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भगत सिंह को फाँसी क्यों दी गई थी?

भगत सिंह का नाम लेते ही भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम का वह पृष्ठ हमारे सामने खुल जाता है, जिस पर एक साथ युवावस्था की उजली चमक, विद्रोह की आग, विचार की गहराई, कारावास का अँधेरा और मृत्यु की अंतिम छाया अंकित दिखाई देती है। केवल 23 वर्ष की आयु में फाँसी के फंदे तक पहुँच जाने वाला यह युवक अपने पीछे केवल एक शहादत नहीं छोड़ गया; वह अपने पीछे ऐसे प्रश्न छोड़ गया, जिनसे इतिहास आज भी आँख मिलाता है। वह कौन था? केवल एक क्रांतिकारी? केवल एक अभियुक्त? केवल एक ऐसे हत्याकांड में दोषी ठहराया गया युवक, जिसे औपनिवेशिक शासन ने अपने विरुद्ध युद्ध की कड़ी माना? या वह उस बेचैन पीढ़ी की आवाज था, जिसके भीतर गुलामी के विरुद्ध आक्रोश, स्वतंत्रता की आकांक्षा और एक नए समाज की कल्पना एक साथ आकार ले रही थी? इन प्रश्नों का उत्तर केवल उसकी फाँसी की तारीख जान लेने से नहीं मिलता; उसके लिए उस पूरे जीवन और उस पूरी न्यायिक यात्रा को देखना पड़ता है, जो अंततः लाहौर की जेल की उस कोठरी तक पहुँची जहाँ राज्य ने उसके जीवन का अंतिम निर्णय लागू किया।  

भगत सिंह का जीवन बहुत छोटा था, लेकिन उस छोटे-से जीवन में घटनाओं और विचारों की असाधारण घनता थी। जलियाँवाला बाग की त्रासदी ने किशोर भगत सिंह के मन पर गहरी छाप छोड़ी। लाहौर के राष्ट्रीय महाविद्यालय में अध्ययन के दौरान उनका बौद्धिक संसार विस्तृत हुआ। वे केवल क्रांतिकारी साहित्य नहीं पढ़ते थे; इतिहास, राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था और दर्शन उनके चिंतन के विषय थे। नौजवान भारत सभा से लेकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन तक उनकी यात्रा केवल संगठन बदलने की यात्रा नहीं थी, बल्कि उस राजनीतिक चेतना के क्रमशः विकसित होने की यात्रा थी, जिसमें स्वतंत्रता को केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि शोषण और असमानता से मुक्ति के व्यापक प्रश्न से जोड़कर देखा जा रहा था। वे लिखते थे, पढ़ते थे, बहस करते थे और अपने समय की राजनीतिक घटनाओं को एक बड़े ऐतिहासिक संदर्भ में समझने का प्रयत्न करते थे।1928 में साइमन कमीशन के विरोध में लाहौर में हुए प्रदर्शन के दौरान लाला लाजपत राय पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया। 17 नवंबर 1928 को उनकी मृत्यु हो गई। क्रांतिकारी युवकों ने इसके लिए पुलिस की कार्रवाई को जिम्मेदार माना और पुलिस अधीक्षक जेम्स ए. स्कॉट को लक्ष्य बनाने की योजना बनाई, किंतु 17 दिसंबर 1928 को पहचान की भूल से सहायक पुलिस अधीक्षक जॉन पी. सॉन्डर्स की हत्या हो गई। यह घटना भगत सिंह के जीवन में निर्णायक मोड़ बन गई। वे भूमिगत हुए, फिर भी उनका राजनीतिक संघर्ष रुका नहीं। इसके कुछ ही महीनों बाद 8 अप्रैल 1929 को केंद्रीय विधान सभा में बम फेंकने की घटना हुई। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने गिरफ्तारी से बचने का प्रयत्न नहीं किया। वे चाहते थे कि उनका कृत्य अदालत में पहुँचे और अदालत उनके लिए विचार व्यक्त करने का मंच बने। यही वह बिंदु है जहाँ से उनके जीवन की राजनीतिक कथा एक लंबी न्यायिक कथा में बदल जाती है।

लेकिन यहाँ इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण गाँठ खोलना आवश्यक है। भगत सिंह को फाँसी केंद्रीय विधान सभा में बम फेंकने के मामले में नहीं हुई थी। उस मामले में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को 12 जून 1929 को आजीवन कारावास की सजा मिली थी। मृत्युदंड का निर्णय बाद में लाहौर षड्यंत्र मामले में आया, जिसमें सॉन्डर्स की हत्या और उससे जुड़े व्यापक क्रांतिकारी षड्यंत्र को अभियोजन ने केंद्र में रखा। इसीलिए यदि हम भगत सिंह की फाँसी का इतिहास समझना चाहते हैं, तो हमें इन दोनों मुकदमों को अलग-अलग रखना होगा। एक में विधान सभा का बम कांड था और दूसरे में सॉन्डर्स की हत्या से जुड़ा लाहौर षड्यंत्र मामला। इन्हीं दोनों के बीच से होकर वह युवक उस मृत्यु-द्वार तक पहुँचा, जिसके दूसरी ओर इतिहास था। केंद्रीय विधान सभा के मुकदमे में उन्हें आजीवन कारावास मिला था।

