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बंगाल की प्रचंड जीत समूचे देश में भगवा क्रांति का आगाज

पांच राज्यों के ये रुझान स्पष्ट संदेश दे रहे हैं कि जनता अब केवल विरासत या भावनात्मक नारों पर नहीं, बल्कि जवाबदेही और नए विकल्पों पर मुहर लगा रही है

करीब 880 साल बाद बंगाल में भगवा लहराया है आजादी से पहले और आजादी के बाद भी जिस तरह के जख्म बंगाल की छाती पर दिए गए 2026 का विधानसभा चुनाव परिणाम घुसपैठ हिंसा महिला असुरक्षा अराजकता और दबंगई के बीच मुसलिम तुष्टिकरण से पैदा बंगाली अस्मिता पर खतरे और डैमोग्राफी परिवर्तन के खिलाफ आमजन का प्रतिवाद है एक अंगड़ाई है जो सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं है अपने अस्तित्व स्वरूप और संस्कृति को बचाने की मुहिम है । भाजपा ने राजनीतिक रणनीति के तहत लम्बे अर्से से बंगाल में पनपे हिन्दू दमन और मुसलिम तुष्टिकरण की राजनीति के परिप्रेक्ष्य में ऐसी व्यूह रचना की जिसको तोड़ने में ममता बनर्जी नाकाम हो गईं। वर्ष 2026 के विधानसभा चुनावों के नतीजों ने भारतीय राजनीति के फलक पर एक ऐसी इबारत लिख दी है, जिसकी गूंज दशकों तक सुनाई देगी। इन परिणामों ने न केवल सत्ता के समीकरण बदले हैं, बल्कि क्षेत्रीय क्षत्रपों के अजेय होने के मिथक को भी धराशायी कर दिया है। पांच राज्यों के ये रुझान स्पष्ट संदेश दे रहे हैं कि जनता अब केवल विरासत या भावनात्मक नारों पर नहीं, बल्कि जवाबदेही और नए विकल्पों पर मुहर लगा रही है। पश्चिम बंगाल इस चुनाव की सबसे बड़ी सुर्खी रहा है। ममता बनर्जी के 15 साल पुराने अजेय दुर्ग का ढहना भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लहर और भ्रष्टाचार व महिला सुरक्षा व सम्मान कानून-व्यवस्था जैसे बुनियादी मुद्दों ने तृणमूल कांग्रेस के आधार को हिला कर रख दिया। संदेशखाली और आरजीकर रेप मर्डर जैसी घटनाओं ने जिस आक्रोश को जन्म दिया, उसने ममता राज के पतन की बुनियाद गढ़ दी अंततः भाजपा को जबरदस्त सीटों के साथ सत्ता के शीर्ष तक पहुंचा दिया। बंगाल का यह बदलाव बताता है कि मतदाता अब तुष्टीकरण और हिंसा की राजनीति से इतर विकास और सुशासन की नई राह तलाश रहा है। इसी तरह तमिलनाडु ने पूरे देश को चौंकाया है। दशकों से द्रमुक बनाम अन्नाद्रमुक के बीच झूलती द्रविड़ राजनीति को अभिनेता विजय की पार्टी (टीवीके) ने पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। 110 सीटों के करीब पहुंचकर विजय ने साबित कर दिया कि तमिलनाडु की जनता पुराने राजनीतिक घरानों से ऊब चुकी है और एक नए विजन वाले नेतृत्व की तलाश में है। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन का तीसरे नंबर पर खिसकना द्रविड़ राजनीति के एक बड़े अध्याय के ढलने का संकेत है। स्टालिन ने सनातन धर्म को लेकर जिस तरह की आपत्तिजनक टिप्पणी की उनसे पूरे देश का बड़ा जनमानस आहत हुआ अब स्वयं तमिलनाडु ने स्टालिन और उनकी पार्टी को किनारे पहुंचा दिया है। 

असम में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा का जादू एक बार फिर सिर चढ़कर बोला। भाजपा नीत एनडीए की प्रचंड बढ़त यह प्रमाणित करती है कि कड़क प्रशासन और विकास का असम मॉडल जनता को रास आ रहा है। वहीं पुडुचेरी में एन. रंगासामी और भाजपा की जुगलबंदी ने स्थिरता को प्राथमिकता देने वाले मतदाताओं का दिल जीत लिया है। केरल में सत्ता हर पांच साल में बदलती रही है लेकिन पिनाराई विजयन दस साल शासन में रहे। लेकिन अब वामपंथी मोर्चे की विदाई हो गई है और कांग्रेस नीत यूडीएफ की 95 से अधिक सीटों पर बढ़त यह दिखाता है कि केरल का मतदाता एंटी-इंकंबेंसी को लेकर बेहद सजग है। कांग्रेस के लिए यह जीत संजीवनी की तरह है, जो उसे राष्ट्रीय स्तर पर फिर से खड़ा होने का हौसला देगी।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को दोहरा झटका लगा है. एक तरफ बीजेपी ने बंगाल में प्रचंड जीत हासिल की है. दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के शुभेंदु अधिकारी ने ममता को भवानीपुर सीट से हरा दिया है. इस जीत के बाद शुभेंदु ने ममता बनर्जी पर जमकर निशाना साधा. शुभेंदु अधिकारी ने भवानीपुर सीट से ममता को 15,114 वोटों से हरा दिया. शुभेंदु ने लगातार दूसरी बार ममता को हराया है. इससे पहले 2021 के विधानसभा चुनाव में भी उन्होंने नंदीग्राम सीट से उन्हें हराया था.

