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आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपईया

आजकल सुबह आंख खुलते ही सबसे पहला डर इसी बात का होता है कि आज कौन सी चीज महंगी हो गई। हर दिन की तरह आज भी पेट्रोल और डीजल के दाम फिर बढ़ गए हैं। आज पेट्रोल में करीब 2.61 रूपये और डीजल में 2.71 रूपये  प्रति लीटर की भारी बढ़ोतरी हुई है। पिछले दस दिनों में यह चौथी बार है जब जेब पर इस तरह का डाका डाला गया है। इस बढ़ोतरी के बाद दिल्ली में पेट्रोल 102.12 रूपये प्रति लीटर और डीजल 95.20 रूपये प्रति लीटर पर पहुंच गया है। वहीं मुंबई में तो पेट्रोल 111 रूपये के भी पार बिक रहा है। एक आम इंसान के लिए अब यह रोज का सिरदर्द बन चुका है। कमाई वही है, लेकिन खर्चे रॉकेट की रफ्तार से भाग रहे हैं। साल 2014 में जब देश में मोदी सरकार आई थी, तब हर तरफ एक ही चर्चा थी कि अब महंगाई के दिन खत्म होने वाले हैं। बहुत हुई महंगाई की मार वाला नारा तो सबको याद ही होगा। तब लोगों को लगा था कि चलो, अब कोई ऐसी सरकार आई है जो रसोई गैस, दाल, तेल और पेट्रोल-डीजल के दाम कम करके आम जनता को चौन की सांस देगी। लेकिन आज इतने साल बीतने के बाद जब हम अपनी जेब देखते हैं, तो लगता है कि राहत की उम्मीद करना ही बेकार था। राहत मिलना तो दूर, अब तो गुजारा करना भी भारी पड़ रहा है। तेल के दाम बढ़ने का मतलब सिर्फ गाड़ी में महंगा पेट्रोल डालना नहीं होता। डीजल महंगा होते ही ट्रक और गाड़ियों का किराया बढ़ जाता है। इसका सीधा असर हमारे घर के राशन और रसोई पर पड़ता है। जो सब्जियां, दाल, दूध और अनाज मंडियों से हमारे घर तक आते हैं, उन सब की कीमतें अचानक बढ़ जाती हैं। हाल ही में सरकार ने जो खुदरा महंगाई के आंकड़े जारी किए हैं, उसके मुताबिक देश की महंगाई दर 3.48ः पर है। लेकिन इसी सरकारी आंकड़े में खाने-पीने की चीजों की महंगाई 4.20ः से भी ऊपर चल रही है। सरकार भले ही टीवी और अखबारों में आंकड़ों का खेल दिखाकर यह कहे कि सब कुछ नियंत्रण में है, लेकिन बाजार जाकर जब जेब से पैसे ढीले होते हैं, तब असली हकीकत समझ आती है। जो सामान कुछ महीने पहले जितने में आता था, आज उतने पैसे में आधा सामान भी नहीं मिल रहा।

त्योहारों की खुशियाँ मनाने के बजाय अब लोग महीने का खर्च देखकर डरने लगे हैं।परेशानी सिर्फ खाने-पीने की चीजों तक ही रुकी हुई नहीं है। घर का गैस सिलेंडर आज हजार रुपये के पार पहुंच चुका है। इसके ऊपर से बच्चों की स्कूल फीस, बिजली का बिल और बीमारी के समय दवाइयों का खर्च अलग से कमर तोड़ देता है। सरकारी अस्पताल हो या प्राइवेट, हर जगह इलाज और दवाइयां आम आदमी के बजट से बाहर हो चुकी हैं। नौकरीपेशा लोगों की सैलरी सालों-साल उतनी ही रहती है, लेकिन बाजार की हर चीज महंगी होती जा रही है। महीने की दस या पंद्रह तारीख आते-आते मध्यमवर्गीय लोग पैसे गिनने लगते हैं कि बाकी का आधा महीना कैसे कटेगा।जब भी इस पर बात होती है, तो सरकार की तरफ से कह दिया जाता है कि दुनिया भर में मंदी है या कच्चे तेल के दाम बढ़ रहे हैं। ठीक है, दुनिया की बातें अपनी जगह हैं, लेकिन जनता यह भी तो देखती है कि जब बाहर कच्चे तेल के दाम कम होते हैं, तब हमारे यहाँ पेट्रोल-डीजल सस्ता क्यों नहीं होता? सरकार भारी-भरकम टैक्स और सेस लगाकर अपना खजाना भरने में लगी है और उसका पूरा बोझ सीधे उस जनता पर आ रहा है जो पहले से ही पाई-पाई के लिए परेशान है।

आखिर में सवाल यही घूम-फिर कर आता है कि क्या वे अच्छे दिन सिर्फ चुनाव जीतने के वादे थे? लोगों ने बड़ी उम्मीद से वोट दिया था कि उनकी जिंदगी थोड़ी आसान होगी। लेकिन आज सच यह है कि सुबह की चाय से लेकर रात की रोटी तक, हर चीज पर महंगाई का हथौड़ा चल रहा है। अब लोग बुनियादी जरूरतों में कटौती करने लगे हैं - कोई दूध कम ले रहा है, तो कोई बच्चों की ट्यूशन बंद करवा रहा है। सरकार को अब यह कागजी आंकड़े छोड़ देने चाहिए और जमीन पर आकर देखना चाहिए, क्योंकि जब तक आम आदमी की थाली सस्ती नहीं होगी, तब तक तरक्की की सारी बातें बेकार हैं।

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