केंद्रीय विधान सभा का बम कांड :

8 अप्रैल 1929 का दिन भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम के इतिहास में असाधारण महत्व रखता है। केंद्रीय विधान सभा में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने बम फेंके। विस्फोट हुआ, धुआँ फैला, सभा में अफरा-तफरी हुई और उसके बाद दोनों युवक वहीं खड़े रहे। उन्होंने भागने का रास्ता नहीं चुना। उनके पास पर्चे थे, उनके पास विचार थे और उनके सामने गिरफ्तारी थी। उन्होंने स्वयं को पुलिस के हवाले कर दिया। उनके अपने राजनीतिक उद्देश्य की व्याख्या यह थी कि वे ऐसी सत्ता तक अपनी आवाज पहुँचाना चाहते थे, जो उनकी दृष्टि में जनता की पुकार सुनने को तैयार नहीं थी। किंतु अदालत का प्रश्न राजनीतिक उद्देश्य से अलग था—क्या ऐसा विस्फोट कानून की दृष्टि में गंभीर आपराधिक कृत्य था, और क्या उसके लिए अभियुक्तों को दंडित किया जा सकता था?

मुकदमे में अभियोजन ने प्रत्यक्षदर्शी गवाह प्रस्तुत किए। सरदार शोभा सिंह ने गवाही दी कि उन्होंने भगत सिंह को बम फेंकते देखा था। अन्य गवाहों ने विस्फोट, धुआँ, उसके बाद हुई गतिविधियों और अभियुक्तों की गिरफ्तारी के संबंध में बयान दिए। बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता आसफ अली ने गवाहों से जिरह की और अभियोजन के साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाए। अदालत में पिस्तौल और अन्य वस्तुओं से जुड़े साक्ष्यों को लेकर भी प्रश्न उठे। इस मुकदमे की कार्यवाही केवल अपराध की घटना को दर्ज करने तक सीमित नहीं थी; उसमें यह भी सामने आया कि अभियुक्त अपने कृत्य को किस राजनीतिक अर्थ में देखते थे और बचाव पक्ष किस प्रकार अभियोजन के प्रत्यक्ष साक्ष्यों की परीक्षा कर रहा था। न्यायालय ने अंततः उपलब्ध साक्ष्यों को पर्याप्त माना।

12 जून 1929 को दिल्ली के जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को दोषी ठहराया और दोनों को आजीवन कारावास अर्थात आजीवन निर्वासन की सजा दी। इस मुकदमे का यही अंतिम परिणाम था। यहाँ कोई मृत्युदंड नहीं था। यही वह तथ्य है जिसे बाद की लोकप्रिय स्मृति में कई बार दूसरे मुकदमे के साथ मिला दिया जाता है। विधान सभा बम कांड ने भगत सिंह को पूरे देश में एक पहचाना हुआ नाम बना दिया, लेकिन उनकी फाँसी का कानूनी आधार यह मुकदमा नहीं था। उसी समय पुलिस की जाँच सॉन्डर्स की हत्या और क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े दूसरे मामले की ओर बढ़ रही थी, जहाँ परिस्थितियाँ कहीं अधिक गंभीर थीं।

लाहौर षड्यंत्र मामला :

सॉन्डर्स की हत्या के बाद पुलिस ने जिन घटनाओं, व्यक्तियों, हथियारों और गुप्त गतिविधियों को जोड़ना शुरू किया, उनसे ब्रिटिश सरकार ने एक व्यापक क्रांतिकारी षड्यंत्र का चित्र निर्मित किया। अभियोजन का कहना था कि सॉन्डर्स की हत्या कोई अकेली घटना नहीं थी, बल्कि ब्रिटिश शासन को सशस्त्र चुनौती देने वाली एक संगठित क्रांतिकारी योजना का हिस्सा थी। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े अनेक युवकों की गतिविधियाँ, बम बनाने की योजनाएँ, हथियारों का प्रबंध, गुप्त बैठकें और सॉन्डर्स हत्याकांड—इन सबको जोड़कर अभियोजन ने यह स्थापित करने का प्रयास किया कि घटनाओं के पीछे एक संगठित षड्यंत्र था।

अभियोजन के लिए सरकारी गवाहों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई। जय गोपाल, हंस राज वोहरा और फणीन्द्रनाथ घोष जैसे व्यक्तियों के बयान मुकदमे के महत्वपूर्ण हिस्से बने। दूसरी ओर बचाव पक्ष के सामने यह प्रश्न था कि क्या ऐसे गवाहों के कथनों को बिना पर्याप्त सावधानी के स्वीकार किया जा सकता है। उनके अपने संबंध, परिस्थितियाँ, पूर्व कथन और अभियोजन के साथ उनके संबंध—इन सबकी जाँच आवश्यक थी। मुकदमा इस प्रकार केवल सॉन्डर्स की हत्या का मुकदमा नहीं रह गया था; वह एक पूरे क्रांतिकारी संगठन और उसके कथित षड्यंत्र को अदालत के सामने परखने का मुकदमा बन गया था।