आपको बता दें अंग यानी बिहार और कलिंग यानी ओडिशा का मोर्चा तो बीजेपी ने पहले ही फतह कर लिया था. अब बंगाल में चुनावी जीत के साथ ही अंग, बंग और कलिंग पर काबिज होने का भारतीय जनता पार्टी का सपना पूरा हो गया है.

करीब दस साल की कोशिश के बाद पहली बार बंगाल में बीजेपी की जीत की आखिर क्या वजह रही? राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इसमें एसआईआर के दौरान भारी तादाद में कटे नामों की अहम भूमिका रही. इसके अलावा धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण, बीजेपी के आक्रामक प्रचार, आर.जी. कर कांड के बहाने महिला सुरक्षा के सवाल, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार ने भी बदलाव की राह तैयार की. 

पं बंगाल के विधानसभा चुनाव में मुकाबला बदला बनाम बदलाव था. बीजेपी ने जहां बदलाव का नारा देते हुए अपने पारंपरिक जय श्री राम की जगह जय मां काली के नारे को अपनाया था, वहीं ममता बनर्जी ने लोगों से केंद्र, बीजेपी और चुनाव आयोग के कथित सौतेले रवैए के खिलाफ बदला लेने के लिए वोट डालने की अपील की थी.

पश्चिम बंगाल में इस बार विधानसभा चुनाव में कई चीजें पहली बार हुई थीं और इसका नतीजा भी पहली बार बीजेपी की जीत के तौर पर सामने आया है. बीते पच्चीस वर्षों में पहली बार कोई चुनाव दो चरणों में कराया गया है. इससे पहले छह से आठ चरणों में मतदान कराया जाता रहा है. इसके अलावा भारी तादाद में तैनात केंद्रीय बल, और एसआईआर के दौरान कटे करीब 91 लाख नामों में राजनीतिक दलों के समीकरण गड़बड़ा दिए हैं. बंगाल में बीते कई दशकों में पहली बार चुनावी हिंसा न के बराबर हुई है. इससे पहले, यहां पर चुनाव से पहले और बाद में भारी हिंसा होती रही है. इस बार राज्य में पहली बार रिकार्डतोड़ वोट पड़े थे. उसके बाद से ही सत्ता के दावेदार अपने-अपने तरीके से इसकी व्याख्या करने में जुटे थे. इस बार चुनाव से पहले मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण यानी एसआईआर सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा है. यह कहना ज्यादा सही होगा कि एसआईआर के मुद्दे ने अबकी तमाम पारंपरिक मुद्दों को पीछे छोड़ दिया. चुनावी नतीजों से साफ है कि बीजेपी को ममता बनर्जी के मुस्लिम और महिला वोट बैंक में भी सेंध लगाई है. पार्टी को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करने में कामयाबी मिली. इसी के कारण हिंदू तबके के वोटरों ने एकजुट होकर बीजेपी के पक्ष में मतदान किया.

दरअसल इस चुनौतीपूर्ण बदलाव को लाने के लिए भाजपा ने साम दाम दंड भेद सबका इस्तेमाल किया। आपको बता दें पश्चिम बंगाल में जनवरी 2026 में प्रवर्तन निदेशालय  ने आई-पैक के कोलकाता (सॉल्ट लेक) स्थित दफ्तर पर छापा मारा था। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस कार्यवाही के दौरान खुद मौके पर पहुंच गई थीं और उन्होंने इसे टीएमसी  की चुनावी रणनीतियों से जुड़े दस्तावेज और डेटा ले जाने की कोशिश बताया था। आई-पैक , जो टीएमसी की राजनीतिक रणनीति तैयार करती है। ईडी कोयला घोटाला  और हवाला मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आई-पैक के डायरेक्टर प्रतीक जैन और अन्य के ठिकानों पर तलाशी ले रही थी। सीएम ने छापे को राजनीतिक प्रतिशोध और चुनाव से पहले टीएमसी का डेटा चुराने का प्रयास बताया। दरअसल इडी की इस कार्रवाई ने ममता बनर्जी और टीएमसी की चूलें हिलाने का काम किया यही से ममता राज के खात्मे की पटकथा को जमीन मिली एसआइआर के जरिए फर्जी वोटर हटाए गए ममता तिलमिलाती रहीं लेकिन भारत की राजनीति के मौजूदा चाणक्य अमित शाह ने बंगाल के वोटर पर दशकों से हावी हिंसा और भय के माहौल में सुरक्षा और खास कर चुनाव बाद भी केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती बनाए रखने का भरोसा देकर दशको से भयभीत वोटर को स्वतंत्र निर्भय मतदान करने का हौसला दिया और इस सबसे बंगाल में कमल खिलाने का सपना साकार हो गया। अब गंगोत्री से गंगासागर तक भगवा विस्तार हो चुका है यह आने वाले समय में समूचे देश में भगवा क्रांति का आगाज है इन चुनावों के परिणाम 2027 के यूपी चुनाव का भी आधार बनेगा। बस अब जरूरत इस बात की है कि भगवा सरकारें आमजन के उत्थान और रोजगार के लिए दिनरात एक कर विश्वास की कसौटी पर परिणाम दें। 

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