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(05 मई विश्व अस्थमा दिवस)
शहर की भागती भीड़ में अगर आप किसी चौराहे पर खड़े होकर गौर करें, तो आपको हर पांचवें-छठे बच्चे के कंधे पर लटके स्कूल बैग के किनारे से एक प्लास्टिक का इनहेलर झांकता मिल जाएगा। यह आज की वह कड़वी हकीकत है जिसे हम विकास की चकाचौंध में अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। हमने आलीशान हाईवे और चमकते एक्सप्रेस-वे तो बना लिए, हाथ में 5जी मोबाइल भी थाम लिया, लेकिन उसी हाथ में हमारे बच्चों के लिए नेबुलाइजर की पाइपें भी थमा दीं। हम विकास की ऐसी दौड़ में शामिल हो गए हैं जहां बैंक बैलेंस तो बढ़ रहा है, लेकिन फेफड़ों की उम्र घट रही है।
आज विश्व अस्थमा दिवस पर जब दुनिया इलाज की पहुंच की बात कर रही है, तो हमें यह पूछना होगा कि क्या हम वाकई बीमारी का इलाज ढूंढ रहे हैं या उस जड़ को ही खाद-पानी दे रहे हैं जो इस बीमारी को पैदा कर रही है?अस्थमा अब केवल जेनेटिक या पुरानी बीमारी नहीं रह गई है। यह विशुद्ध रूप से एक इकोलॉजिकल क्राइम यानी पर्यावरण के खिलाफ किए गए अपराध का नतीजा है। भारत की हवा में जो जहर घुल चुका है, वह सीधे हमारे फेफड़ों को नुकसान पहुंचा रहा है। प्रदूषण की बात चलते ही हमारी सुई अक्सर गाड़ियों के धुएं पर टिक जाती है, लेकिन हम उस मौसमी कहर को कैसे भूल सकते हैं जो उत्तर भारत के एक बड़े हिस्से का दम घोंट देता है? खेतों में जलती पराली ने अस्थमा के संकट को एक भयावह मोड़ दे दिया है। जब किसान भाई मजबूरन खेतों में आग लगाते हैं, तो वह काला धुआं सरहदों को नहीं पहचानता। वह धुआं स्मॉग बनकर हमारे घरों के ड्राइंग रूम तक घुस आता है, और तब सांस के मरीजों के लिए हर एक पल मौत से लड़ने जैसा होता है। विडंबना देखिए कि जिस मिट्टी से हमें अन्न मिलता है, उसी मिट्टी के ऊपर जलती आग हमारे मासूमों के फेफड़ों को झुलसा रही है। अगर आंकड़े देखें तो भारत में करीब 3 करोड़ से ज्यादा लोग अस्थमा से जूझ रहे हैं। सबसे भयावह तथ्य यह है कि दुनिया भर में अस्थमा से होने वाली मौतों में लगभग 46 प्रतिशत मौतें अकेले भारत में होती हैं। भारत में अस्थमा मरीजों की तादाद उतनी बड़ी समस्या नहीं है, जितनी कि उनसे होने वाली मौतों का आंकड़ा, जो दुनिया में सबसे ज्यादा है।
यह आंकड़ा डराने वाला कम और शर्मिंदा करने वाला ज्यादा है। यह बताता है कि हमारे यहां या तो बीमारी की पहचान बहुत देर से होती है, या फिर इलाज इतना महंगा और जटिल है कि आम आदमी की पहुंच से बाहर है। अस्थमा के साथ सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि इसके साथ एक सामाजिक कलंक जुड़ा है। आज भी कई माता-पिता यह स्वीकार करने को तैयार नहीं होते कि उनके बच्चे को दमा है। उन्हें लगता है कि इनहेलर की लत लग जाएगी। जबकि मेडिकल साइंस कहता है कि इनहेलर ही सबसे सटीक इलाज है क्योंकि यह सीधे प्रभावित नली पर काम करता है। दवाइयों की गोलियां पूरे शरीर में घूमकर असर करती हैं, जबकि इनहेलर सीधे फेफड़ों पर निशाना साधता है। समाज की इसी नासमझी और इलाज के डर ने इस बीमारी को घर-घर में घातक बना दिया है। प्रदूषण की मार केवल बाहर ही नहीं है, हमारे घरों के भीतर भी है। अगरबत्ती का धुआं, बंद कमरों की नमी और रसोई से निकलता धुआं ये सब अस्थमा के मरीजों के लिए साइलेंट किलर का काम करते हैं। इसके ऊपर से बढ़ती गर्मी और हीटवेव ने इस संकट को दोगुना कर दिया है। जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, हवा में ओजोन का स्तर और धूल के कण बढ़ते हैं, जो सांस की नलियों में सूजन पैदा कर देते हैं। अब समय केवल जागरूकता का नहीं, बल्कि जवाबदेही का है।
सरकार को पराली प्रबंधन के ऐसे विकल्प देने होंगे जो किसान की जेब पर भारी न पड़ें, और सड़कों की धूल के लिए सख्त नियम बनाने होंगे। लेकिन क्या सिर्फ कानून काफी हैं? नागरिक के तौर पर हमें सोचना होगा कि हम सिर्फ एसी चलाकर गर्मी से तो बच रहे हैं, पर बाहर की हवा को और जहरीला नहीं बना रहे? क्या हम कूड़ा जलाने या बेवजह गाड़ियां दौड़ाने से पहले अपनी अगली पीढ़ी के फेफड़ों का ख्याल कर रहे हैं? हमें समझना होगा कि अस्थमा का इलाज सिर्फ महंगी दवाओं में नहीं है, बल्कि उस हवा में है जिसे हम और आप साझा करते हैं। यदि आज हमने अपनी जीवनशैली और पर्यावरण को लेकर सख्त कदम नहीं उठाए, तो आने वाली नस्लें हमें माफ नहीं करेंगी। दवाएं तो शायद मिल जाएं, लेकिन कुदरती और खुली सांसों का कोई विकल्प नहीं है। आखिर हमारी तरक्की का क्या मतलब, अगर वह हमें खुली हवा में सुकून से सांस लेने के लायक भी न छोड़े?
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