इसी बीच जेल के भीतर एक दूसरा संघर्ष जन्म ले चुका था। भगत सिंह और उनके साथियों ने राजनीतिक बंदियों के साथ व्यवहार को लेकर भूख हड़ताल की। उनकी माँगों का केंद्र यह था कि राजनीतिक बंदियों के साथ सामान्य अपराधियों जैसा व्यवहार न किया जाए। भूख हड़ताल लंबी होती गई। जबरन भोजन कराने के प्रयास हुए। अनेक बंदियों की स्थिति बिगड़ती गई। 13 सितंबर 1929 को जतिंद्रनाथ दास की मृत्यु ने उस संघर्ष को पूरे देश के सामने ला खड़ा किया। जेल की दीवारों के भीतर चल रहा संघर्ष अब जनता की चेतना का हिस्सा बन गया था। स्वयं जवाहरलाल नेहरू ने 8 अगस्त 1929 को जेल जाकर भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त, जतिंद्रनाथ दास और अन्य भूख हड़ताल कर रहे बंदियों से मुलाकात की थी। नेहरू ने बाद में उनकी स्थिति का वर्णन करते हुए उनके संघर्ष को राजनीतिक बंदियों के अधिकारों से जोड़ा।यहीं से यह भी स्पष्ट होता है कि नेहरू और भगत सिंह के संबंध के बारे में प्रचलित कुछ बातें ऐतिहासिक प्रमाणों से मेल नहीं खातीं। नेहरू की भगत सिंह से जेल में मुलाकात हुई थी, किंतु वह 8 अगस्त 1929 की थी। मार्च 1931 में फाँसी से ठीक पहले नेहरू की भगत सिंह से जेल में मुलाकात हुई हो, ऐसा प्रमाण उपलब्ध नहीं है। 24 मार्च 1931 को नेहरू ने लिखा कि अंतिम दिनों में वे जानबूझकर मौन रहे थे, क्योंकि उन्हें भय था कि उनका कोई वक्तव्य मृत्युदंड को कम किए जाने की संभावना को नुकसान पहुँचा सकता है। अगले दिन देश ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को खो दिया था।

विशेष न्यायाधिकरण : न्याय की बदली हुई राह :

लाहौर षड्यंत्र मामले की सामान्य न्यायिक प्रक्रिया लंबी होती जा रही थी। इसी पृष्ठभूमि में 1 मई 1930 को वायसराय लॉर्ड इरविन ने एक विशेष अध्यादेश जारी किया और 3 न्यायाधीशों वाला विशेष न्यायाधिकरण बनाया। प्रारंभिक न्यायाधिकरण में न्यायमूर्ति जे. कोल्डस्ट्रीम अध्यक्ष थे तथा न्यायमूर्ति जी. सी. हिल्टन और न्यायमूर्ति आगा हैदर सदस्य थे। 5 मई 1930 को लाहौर में विशेष न्यायाधिकरण ने कार्यवाही आरंभ की।इस विशेष व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि मुकदमा सामान्य न्यायिक प्रक्रिया से अलग ढंग से चलाया जा सकता था। न्यायाधिकरण को कुछ परिस्थितियों में अभियुक्तों की अनुपस्थिति में भी कार्यवाही जारी रखने का अधिकार दिया गया था। सामान्य उच्च न्यायालय में अपील का मार्ग भी हटा दिया गया था और न्यायिक चुनौती का सीमित रास्ता प्रिवी काउंसिल तक रह गया था। बाद में इसी अध्यादेश की वैधानिकता को प्रिवी काउंसिल के सामने चुनौती दी गई, किंतु उसने यह कहते हुए चुनौती अस्वीकार कर दी कि आपातकालीन परिस्थितियों में अध्यादेश जारी करने का अधिकार वायसराय के पास था और उस निर्णय को उस रूप में न्यायिक चुनौती के अधीन नहीं माना जा सकता था।

यहाँ इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न जन्म लेता है। क्या किसी व्यक्ति के जीवन और मृत्यु का निर्णय सामान्य न्यायिक व्यवस्था से अलग बनाई गई ऐसी असाधारण व्यवस्था में होना चाहिए, जिसमें अपील का सामान्य अधिकार न हो? यह प्रश्न उस समय भी उठाया गया था और बाद की ऐतिहासिक व्याख्याओं में भी इस मुकदमे की प्रक्रिया को इसी दृष्टि से देखा गया। लेकिन तथ्य यह है कि उस समय की सर्वोच्च औपनिवेशिक न्यायिक व्यवस्था ने अध्यादेश को वैधानिक माना और विशेष न्यायाधिकरण की कार्यवाही को उसके आधार पर आगे बढ़ने दिया। इस प्रकार कानून की दृष्टि से मुकदमा आगे बढ़ता रहा, जबकि न्याय की प्रकृति को लेकर प्रश्न इतिहास में जीवित रहे।

सर शादीलाल : न्यायिक व्यवस्था की एक कड़ी :

