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ग्रीन एनर्जी उत्पादन के क्षेत्र में भारत ने की उल्लेखनीय प्रगति

नई दिल्ली। भारत बड़े पैमाने पर कच्चे तेल और गैस के आयात पर निर्भर हैं, उनके लिए पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर बनी अनिश्चितता आर्थिक और रणनीतिक दोनों स्तर पर चुनौती बनती जा रही है। इस समस्या से निपटने भारत तेजी से ऐसे विकल्प तैयार कर रहा है, जो भविष्य में तेल संकट और वैश्विक ऊर्जा झटकों से देश को काफी हद तक सुरक्षित कर सकते हैं। इसका सबसे बड़ा आधार रिन्यूएबल एनर्जी यानी सौर और पवन ऊर्जा को माना जा रहा है। 

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में ग्रीन एनर्जी उत्पादन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। रिपोर्टों के अनुसार, बीते पांच वर्षों में देश ने करीब 178.88 गीगावॉट रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता जोड़ी है। अब भारत की कुल स्थापित बिजली क्षमता में स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी 51.5 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक इसमें करीब 100 गीगावॉट और जुड़ सकता है। इसका मतलब यह है कि भारत तेजी से सूरज और हवा से बिजली उत्पादन बढ़ा रहा है, जिससे आने वाले समय में आयातित ईंधन पर निर्भरता कम की जा सकती है। दरअसल, होर्मुज जैसे संकट का सीधा असर तेल और गैस की कीमतों पर पड़ता है। यदि युद्ध या तनाव बढ़ता है और सप्लाई बाधित होती है, तो भारत को महंगा तेल खरीदना पड़ता है। इससे महंगाई बढ़ती है, रुपये पर दबाव आता है और पेट्रोल-डीजल के साथ रसोई गैस की कीमतों में भी बढ़ोतरी करनी पड़ती है। 

ऐसे समय में घरेलू स्तर पर तैयार होने वाली ग्रीन बिजली भारत के लिए ऊर्जा आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार बन सकती है। हालांकि अब सबसे बड़ी चुनौती बिजली उत्पादन नहीं बल्कि उसके स्टोरेज की है। सौर ऊर्जा दिन में बनती है जबकि पवन ऊर्जा मौसम पर निर्भर रहती है। लेकिन बिजली की मांग हर समय बनी रहती है। यदि अतिरिक्त बिजली को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की व्यवस्था नहीं होगी, तो बड़ी मात्रा में उत्पादित ग्रीन पावर बेकार चली जाएगी। इसी जरूरत को देखते हुए लॉन्ग ड्यूरेशन एनर्जी स्टोरेज तकनीक पर जोर दिया जा रहा है। मौजूदा बैटरी स्टोरेज सिस्टम सामान्य तौर पर केवल एक से चार घंटे तक बिजली स्टोर कर पाते हैं, जबकि नई तकनीकें आठ घंटे या उससे अधिक समय तक ऊर्जा सुरक्षित रखने में सक्षम हैं। 

इनमें पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज, फ्लो बैटरियां, कंप्रेस्ड एयर एनर्जी स्टोरेज और हीट स्टोरेज जैसी तकनीकें शामिल हैं। केंद्र सरकार अब इंडिया बैटरी स्टोरेज विजन 2047 के तहत लंबी अवधि की बिजली स्टोरेज तकनीकों को बढ़ावा देने की तैयारी कर रही है। बिजली मंत्रालय और भारी उद्योग मंत्रालय इस दिशा में नई वित्तीय सहायता योजना पर काम कर रहे हैं। सरकार वायबिलिटी गैप फंडिंग और ब्याज राहत जैसे विकल्पों पर विचार कर रही है, ताकि निजी कंपनियां इस क्षेत्र में निवेश के लिए आगे आएं। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत ने बड़े पैमाने पर स्टोरेज क्षमता विकसित कर ली, तो भविष्य में तेल संकट, सप्लाई बाधाओं और वैश्विक ऊर्जा अस्थिरता का असर काफी कम किया जा सकेगा। 

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