णकांता के मामले में जो हो रहा है। न्यायपालिका में नैतिकता और मर्यादा का पालन नहीं होना चिंता का विषय है।
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