इस पूरे प्रसंग में सर शादीलाल का नाम भी आता है। वे उस समय लाहौर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश थे और विशेष न्यायाधिकरण की न्यायिक संरचना से उनका संबंध था। यहाँ एक आवश्यक ऐतिहासिक भेद स्पष्ट होना चाहिए—सर शादीलाल और सरदार शोभा सिंह एक ही व्यक्ति नहीं थे। सरदार शोभा सिंह केंद्रीय विधान सभा बम मामले में अभियोजन के गवाह थे, जबकि सर शादीलाल उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश थे।

इतिहास में नामों की समान ध्वनि कभी-कभी घटनाओं की दिशा बदल देती है। इसलिए इस मुकदमे की कथा लिखते समय यह जानना आवश्यक है कि कौन गवाह था, कौन न्यायाधीश था, कौन अभियोजन की ओर से था और कौन बचाव की ओर से। न्याय केवल निर्णय की अंतिम पंक्ति में नहीं होता; वह उन सभी भूमिकाओं के बीच निर्मित होता है, जो किसी मुकदमे को उसके आरंभ से अंत तक आकार देती हैं।

बचाव पक्ष : कानून के भीतर संघर्ष :

भगत सिंह और उनके साथियों का न्यायालय से संबंध सरल नहीं था। वे औपनिवेशिक न्याय व्यवस्था को अपनी राजनीतिक लड़ाई का हिस्सा मानते थे, फिर भी जब कानूनी सहायता की आवश्यकता सामने आई तो उन्होंने उसे पूरी तरह अस्वीकार नहीं किया। 8 मई 1930 को कानूनी सहायता की आवश्यकता व्यक्त की गई। वे न्यायाधिकरण की वैधानिकता को चुनौती देना चाहते थे, साथ ही अपने पक्ष को कानूनी ढंग से प्रस्तुत करने की संभावना भी तलाश रहे थे। यह बात उस लोकप्रिय धारणा को सरल बनाती है जिसमें कभी-कभी यह मान लिया जाता है कि भगत सिंह ने अदालत में कानून की हर प्रक्रिया का पूर्ण बहिष्कार कर दिया था।वास्तव में उनकी रणनीति अधिक जटिल थी। वे जानते थे कि अदालत में चलने वाला मुकदमा केवल उनका व्यक्तिगत मुकदमा नहीं रहेगा। वहाँ उनके विचार भी दर्ज होंगे। उनका संघर्ष केवल यह सिद्ध करने का नहीं था कि वे निर्दोष हैं; वे अपने कृत्य के राजनीतिक अर्थ को भी जनता के सामने रखना चाहते थे। दूसरी ओर अभियोजन अपने पास उपलब्ध गवाहों, दस्तावेजों और परिस्थितिजन्य कड़ियों के आधार पर एक संगठित षड्यंत्र सिद्ध करना चाहता था। इस प्रकार अदालत के भीतर दो प्रकार की भाषाएँ आमने-सामने थीं—एक कानून की भाषा और दूसरी राजनीतिक प्रतिरोध की भाषा।

12 मई 1930 : न्यायालय के भीतर एक दरार :

12 मई 1930 को विशेष न्यायाधिकरण की कार्यवाही में ऐसा प्रसंग आया जिसने आगे की पूरी न्यायिक यात्रा को प्रभावित किया। अभियुक्तों को हथकड़ियों में अदालत में लाया गया। उन्होंने इसका विरोध किया। अदालत में नारे और गीत गूँजे. न्यायाधिकरण के अध्यक्ष न्यायमूर्ति कोल्डस्ट्रीम ने अभियुक्तों को नियंत्रित करने का आदेश दिया और पुलिस ने बल का प्रयोग किया। इस घटना के दौरान न्यायमूर्ति आगा हैदर ने उस कार्रवाई से अपनी असहमति स्पष्ट की और कार्यवाही पर अपना विरोध दर्ज किया।यह प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण है कि न्यायाधिकरण के भीतर भी इस घटना को लेकर पूर्ण एकमत नहीं था। आगा हैदर का रुख उस समय की कार्यवाही के भीतर एक अलग आवाज के रूप में सामने आया। बाद में न्यायाधिकरण का पुनर्गठन हुआ और वे नए न्यायाधिकरण में नहीं रहे। यह कहना कि आगा हैदर ने स्वयं इस्तीफा दे दिया था, सही नहीं है। उपलब्ध विवरण यह दर्शाते हैं कि प्रारंभिक न्यायाधिकरण के टूटने और पुनर्गठन की प्रक्रिया में उन्हें नए मंडल से अलग कर दिया गया।उस दिन की घटना केवल अदालत और अभियुक्तों के बीच हुआ एक क्षणिक टकराव नहीं थी। उसने यह प्रश्न गहरा कर दिया कि जिस अदालत में अभियुक्तों के जीवन का निर्णय होना है, वहाँ उनके साथ व्यवहार की सीमा क्या होनी चाहिए। कानून की मर्यादा केवल न्यायाधीश की कुर्सी से निर्धारित नहीं होती; वह अभियुक्त की गरिमा से भी जुड़ी होती है। और जब किसी मुकदमे में मृत्यु-दंड की संभावना सामने हो, तब अदालत के भीतर घटने वाली प्रत्येक घटना इतिहास की स्मृति में अधिक गहरी हो जाती है।

न्यायाधिकरण का पुनर्गठन :

प्रारंभिक न्यायाधिकरण के बाद उसका पुनर्गठन हुआ। न्यायमूर्ति जी. सी. हिल्टन अध्यक्ष बने और न्यायमूर्ति अब्दुल कादिर तथा न्यायमूर्ति जे. के. टैप सदस्य बने। यही न्यायाधिकरण आगे मुकदमे की कार्यवाही को अंतिम निर्णय तक लेकर गया। इस पुनर्गठन के बाद अभियुक्तों और न्यायाधिकरण के बीच संबंध और अधिक तनावपूर्ण हो गए और अभियुक्तों की भागीदारी अनेक अवसरों पर सीमित अथवा अनुपस्थित रही। अध्यादेश द्वारा दी गई शक्ति के कारण न्यायाधिकरण उनके बिना भी कार्यवाही आगे बढ़ा सकता था।

यहाँ अभियोजन और बचाव के बीच अंतर और स्पष्ट हो जाता है। अभियोजन के सामने लक्ष्य था—उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहियों से यह सिद्ध करना कि सॉन्डर्स की हत्या एक व्यापक षड्यंत्र का हिस्सा थी। बचाव के सामने चुनौती थी—सरकारी गवाहों के कथनों, परिस्थितिजन्य प्रमाणों और उस असाधारण न्यायिक प्रक्रिया को चुनौती देना जिसमें मुकदमा चल रहा था। लेकिन समय के साथ मुकदमा ऐसी अवस्था में पहुँच गया जहाँ अभियुक्तों की सक्रिय भागीदारी कम होती गई और न्यायाधिकरण ने अपनी वैधानिक शक्तियों के आधार पर कार्यवाही जारी रखी। इस प्रकार अदालत का कमरा केवल साक्ष्यों का स्थान नहीं रह गया; वह स्वयं उस राजनीतिक और न्यायिक संघर्ष का प्रतीक बन गया जिसमें दोनों पक्ष अपनी-अपनी दृष्टि से सत्य प्रस्तुत कर रहे थे।

7 अक्टूबर 1930 : मृत्यु का निर्णय :

7 अक्टूबर 1930 को विशेष न्यायाधिकरण ने अपना निर्णय सुनाया। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को मृत्युदंड दिया गया। अन्य अभियुक्तों को अलग-अलग सजाएँ मिलीं। इस प्रकार लाहौर षड्यंत्र मामले का वह चरण समाप्त हुआ, जिसकी परिणति 3 युवकों के लिए मृत्यु के निर्णय में हुई।अब फिर वही प्रश्न सामने आता है, भगत सिंह को फाँसी क्यों दी गई?

इसका उत्तर अब बिल्कुल स्पष्ट है। केंद्रीय विधान सभा बम कांड में उन्हें मृत्युदंड नहीं मिला था। उस मामले में उन्हें आजीवन कारावास की सजा हुई थी। फाँसी का निर्णय लाहौर षड्यंत्र मामले में आया, जिसमें सॉन्डर्स की हत्या और उससे जुड़े षड्यंत्र को अभियोजन ने केंद्र में रखा था। इस मुकदमे में हत्या और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध युद्ध से संबंधित भारतीय दंड विधान की धाराओं के आधार पर दोषसिद्धि की गई। इसीलिए भगत सिंह की फाँसी को केवल 8 अप्रैल 1929 के विधान सभा बम कांड का परिणाम कहना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा।

यह अंतर छोटा नहीं है। इसी अंतर में पूरे इतिहास का एक बड़ा सत्य छिपा है। जिस घटना ने भगत सिंह को देश के करोड़ों लोगों की चेतना में पहुँचा दिया, वह उनकी फाँसी का प्रत्यक्ष कानूनी आधार नहीं थी। उनकी फाँसी उस दूसरे मुकदमे से आई, जिसमें सॉन्डर्स की हत्या और क्रांतिकारी षड्यंत्र को न्यायिक रूप से परखा गया था।

प्रिवी काउंसिल,अंतिम न्यायिक द्वार :

मृत्युदंड सुनाए जाने के बाद भी अंतिम न्यायिक प्रयास किया गया। बचाव पक्ष ने प्रिवी काउंसिल के सामने विशेष न्यायाधिकरण की वैधानिकता को चुनौती दी। मुख्य प्रश्न यह था कि क्या वायसराय को आपातकालीन अध्यादेश के माध्यम से ऐसा विशेष न्यायाधिकरण बनाने का अधिकार था और क्या उस आधार पर चलाया गया मुकदमा वैधानिक माना जा सकता था।27 फरवरी 1931 को प्रिवी काउंसिल ने चुनौती अस्वीकार कर दी। उसके निर्णय का केंद्र यह था कि आपातकाल की स्थिति के बारे में निर्णय करने का अधिकार वायसराय के पास था और उस आधार पर जारी अध्यादेश को इस प्रकार न्यायिक चुनौती देकर निरस्त नहीं किया जा सकता। इस निर्णय के साथ मृत्युदंड के विरुद्ध न्यायिक रास्ता लगभग पूरी तरह बंद हो गया।

अब प्रश्न न्यायालय से हटकर शासन की दया-शक्ति के सामने खड़ा था।कानून ने अपना निर्णय दे दिया था।लेकिन मनुष्य की करुणा का प्रश्न अभी बाकी था।

मालवीय की मृत्यु को जीवन में बदलने की पुकार :

पंडित मदन मोहन मालवीय ने 14 फरवरी 1931 को वायसराय के निजी सचिव को तार भेजकर भगत सिंह और राजगुरु के मृत्युदंड को आजीवन निर्वासन में बदलने की अपील की। उनके अनुसार इन युवकों के कृत्य के पीछे व्यक्तिगत या स्वार्थपूर्ण उद्देश्य नहीं, बल्कि देशभक्ति की भावना थी। यह अपील उस समय की गई जब न्यायिक उपाय लगभग समाप्त हो चुके थे और मृत्युदंड को बदलने का प्रश्न कार्यपालिका के सामने था। मालवीय की अपील स्वीकार नहीं हुई। लेकिन इतिहास में कुछ प्रयास अपने परिणाम से नहीं, अपनी मानवीयता से याद रहते हैं। मृत्यु के सामने खड़े व्यक्ति के लिए जीवन की एक और संभावना माँगना भले वह संभावना अंततः स्वीकार न की जाए—मानव समाज की उस करुण परंपरा का हिस्सा है, जिसमें दंड के बीच भी क्षमा के लिए एक द्वार खुला रखा जाता है।

गांधी की अंतिम क्षणों की बेचैनी :

महात्मा गांधी और भगत सिंह के रास्ते एक नहीं थे। गांधी का विश्वास अहिंसा में था; भगत सिंह और उनके साथी औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति के रास्ते पर थे। साधनों को लेकर दोनों के बीच गहरा मतभेद था। फिर भी भगत सिंह की मृत्यु का प्रश्न केवल साधनों की बहस में सीमित नहीं रहा। वह एक मनुष्य के जीवन का प्रश्न बन गया।

गांधी ने वायसराय लॉर्ड इरविन के सामने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की सजा कम करने का प्रश्न उठाया। 23 मार्च 1931 को उन्होंने वायसराय को पुनर्विचार और सजा कम करने का आग्रह भी भेजा।गांधी-इरविन समझौते में भगत सिंह की सजा कम करना कोई औपचारिक शर्त नहीं थी। इसलिए यह कहना कि समझौते की शर्त के रूप में भगत सिंह की रिहाई सुनिश्चित की गई थी, ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा। लेकिन यह भी तथ्य है कि गांधी ने व्यक्तिगत रूप से उनकी सजा कम करने का प्रयास किया।यहाँ इतिहास को किसी एक सरल निर्णय में बाँध देना उचित नहीं होगा। यह कहना कि गांधी ने कुछ नहीं किया, उपलब्ध दस्तावेजों से मेल नहीं खाता। और यह कहना कि गांधी निश्चित रूप से भगत सिंह को बचा सकते थे, भी प्रमाणित तथ्य नहीं है। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि अंतिम समय में गांधी ने सजा कम करने का आग्रह किया, लेकिन वह आग्रह सफल नहीं हुआ।और शायद इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी यही थी—कई आवाजें उठीं, लेकिन मृत्यु का निर्णय नहीं बदला।

नेहरू : एक मुलाकात, एक मौन और एक असहाय पीड़ा :

जवाहरलाल नेहरू का प्रसंग भी इस कथा में विशेष सावधानी चाहता है। वे भगत सिंह से जेल में मिले थे। 8 अगस्त 1929 को वे केंद्रीय जेल और बोरस्टल जेल गए और भूख हड़ताल कर रहे भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त, जतिंद्रनाथ दास तथा अन्य बंदियों से मिले। उन्होंने उनके कष्ट को देखा और उनके संघर्ष को राजनीतिक बंदियों की स्थिति से जोड़ा। यह मुलाकात उस समय हुई जब भगत सिंह अभी जीवित थे और जेल के भीतर अपने साथियों के साथ एक लंबी भूख हड़ताल लड़ रहे थे।लेकिन मार्च 1931 के अंतिम दिनों में नेहरू की भगत सिंह से जेल में मुलाकात हुई थी—ऐसा प्रमाण उपलब्ध नहीं है। 24 मार्च 1931 को, अर्थात फाँसी के अगले दिन, नेहरू ने लिखा कि उन्होंने अंतिम दिनों में जानबूझकर मौन रखा था, क्योंकि उन्हें आशंका थी कि उनका कोई शब्द सजा कम होने की संभावना को नुकसान पहुँचा सकता है। अब सब समाप्त हो चुका था। उन्होंने लिखा कि भारत अपने उस प्रिय युवक को फाँसी से नहीं बचा सका, जिसका साहस और बलिदान भारत के युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुका था।यहाँ नेहरू का प्रसंग भी किसी राजनीतिक आरोप या प्रशंसा की तरह नहीं, बल्कि उस समय की ऐतिहासिक परिस्थिति के एक दस्तावेज की तरह सामने आता है। एक ओर मृत्यु-दंड का निर्णय था, दूसरी ओर उसे बदलने की अंतिम कोशिशें; एक ओर जेल की कोठरी में बैठा युवक था, दूसरी ओर बाहर खड़े वे लोग जो अपनी-अपनी सीमाओं के भीतर उसके जीवन की संभावना तलाश रहे थे।लेकिन समय बहुत कम बचा था।

23 मार्च 1931  वह अंतिम संध्या :

फिर 23 मार्च 1931 आया।लाहौर केंद्रीय कारागार की दीवारों के भीतर उस दिन इतिहास अपने सबसे कठोर रूप में उपस्थित था। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी दे दी गई। न्यायाधिकरण का निर्णय हो चुका था। न्यायिक चुनौती असफल हो चुकी थी। मालवीय की अपील स्वीकार नहीं हुई। गांधी के अंतिम प्रयास भी मृत्युदंड को नहीं बदल सके। बाहर देश बेचैन था और भीतर 3 युवक मृत्यु की ओर बढ़ रहे थे।23 वर्ष की आयु—इतनी-सी आयु में किसी मनुष्य ने कितना जीवन देखा होता है? कुछ प्रेम, कुछ सपने, कुछ असफलताएँ, कुछ सफलताएँ, कुछ यात्राएँ, कुछ घर-परिवार, कुछ साधारण इच्छाएँ—जीवन की सामान्य राह अभी खुलनी शुरू ही होती है। लेकिन भगत सिंह के सामने वह राह बंद हो चुकी थी। उनके सामने अब जीवन की लंबी सड़क नहीं, मृत्यु की छोटी-सी सीढ़ियाँ थीं।

और फिर भी उस क्षण उनकी स्मृति हमें भय से अधिक विचार की ओर ले जाती है।

एक युवक जिसे राज्य ने अपराधी कहा, वह अपनी अंतिम घड़ी में इतिहास के लिए प्रश्न बन गया।एक कैदी जिसे जेल की दीवारों ने घेरा था, वह जेल से निकलकर करोड़ों मनुष्यों की स्मृति में प्रवेश कर गया।

एक शरीर जिसे फंदे ने रोक दिया, उसकी आवाज समय के पार चली गई।

फाँसी के बाद : शरीर से बड़ी स्मृति

किसी मनुष्य की मृत्यु उसके जीवन का अंत होती है; लेकिन कुछ मृत्यु ऐसी होती हैं जिनका अर्थ उनके अंतिम क्षण के बाद बनना शुरू होता है। भगत सिंह की मृत्यु भी ऐसी ही थी। 23 मार्च 1931 की शाम एक शरीर समाप्त हुआ, लेकिन उसी क्षण एक स्मृति ने जन्म लिया—ऐसी स्मृति, जिसे बाद की पीढ़ियों ने अपने-अपने अर्थ दिए।

किसी ने उनमें निर्भीक क्रांतिकारी देखा, किसी ने समाजवादी विचारक, किसी ने औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध विद्रोही युवक, किसी ने शहीद, किसी ने अपने समय की राजनीतिक बेचैनी का प्रतिनिधि। उनके विचारों से हर व्यक्ति सहमत हो, यह आवश्यक नहीं; उनकी हिंसात्मक पद्धति को स्वीकार करना भी आवश्यक नहीं। लेकिन उनके जीवन को समझने के लिए उनके अध्ययन, उनके लेखन, उनके प्रश्नों और उनके राजनीतिक चिंतन को भी उतनी ही गंभीरता से देखना होगा जितनी गंभीरता से उनके मुकदमे और उनकी फाँसी को देखा जाता है।उनकी सबसे बड़ी विशेषता शायद यह थी कि उन्होंने अपने जीवन को केवल अपने लिए नहीं देखा। वे जानते थे कि उनका रास्ता मृत्यु की ओर जा सकता है। फिर भी वे पढ़ते रहे, लिखते रहे, बहस करते रहे और जेल में भी राजनीतिक बंदियों के अधिकारों की बात करते रहे। मृत्यु उनके सामने धीरे-धीरे निश्चित होती गई, लेकिन विचार करने की उनकी क्षमता समाप्त नहीं हुई।

यही कारण है कि भगत सिंह को केवल फाँसी के फंदे से समझना उनके साथ अन्याय होगा।

उन्हें उनकी किताबों से भी पढ़ना होगा।

उनके प्रश्नों से भी पढ़ना होगा।

उनकी जेल की भूख हड़ताल से भी पढ़ना होगा।उनकी अदालत की रणनीति से भी पढ़ना होगा।

उनके साथियों के प्रति उनकी निष्ठा से भी पढ़ना होगा।

और उस अंतिम क्षण से भी पढ़ना होगा, जब एक 23 वर्षीय युवक का जीवन राज्य के आदेश से समाप्त कर दिया गया।

इतिहास की अदालत

कानून ने अपना निर्णय दिया था।अभियोजन ने सॉन्डर्स की हत्या और क्रांतिकारी षड्यंत्र को अपराध के रूप में प्रस्तुत किया।

बचाव ने साक्ष्यों, गवाहियों और न्यायिक प्रक्रिया पर प्रश्न उठाए।

विशेष न्यायाधिकरण ने दोषसिद्धि की।

प्रिवी काउंसिल ने विशेष अध्यादेश की वैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका अस्वीकार कर दी।

मालवीय ने दया की अपील की।

गांधी ने सजा कम करने का आग्रह किया।

नेहरू ने अंतिम दिनों में मौन रखा और बाद में उस मृत्यु को देश की असहायता और युवा साहस की स्मृति के रूप में देखा।

और अंततः 23 मार्च 1931 को फाँसी दे दी गई.इतना कानून का इतिहास है।

लेकिन मनुष्य का इतिहास इससे कुछ बड़ा होता है।

वह पूछता है—क्या न्याय केवल वह है जो अदालत के निर्णय में लिखा जाता है? क्या सत्य केवल वह है जिसे किसी मुकदमे में सिद्ध कर दिया जाए? क्या किसी मनुष्य की पूरी पहचान उसके विरुद्ध लगाए गए आरोपों और सुनाई गई सजा से तय हो सकती है?

इन प्रश्नों का उत्तर इतिहास किसी एक दिन में नहीं देता। वह पीढ़ियों तक मनुष्य के भीतर उन्हें जीवित रखता है।

उनकी फाँसी के बाद भारत ने उन्हें केवल एक मृत युवक के रूप में याद नहीं किया। उनकी स्मृति ने धीरे-धीरे एक ऐसे प्रतीक का रूप लिया, जिसमें युवावस्था का साहस, स्वतंत्रता की आकांक्षा, सत्ता के सामने असहमति और अपने विश्वास के लिए जीवन तक दाँव पर लगा देने की मनुष्य की क्षमता एक साथ दिखाई देने लगी।

और शायद यही किसी शहादत की सबसे गहरी विडंबना है—जिसे सत्ता समाप्त करना चाहती है, वही कभी-कभी स्मृति में और अधिक गहरा उतर जाता है।

फाँसी ने भगत सिंह का जीवन समाप्त कर दिया। मनुष्य केवल शरीर नहीं होता।

वह अपने पीछे छोड़ा हुआ प्रश्न भी होता है। वह अपनी कही हुई बात भी होता है।

वह अपने समय के विरुद्ध उठी हुई आवाज भी होता है और कभी-कभी वह आने वाली पीढ़ियों के भीतर जलती हुई वह छोटी-सी लौ होता है, जिसे कोई आँधी पूरी तरह बुझा नहीं पाती।

23 मार्च 1931 को लाहौर की जेल में एक युवक की साँसें थम गईं।उसकी माँ के लिए वह बेटा था।उसके साथियों के लिए वह साथी था. औपनिवेशिक शासन के लिए वह एक दोषसिद्ध अभियुक्त था।लेकिन आने वाली पीढ़ियों के लिए वह एक प्रश्न बन गया—

मनुष्य अपने जीवन से बड़ा क्या चुन सकता है? शायद उत्तर जीवन से भागना नहीं है।

शायद उत्तर यह है कि मनुष्य अपने जीवन को किसी ऐसी चीज के अर्थ से भर दे, जो उसके अपने जीवन से बड़ी हो।

भगत सिंह ने अपने जीवन का चुनाव किया था।

राजसत्ता ने उसकी मृत्यु का निर्णय किया।

लेकिन उसके जीवन का अर्थ किसी अदालत ने तय नहीं किया।

वह अर्थ इतिहास ने बनाया।

और इतिहास की सबसे विचित्र बात यही है कि उसमें कभी-कभी फाँसी का फंदा हार जाता है और स्मृति जीत जाती है।

23 मार्च 1931 को एक शरीर मिट्टी में चला गया।

लेकिन एक नाम समय में रह गया।

एक आवाज जेल की दीवारों से बाहर निकल गई।

एक प्रश्न पीढ़ियों के बीच चलता रहा।

और आज, इतने वर्षों बाद भी जब हम पूछते हैं—

“भगत सिंह को फाँसी क्यों?”

तो यह केवल उस मुकदमे का प्रश्न नहीं रह जाता।

यह हमारे अपने समय से पूछा गया प्रश्न भी बन जाता है—

क्या हम किसी मनुष्य को केवल उसके अपराध से पहचानते हैं, या उसके विचारों, उसके संघर्ष, उसकी आकांक्षाओं और उसके समय की परिस्थितियों को भी समझने का प्रयत्न करते हैं?

शायद भगत सिंह की सबसे बड़ी विरासत उनकी मृत्यु नहीं, बल्कि यही प्रश्न है।

क्योंकि मृत्यु एक बार आती है।

प्रश्न पीढ़ियों तक जीवित रहते हैं।

और भगत सिंह आज भी जीवित हैं—

किसी प्रतिमा में नहीं,

किसी नारे में नहीं,

केवल किसी स्मारक में नहीं,

बल्कि उस बेचैन मन में,

जो अन्याय, सत्ता, स्वतंत्रता, मनुष्य और समाज के अर्थ पर प्रश्न करना अभी नहीं भूला है।  

शिव कुमार शर्मा  (की कलम से)


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